श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदेहेन्द्रियासुहीनानां वैकुण्ठपुरवासिनाम् । देहसम्बन्धसम्बद्धमेतदाख्यातुमर्हसि ॥ ३४
नारद उवाच
एकदा ब्रह्मणः पुत्रा विष्णोर्लोकं यदृच्छया । सनन्दनादयो जग्मुश्चरन्तो भुवनत्रयम् ॥ ३५
पञ्चषड्ढायनार्भाभाः पूर्वेषामपि पूर्वजाः । दिग्वाससःशिशून् मत्वा द्वाःस्थौ तान् प्रत्यषेधताम् ॥ ३६
अशपन् कुपिता एवं युवां वासं न चार्हथः । रजस्तमोभ्यां रहिते पादमूले मधुद्विषः । पापिष्ठामासुरीं योनिं बालिशौ यातमाश्वतः ॥ ३७
एवं शप्तौ स्वभवनात् पतन्तौ तैः कृपालुभिः । प्रोक्तौ पुनर्जन्मभिर्वां त्रिभिर्लोकाय कल्पताम् ॥ ३८
जज्ञाते तौ दितेः पुत्रौ दैत्यदानववन्दितौ । हिरण्यकशिपुर्ज्येष्ठो हिरण्याक्षोऽनुजस्ततः ॥ ३९
हतो हिरण्यकशिपुर्हरिणा सिंहरूपिणा । हिरण्याक्षो धरोद्धारे बिभ्रता सौकरं वपुः ॥ ४०
महाराज! फिर तुम्हारे मौसेरे भाई शिशुपाल और दन्तवक्त्र दोनों ही विष्णुभगवान्के मुख्य पार्षद थे। ब्राह्मणोंके शापसे इन दोनोंको अपने पदसे च्युत होना पड़ा था ।।३२।।
राजा युधिष्ठिरने पूछा—नारदजी! भगवान्के पार्षदोंको भी प्रभावित करनेवाला वह शाप किसने दिया था तथा वह कैसा था? भगवान्के अनन्य प्रेमी फिर जन्म-मृत्युमय संसारमें आयें, यह बात तो कुछ अविश्वसनीय-सी मालूम पड़ती है ।।३३।। वैकुण्ठके रहनेवाले लोग प्राकृत शरीर, इन्द्रिय और प्राणोंसे रहित होते हैं। उनका प्राकृत शरीरसे सम्बन्ध किस प्रकार हुआ, यह बात आप अवश्य सुनाइये ।।३४।।
नारदजीने कहा—एक दिन ब्रह्माके मानसपुत्र सनकादि ऋषि तीनों लोकोंमें स्वच्छन्द विचरण करते हुए वैकुण्ठमें जा पहुँचे ।।३५।।
यों तो वे सबसे प्राचीन हैं, परन्तु जान पड़ते हैं ऐसे मानो पाँच-छः बरसके बच्चे हों।
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