भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1279, कुल 1617 में से

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पृष्ठ 1279

वस्त्र भी नहीं पहनते। उन्हें साधारण बालक समझकर द्वारपालोंने उनको भीतर जानेसे रोक दिया ॥३६॥ इसपर वे क्रोधित-से हो गये और उन्होंने द्वारपालोंको यह शाप दिया कि ‘मूर्खो! भगवान् विष्णुके चरण तो रजोगुण और तमोगुणसे रहित हैं। तुम दोनों इनके समीप निवास करनेयोग्य नहीं हो। इसलिये शीघ्र ही तुम यहाँसे पापमयी असुरयोनिमें जाओ’ ॥३७॥ उनके इस प्रकार शाप देते ही जब वे वैकुण्ठसे नीचे गिरने लगे, तब उन कृपालु महात्माओंने कहा—‘अच्छा, तीन जन्मोंमें इस शापको भोगकर तुमलोग फिर इसी वैकुण्ठमें आ जाना’ ॥३८॥

युधिष्ठिर! वे ही दोनों दितिके पुत्र हुए। उनमें बड़ेका नाम हिरण्यकशिपु था और उससे छोटेका हिरण्याक्ष। दैत्य और दानवोंके समाजमें यही दोनों सर्वश्रेष्ठ थे ॥३९॥ विष्णुभगवान्ने नृसिंहका रूप धारण करके हिरण्यकशिपुको और पृथ्वीका उद्धार करनेके समय वराहावतार ग्रहण करके हिरण्याक्षको मारा ॥४०॥

हिरण्यकशिपुः पुत्रं प्रह्लादं केशवप्रियम् । जिघांसुरकरोन्नाना यातना मृत्युहेतवे ॥४१

सर्वभूतात्मभूतं¹ तं प्रशान्तं समदर्शनम् । भगवत्तेजसा स्पृष्टं नाश्कनोद्धन्तुमुद्यमैः ॥४२

ततस्तौ राक्षसौ जातौ केशिन्यां विश्रवःसुतौ । रावणः कुम्भकर्णश्च सर्वलोकोपतापनौ² ॥४३

तत्रापि राघवो भूत्वा न्यहनच्छापमुक्तये । रामवीर्यं श्रोष्यसि त्वं मार्कण्डेयमुखात् प्रभो ॥४४

तावेव क्षत्रियौ जातौ मातृष्वस्रात्मजौ तव । अधुना शापनिर्मुक्तौ कृष्णचक्रहतांहसौ ॥४५

वैरानुबन्धतीव्रेण ध्यानेनाच्युतसात्मताम् । नीतौ पुनर्हरेः पार्श्वं जग्मतुर्विष्णुपार्षदौ ॥४६

युधिष्ठिर उवाच

विद्वेषो दयिते पुत्रे कथमासीन्महात्मनि । ब्रूहि मे भगवन्त्येन प्रह्लादस्याच्युतात्मता ॥४७

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