श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअशक्तो वचनोच्चारे संज्ञामात्रं चकार ह ॥२५
ततोऽञ्जलौ जलं कृत्वा गोकर्णस्तमुदैरयत् । तत्सेकहतपापोऽसौ प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥२६
प्रेत उवाच
अहं भ्राता त्वदीयोऽस्मि धुन्धुकारीति नामतः । स्वकीयेनैव दोषेण ब्रह्मत्वं नाशितं मया ॥२७
कर्मणो नास्ति संख्या मे महाज्ञाने विवर्तिनः । लोकानां हिंसकः सोऽहं स्त्रीभिर्दुःखेन मारितः ॥२८
अतः प्रेतत्वमापन्नो दुर्दशां च वहाम्यहम् । वाताहारेण जीवामि दैवाधीनफलोदयात् ॥२९
अहो बन्धो कृपासिन्धो भ्रातर्मामाशु मोचय । गोकर्णो वचनं श्रुत्वा तस्मै वाक्यमथाब्रवीत् ॥३०
इस प्रकार घूमते-घूमते गोकर्णजी अपने नगरमें आये और रात्रिके समय दूसरोंकी दृष्टिसे बचकर सीधे अपने घरके आँगनमें सोनेके लिये पहुँचे ॥२०॥
वहाँ अपने भाईको सोया देख आधी रातके समय धुन्धुकारीने अपना बड़ा विकट रूप दिखाया ॥२१॥ वह कभी भेड़ा, कभी हाथी, कभी भैंसा, कभी इन्द्र और कभी अग्निका रूप धारण करता। अन्तमें वह मनुष्यके आकारमें प्रकट हुआ ॥२२॥
ये विपरीत अवस्थाएँ देखकर गोकर्णने निश्चय किया कि यह कोई दुर्गतिंको प्राप्त हुआ जीव है। तब उन्होंने उससे धैर्यपूर्वक पूछा ॥२३॥
गोकर्णने कहा—तू कौन है? रात्रिके समय ऐसे भयानक रूप क्यों दिखा रहा है? तेरी यह दशा कैसे हुई? हमें बता तो सही—तू प्रेत है, पिशाच है अथवा कोई राक्षस है? ॥२४॥
सूतजी कहते हैं—गोकर्णके इस प्रकार पूछनेपर वह बार-बार जोर-जोरसे रोने लगा। उसमें बोलनेकी शक्ति नहीं थी, इसलिये उसने केवल संकेतमात्र किया ॥२५॥
तब गोकर्णने अंजलिमें जल लेकर उसे अभिमन्त्रित करके उसपर छिड़का। इससे उसके पापोंका कुछ शमन हुआ और वह इस प्रकार कहने लगा ॥२६॥
प्रेत बोला—'मैं तुम्हारा भाई हूँ। मेरा नाम है धुन्धुकारी। मैंने अपने ही दोषसे अपना ब्राह्मणत्व नष्ट कर दिया ॥२७॥ मेरे कुकर्मोंकी गिनती नहीं की जा सकती। मैं तो महान्
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