श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
अशक्तो वचनोच्चारे संज्ञामात्रं चकार ह ॥२५
ततोऽञ्जलौ जलं कृत्वा गोकर्णस्तमुदैरयत् । तत्सेकहतपापोऽसौ प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥२६
प्रेत उवाच
अहं भ्राता त्वदीयोऽस्मि धुन्धुकारीति नामतः । स्वकीयेनैव दोषेण ब्रह्मत्वं नाशितं मया ॥२७
कर्मणो नास्ति संख्या मे महाज्ञाने विवर्तिनः । लोकानां हिंसकः सोऽहं स्त्रीभिर्दुःखेन मारितः ॥२८
अतः प्रेतत्वमापन्नो दुर्दशां च वहाम्यहम् । वाताहारेण जीवामि दैवाधीनफलोदयात् ॥२९
अहो बन्धो कृपासिन्धो भ्रातर्मामाशु मोचय । गोकर्णो वचनं श्रुत्वा तस्मै वाक्यमथाब्रवीत् ॥३०
इस प्रकार घूमते-घूमते गोकर्णजी अपने नगरमें आये और रात्रिके समय दूसरोंकी दृष्टिसे बचकर सीधे अपने घरके आँगनमें सोनेके लिये पहुँचे ॥२०॥
वहाँ अपने भाईको सोया देख आधी रातके समय धुन्धुकारीने अपना बड़ा विकट रूप दिखाया ॥२१॥ वह कभी भेड़ा, कभी हाथी, कभी भैंसा, कभी इन्द्र और कभी अग्निका रूप धारण करता। अन्तमें वह मनुष्यके आकारमें प्रकट हुआ ॥२२॥
ये विपरीत अवस्थाएँ देखकर गोकर्णने निश्चय किया कि यह कोई दुर्गतिंको प्राप्त हुआ जीव है। तब उन्होंने उससे धैर्यपूर्वक पूछा ॥२३॥
गोकर्णने कहा—तू कौन है? रात्रिके समय ऐसे भयानक रूप क्यों दिखा रहा है? तेरी यह दशा कैसे हुई? हमें बता तो सही—तू प्रेत है, पिशाच है अथवा कोई राक्षस है? ॥२४॥
सूतजी कहते हैं—गोकर्णके इस प्रकार पूछनेपर वह बार-बार जोर-जोरसे रोने लगा। उसमें बोलनेकी शक्ति नहीं थी, इसलिये उसने केवल संकेतमात्र किया ॥२५॥
तब गोकर्णने अंजलिमें जल लेकर उसे अभिमन्त्रित करके उसपर छिड़का। इससे उसके पापोंका कुछ शमन हुआ और वह इस प्रकार कहने लगा ॥२६॥
प्रेत बोला—'मैं तुम्हारा भाई हूँ। मेरा नाम है धुन्धुकारी। मैंने अपने ही दोषसे अपना ब्राह्मणत्व नष्ट कर दिया ॥२७॥ मेरे कुकर्मोंकी गिनती नहीं की जा सकती। मैं तो महान्
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अज्ञानमें चक्कर काट रहा था। इसीसे मैंने लोगोंकी बड़ी हिंसा की। अन्तमें कुलटा स्त्रियोंने मुझे तड़पा-तड़पाकर मार डाला ॥२८॥ इसीसे अब प्रेतयोनिमें पड़कर यह दुर्दशा भोग रहा हूँ। अब दैववश कर्मफलका उदय होनेसे मैं केवल वायुभक्षण करके जी रहा हूँ ॥२९॥
भाई! तुम दयाके समुद्र हो; अब किसी प्रकार जल्दी ही मुझे इस योनिसे छुड़ाओ।' गोकर्णने धुन्धुकारीकी सारी बातें सुनीं और तब उससे बोले ॥३०॥
गोकर्ण उवाच
त्वदर्थं तु गयापिण्डो मया दत्तो विधानतः । तत्कथं नैव मुक्तोऽसि ममाश्चर्यमिदं महत् ॥३१ गयाश्राद्धान्न मुक्तिश्चेदुपायो नापरस्त्विह । किं विधेयं मया प्रेत तत्त्वं वद सविस्तरम् ॥३२
प्रेत उवाच
गयाश्राद्धशतेनापि मुक्तिर्मे न भविष्यति । उपायमपरं कञ्चित्त्वं विचारय साम्प्रतम् ॥३३ इति तद्वाक्यमाकर्ण्य गोकर्णो विस्मयं गतः । शतश्राद्धैर्न मुक्तिश्चेदसाध्यं मोचनं तव ॥३४ इदानीं तु निजं स्थानमातिष्ठ प्रेत निर्भयः । त्वन्मुक्तिसाधकं किञ्चिदाचरिष्ये विचार्य च ॥३५ धुन्धुकारी निजस्थानं तेनादिष्टस्ततो गतः । गोकर्णश्चिन्तयामास तां रात्रिं न तदध्यगात् ॥३६ प्रातस्तमागतं दृष्ट्वा लोकाः प्रीत्या समागताः । तत्सर्वं कथितं तेन यज्जातं च यथा निशि ॥३७ विद्वांसो योगनिष्ठाश्च ज्ञानिनो ब्रह्मवादिनः । तन्मुक्तिं नैव तेऽपश्यन् पश्यन्तः शास्त्रसंचयान् ॥३८ ततः सर्वैः सूर्यवाक्यं तन्मुक्तौ स्थापितं परम् । गोकर्णः स्तम्भनं चक्रे सूर्यवेगस्य वै तदा ॥३९ तुभ्यं नमो जगत्साक्षिन् ब्रूहि मे मुक्तिहेतुकम् । तच्छ्रुत्वा दूरतः सूर्यः स्फुटमित्यभ्यभाषत ॥४० श्रीमद्भागवतान्मुक्तिः सप्ताहं वाचनं कुरु ।
इति सूर्यवचः सर्वधर्मरूपं तु विश्रुतम् ॥४१
गोकर्णने कहा—भाई! मुझे इस बातका बड़ा आश्चर्य है—मैंने तुम्हारे लिये विधिपूर्वक गयाजीमें पिण्डदान किया, फिर भी तुम प्रेतयोनिसे मुक्त कैसे नहीं हुए? ॥३१॥ यदि गया-श्राद्धसे भी तुम्हारी मुक्ति नहीं हुई, तब इसका और कोई उपाय ही नहीं है। अच्छा, तुम सब बात खोलकर कहो—मुझे अब क्या करना चाहिये? ॥३२॥
प्रेतने कहा—मेरी मुक्ति सैकड़ों गया-श्राद्ध करनेसे भी नहीं हो सकती। अब तो तुम इसका कोई और उपाय सोचो ॥३३॥
प्रेतकी यह बात सुनकर गोकर्णको बड़ा आश्चर्य हुआ। वे कहने लगे—‘यदि सैकड़ों गया-श्राद्धोंसे भी तुम्हारी मुक्ति नहीं हो सकती, तब तो तुम्हारी मुक्ति असम्भव ही है ॥३४॥ अच्छा, अभी तो तुम निर्भय होकर अपने स्थानपर रहो; मैं विचार करके तुम्हारी मुक्तिके लिये कोई दूसरा उपाय करूँगा' ॥३५॥
गोकर्णकी आज्ञा पाकर धुन्धुकारी वहाँसे अपने स्थानपर चला आया। इधर गोकर्णने रातभर विचार किया, तब भी उन्हें कोई उपाय नहीं सूझा ॥३६॥ प्रातःकाल उनको आया देख लोग प्रेमसे उनसे मिलने आये। तब गोकर्णने रातमें जो कुछ जिस प्रकार हुआ था, वह सब उन्हें सुना दिया ॥३७॥ उनमें जो लोग विद्वान्, योगनिष्ठ, ज्ञानी और वेदज्ञ थे, उन्होंने भी अनेकों शास्त्रोंको उलट-पलटकर देखा; तो भी उसकी मुक्तिका कोई उपाय न मिला ॥३८॥ तब सबने यही निश्चय किया कि इस विषयमें सूर्यनारायण जो आज्ञा करें, वही करना चाहिये। अतः गोकर्णने अपने तपोबलसे सूर्यकी गतिको रोक दिया ॥३९॥ उन्होंने स्तुति की—‘भगवन्! आप सारे संसारके साक्षी हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूँ। आप मुझे कृपा करके धुन्धुकारीकी मुक्तिका साधन बताइये।' गोकर्णकी यह प्रार्थना सुनकर सूर्यदेवने दूरसे ही स्पष्ट शब्दोंमें कहा—‘श्रीमद्भागवतसे मुक्ति हो सकती है, इसलिये तुम उसका सप्ताह पारायण करो।' सूर्यका यह धर्ममय वचन वहाँ सभीने सुना ॥४०-४१॥ तब सबने यही कहा कि ‘प्रयत्नपूर्वक यही करो, है भी यह साधन बहुत सरल।' अतः गोकर्णजी भी तदनुसार निश्चय करके कथा सुनानेके लिये तैयार हो गये ॥४२॥
सर्वेऽब्रुवन् प्रयत्नेन कर्तव्यं सुकरं त्विदम् । गोकर्णो निश्चयं कृत्वा वाचनार्थं प्रवर्तितः ॥४२ तत्र संश्रवणार्थाय देशग्रामाज्जना ययुः । पङ्ग्वन्धवृद्धमन्दाश्च तेऽपि पापक्षयाय वै ॥४३ समाजस्तु महाञ्जातो देवविस्मयकारकः । यदैवासनमास्थाय गोकर्णोऽकथयत्कथाम् ॥४४ स प्रेतोऽपि तदाऽऽयातः स्थानं पश्यन्नितस्ततः । सप्तग्रन्थियुतं तत्रापश्यत्कीचकमुच्छ्रितम् ॥४५ तन्मूलच्छिद्रमाविश्य श्रवणार्थं स्थितो ह्यसौ ।
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वातरूपी स्थितिं कर्तुमशक्तो वंशमाविशत् ।।४६ वैष्णवं ब्राह्मणं मुख्यं श्रोतारं परिकल्प्य सः । प्रथमस्कन्धतः स्पष्टमाख्यानं धेनुजोऽकरोत् ।।४७ दिनान्ते रक्षिता गाथा तदा चित्रं बभूव ह । वंशैकग्रन्थिभेदोऽभूत्सशब्दं पश्यतां सताम् ।।४८ द्वितीयेऽह्नि तथा सायं द्वितीयग्रन्थिभेदनम् । तृतीयेऽह्नि तथा सायं तृतीयग्रन्थिभेदनम् ।।४९ एवं सप्तदिनैश्चैव सप्तग्रन्थिविभेदनम् । कृत्वा स द्वादशस्कन्धश्रवणात्प्रेततां जहौ ।।५० दिव्यरूपधरो जातस्तुलसीदाममण्डितः । पीतवासा घनश्यामो मुकुटी कुण्डलान्वितः ।।५१ ननाम भ्रातरं सद्यो गोकर्णमिति चाब्रवीत् । त्वयाहं मोचितो बन्धो कृपया प्रेतकश्मलात् ।।५२
देश और गाँवोंसे अनेकों लोग कथा सुननेके लिये आये। बहुत-से लँगड़े-लूले, अंधे, बूढ़े और मन्दबुद्धि पुरुष भी अपने पापोंकी निवृत्तिके उद्देश्यसे वहाँ आ पहुँचे ।।४३।। इस प्रकार वहाँ इतनी भीड़ हो गयी कि उसे देखकर देवताओंको भी आश्चर्य होता था। जब गोकर्णजी व्यासगद्दीपर बैठकर कथा कहने लगे, तब वह प्रेत भी वहाँ आ पहुँचा और इधर-उधर बैठनेके लिये स्थान ढूँढने लगा। इतनेमें ही उसकी दृष्टि एक सीधे रखे हुए सात गाँठके बाँसपर पड़ी ।।४४-४५।। उसीके नीचेके छिद्रमें घुसकर वह कथा सुननेके लिये बैठ गया। वायुरूप होनेके कारण वह बाहर कहीं बैठ नहीं सकता था, इसलिये बाँसमें घुस गया ।।४६।।
गोकर्णजीने एक वैष्णव ब्राह्मणको मुख्य श्रोता बनाया और प्रथमस्कन्धसे ही स्पष्ट स्वरमें कथा सुनानी आरम्भ कर दी ।।४७।।
सायंकालमें जब कथाको विश्राम दिया गया, तब एक बड़ी विचित्र बात हुई। वहाँ सभासदोंके देखते-देखते उस बाँसकी एक गाँठ तड़-तड़ शब्द करती फट गयी ।।४८।। इसी प्रकार दूसरे दिन सायंकालमें दूसरी गाँठ फटी और तीसरे दिन उसी समय तीसरी ।।४९।। इस प्रकार सात दिनोंमें सातों गाँठोंको फोड़कर धुन्धुकारी बारहौं स्कन्धोंके सुननेसे पवित्र होकर प्रेतयोनिसे मुक्त हो गया और दिव्यरूप धारण करके सबके सामने प्रकट हुआ। उसका मेघके समान श्याम शरीर पीताम्बर और तुलसीकी मालाओंसे सुशोभित था तथा सिरपर मनोहर मुकुट और कानोंमें कमनीय कुण्डल झिलमिला रहे थे ।।५०-५१।।
उसने तुरन्त अपने भाई गोकर्णको प्रणाम करके कहा—‘भाई! तुमने कृपा करके मुझे प्रेतयोनिकी यातनाओंसे मुक्त कर दिया ।।५२।।
धन्या भागवती वार्ता प्रेतपीडाविनाशिनी ।
सप्ताहॊऽपि तथा धन्यः कृष्णलोकफलप्रदः ॥५३
कम्पन्ते सर्वपापानि सप्ताहश्रवणे स्थिते । अस्माकं प्रलयं सद्यः कथा चेयं करिष्यति ॥५४
आर्द्रं शुष्कं लघु स्थूलं वाङ्मनः कर्मभिः कृतम् । श्रवणं विदहेत्पापं पावकः समिधो यथा ॥५५
अस्मिन् वै भारते वर्षे सूरिभिर्देवसंसदि । अकथाश्राविणां पुंसां निष्फलं जन्म कीर्तितम् ॥५६
किं मोहतो रक्षितेन सुपुष्टेन बलीयसा । अध्रुवेण शरीरेण शुकशास्त्रकथां विना ॥५७
अस्थिस्तम्भं स्नायुबद्धं मांसशोणितलेपितम् । चर्मावनद्धं दुर्गन्धं पात्रं मूत्रपुरीषयोः ॥५८
जराशोकविपाकार्तं रोगमन्दिरमातुरम् । दुष्पूरं दुर्धरं दुष्टं सदोषं क्षणभङ्गुरम् ॥५९
कृमिविड्भस्मसंज्ञान्तं शरीरमिति वर्णितम् । अस्थिरेण स्थिरं कर्म कुतोऽयं साधयेन्न हि ॥६०
यत्प्रातः संस्कृतं चान्नं सायं तच्च विनश्यति । तदीयरससम्पुष्टे काये का नाम नित्यता ॥६१
यह प्रेतपीड़ाका नाश करनेवाली श्रीमद्भागवतकी कथा धन्य है तथा श्रीकृष्णचन्द्रके धामकी प्राप्ति करानेवाला इसका सप्ताह-पारायण भी धन्य है! ॥५३॥ जब सप्ताहश्रवणका योग लगता है, तब सब पाप थर्रा उठते हैं कि अब यह भागवतकी कथा जल्दी ही हमारा अन्त कर देगी ॥५४॥ जिस प्रकार आग गीली-सूखी, छोटी-बड़ी—सब तरहकी लकड़ियोंको जला डालती है, उसी प्रकार यह सप्ताहश्रवण मन, वचन और कर्मद्वारा किये हुए नये-पुराने, छोटे-बड़े—सभी प्रकारके पापोंको भस्म कर देता है ॥५५॥
विद्वानोंने देवताओंकी सभामें कहा है कि जो लोग इस भारतवर्षमें श्रीमद्भागवतकी कथा नहीं सुनते, उनका जन्म वृथा ही है ॥५६॥ भला, मोहपूर्वक लालन-पालन करके यदि इस अनित्य शरीरको हृष्ट-पुष्ट और बलवान् भी बना लिया तो भी श्रीमद्भागवतकी कथा सुने
बिना इससे क्या लाभ हुआ? ॥५७॥ अस्थियाँ ही इस शरीरके आधारस्तम्भ हैं, नस-नाडीरूप रस्सियोंसे यह बँधा हुआ है, ऊपरसे इसपर मांस और रक्त थोपकर इसे चर्मसे मँढ़ दिया गया है। इसके प्रत्येक अंगमें दुर्गन्ध आती है; क्योंकि है तो यह मल-मूत्रका भाण्ड ही ॥५८॥ वृद्धावस्था और शोकके कारण यह परिणाममें दुःखमय ही है, रोगोंका तो घर ही ठहरा। यह निरन्तर किसी-न-किसी कामनासे पीड़ित रहता है, कभी इसकी तृप्ति नहीं होती। इसे धारण किये रहना भी एक भार ही है; इसके रोम-रोममें दोष भरे हुए हैं और नष्ट होनेमें इसे एक क्षण भी नहीं लगता ॥५९॥ अन्तमें यदि इसे गाड़ दिया जाता है तो इसके कीड़े बन जाते हैं; कोई पशु खा जाता है तो यह विष्ठा हो जाता है और अग्निमें जला दिया जाता है तो भस्मकी ढेरी हो जाता है। ये तीन ही इसकी गतियाँ बतायी गयी हैं। ऐसे अस्थिर शरीरसे मनुष्य अविनाशी फल देनेवाला काम क्यों नहीं बना लेता? ॥६०॥ जो अन्न प्रातःकाल पकाया जाता है, वह सायंकालतक बिगड़ जाता है; फिर उसीके रससे पुष्ट हुए शरीरकी नित्यता कैसी ॥६१॥ सप्ताहश्रवणालोके प्राप्यते निकटे हरिः । अतो दोषनिवृत्त्यर्थमेतदेव हि साधनम् ॥६२ बुद्बुदा इव तोयेषु मशका इव जन्तुषु । जायन्ते मरणायैव कथाश्रवणवर्जिताः ॥६३ जडस्य शुष्कवंशस्य यत्र ग्रन्थिविभेदनम् । चित्रं किमु तदा चित्तग्रन्थिभेदः कथाश्रवात् ॥६४ भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि सप्ताहश्रवणे कृते ॥६५ संसारकर्दमालेपप्रक्षालनपटीयसि । कथातीर्थे स्थिते चित्ते मुक्तिरेव बुधैः स्मृता ॥६६ एवं ब्रुवति वै तस्मिन् विमानमागमत्तदा । वैकुण्ठवासिभिर्युक्तं प्रस्फुरद्दीप्तिमण्डलम् ॥६७ सर्वेषां पश्यतां भेजे विमानं धुन्धुलीसुतः । विमाने वैष्णवान् वीक्ष्य गोकर्णो वाक्यमब्रवीत् ॥६८
गोकर्ण उवाच
अत्रैव बहवः सन्ति श्रोतारो मम निर्मलाः । आनीतानि विमानानि न तेषां युगपत्कुतः ॥६९ श्रवणं समभागेन सर्वेषामिह दृश्यते । फलभेदः कुतो जातः प्रब्रुवन्तु हरिप्रियाः ॥७० ebook converter DEMO Watermarks*
हरिदासा ऊचुः
श्रवणस्य विभेदेन फलभेदोऽत्र संस्थितः । श्रवणं तु कृतं सर्वैर्न तथा मननं कृतम् । फलभेदस्ततो जातो भजनादपि मानद ।।७१
इस लोकमें सप्ताहश्रवण करनेसे भगवान्की शीघ्र ही प्राप्ति हो सकती है। अतः सब प्रकारके दोषोंकी निवृत्तिके लिये एकमात्र यही साधन है ।।६२।। जो लोग भागवतकी कथासे वंचित हैं, वे तो जलमें बुद्बुदे और जीवोंमें मच्छरोंके समान केवल मरनेके लिये ही पैदा होते हैं ।।६३।। भला, जिसके प्रभावसे जड़ और सूखे हुए बाँसकी गाँठें फट सकती हैं, उस भागवतकथाका श्रवण करनेसे चित्तकी गाँठोंका खुल जाना कौन बड़ी बात है ।।६४।। सप्ताहश्रवण करनेसे मनुष्यके हृदयकी गाँठ खुल जाती है, उसके समस्त संशय छिन्न-भिन्न हो जाते हैं और सारे कर्म क्षीण हो जाते हैं ।।६५।। यह भागवतकथारूप तीर्थ संसारके कीचड़को धोनेमें बड़ा ही पटु है। विद्वानोंका कथन है कि जब यह हृदयमें स्थित हो जाता है, तब मनुष्यकी मुक्ति निश्चित ही समझनी चाहिये ।।६६।। जिस समय धुन्धुकारी ये सब बातें कह रहा था, जिसके लिये वैकुण्ठवासी पार्षदोंके सहित एक विमान उतरा; उससे सब ओर मण्डलाकार प्रकाश फैल रहा था ।।६७।। सब लोगोंके सामने ही धुन्धुकारी उस विमानपर चढ़ गया। तब उस विमानपर आये हुए पार्षदोंको देखकर उनसे गोकर्णने यह बात कही ।।६८।। गोकर्णने पूछा—भगवान्के प्रिय पार्षदो! यहाँ हमारे अनेकों शुद्धहृदय श्रोतागण हैं, उन सबके लिये आपलोग एक साथ बहुत-से विमान क्यों नहीं लाये? हम देखते हैं कि यहाँ सभीने समानरूपसे कथा सुनी है, फिर फलमें इस प्रकारका भेद क्यों हुआ, यह बताइये ।।६९-७०।। भगवान्के सेवकोंने कहा—हे मानद! इस फलभेदका कारण इनके श्रवणका भेद ही है। यह ठीक है कि श्रवण तो सबने समानरूपसे ही किया है, किन्तु इसके-जैसा मनन नहीं किया। इसीसे एक साथ भजन करनेपर भी उसके फलमें भेद रहा ।।७१।। इस प्रेतने सात दिनोंतक निराहार रहकर श्रवण किया था, तथा सुने हुए विषयका स्थिरचित्तसे यह खूब मनन-निदिध्यासन भी करता रहता था ।।७२।। जो ज्ञान दृढ़ नहीं होता, वह व्यर्थ हो जाता है। इसी प्रकार ध्यान न देनेसे श्रवणका, संदेहसे मन्त्रका और चित्तके इधर-उधर भटकते रहनेसे जपका भी कोई फल नहीं होता ।।७३।। वैष्णवहीन देश, अपात्रको कराया हुआ श्राद्धका भोजन, अश्रोत्रियको दिया हुआ दान एवं आचारहीन कुल—इन सबका नाश हो जाता है ।।७४।। गुरुवचनोंमें विश्वास, दीनताका भाव, मनके दोषोंपर विजय और कथामें चित्तकी एकाग्रता इत्यादि नियमोंका यदि पालन किया जाय तो श्रवणका यथार्थ फल मिलता है। यदि ये श्रोता फिरसे श्रीमद्भागवतकी कथा सुनें तो निश्चय ही सबको वैकुण्ठकी प्राप्ति
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होगी ॥७५-७६॥ और गोकर्णजी! आपको तो भगवान् स्वयं आकर गोलोकधाममें ले जायेंगे। यों कहकर वे सब पार्षद हरिकीर्तन करते वैकुण्ठलोकको चले गये ॥७७॥ सप्तरात्रमुपोष्यैव प्रेतेन श्रवणं कृतम् । मननादि तथा तेन स्थिरचित्ते कृतं भृशम् ॥७२ अदृढं च हतं ज्ञानं प्रमादेन हतं श्रुतम् । संदिग्धो हि हतो मन्त्रो व्यग्रचित्तो हतो जपः ॥७३ अवैष्णवो हतो देशो हतं श्राद्धमपात्रकम् । हतमश्रोत्रिये दानमनाचारं हतं कुलम् ॥७४ विश्वासो गुरुवाक्येषु स्वस्मिन्दीनत्वभावना । मनोदोषजयश्चैव कथायां निश्चला मतिः ॥७५ एवमादि कृतं चेत्स्यात्तदा वै श्रवणे फलम् । पुनः श्रवान्ते सर्वेषां वैकुण्ठे वसतिर्ध्रुवम् ॥७६ गोकर्ण तव गोविन्दो गोलोकं दास्यति स्वयं । एवमुक्त्वा ययुः सर्वे वैकुण्ठं हरिकीर्तनाः ॥७७ श्रावणे मासि गोकर्णः कथामूचे तथा पुनः । सप्तरात्रवतीं भूयः श्रवणं तैः कृतं पुनः ॥७८ कथासमाप्तौ यज्जातं श्रूयतां तच्च नारद ॥७९ विमानैः सह भक्तैश्च हरिराविर्बभूव ह । जयशब्दा नमःशब्दास्तत्रासन् बहवस्तदा ॥८० पाञ्चजन्यध्वनिं चक्रे हर्षात्तत्र स्वयं हरिः । गोकर्णं तु समालिङ्ग्याकरोत्स्वसदृशं हरिः ॥८१ श्रोतॄनन्यान ् घनश्यामान् पीतकौशेयवाससः । किरीटिनः कुण्डलिनस्तथा चक्रे हरिः क्षणात् ॥८२ तद्ग्रामे ये स्थिता जीवा आश्वचाण्डालजातयः । विमाने स्थापितास्तेऽपि गोकर्णकृपया तदा ॥८३ प्रेषिता हरिलोके ते यत्र गच्छन्ति योगिनः । गोकर्णेन स गोपालो गोलोकं गोपवल्लभम् । कथाश्रवणतः प्रीतो निर्ययौ भक्तवत्सलः ॥८४
श्रावण मासमें गोकर्णजीने फिर उसी प्रकार सप्ताहक्रमसे कथा कही और उन श्रोताओंने उसे फिर सुना ॥७८॥ नारदजी! इस कथाकी समाप्तिपर जो कुछ हुआ, वह
सुनिये ॥७९॥ वहाँ भक्तोंसे भरे हुए विमानोंके साथ भगवान् प्रकट हुए। सब ओरसे खूब जय-जयकार और नमस्कारकी ध्वनियाँ होने लगीं ॥८०॥ भगवान् स्वयं हर्षित होकर अपने पांचजन्य शंखकी ध्वनि करने लगे और उन्होंने गोकर्णको हृदयसे लगाकर अपने ही समान बना लिया ॥८१॥ उन्होंने क्षणभरमें ही अन्य सब श्रोताओंको भी मेघके समान श्यामवर्ण, रेशमी पीताम्बरधारी तथा किरीट और कुण्डलादिसे विभूषित कर दिया ॥८२॥ उस गाँवमें कुत्ते और चाण्डालपर्यन्त जितने भी जीव थे, वे सभी गोकर्णजीकी कृपासे विमानोंपर चढ़ा लिये गये ॥८३॥ तथा जहाँ योगिजन जाते हैं, उस भगवद्धाममें वे भेज दिये गये। इस प्रकार भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्ण कथाश्रवणसे प्रसन्न होकर गोकर्णजीको साथ ले अपने ग्वालबालोंके प्रिय गोलोकधाममें चले गये ॥८४॥ पूर्वकालमें जैसे अयोध्यावासी भगवान् श्रीरामके साथ साकेतधाम सिधारे थे, उसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण उन सबको योगिदुर्लभ गोलोकधामको ले गये ॥८५॥ जिस लोकमें सूर्य, चन्द्रमा और सिद्धोंकी भी कभी गति नहीं हो सकती, उसमें वे श्रीमद्भागवत श्रवण करनेसे चले गये ॥८६॥ अयोध्यावासिनः पूर्वं यथा रामेण संगताः । तथा कृष्णेन ते नीता गोलोकं योगिदुर्लभम् ॥८५ यत्र सूर्यस्य सोमस्य सिद्धानां न गतिः कदा । तं लोकं हि गतास्ते तु श्रीमद्भागवतश्रवात् ॥८६ ब्रूमोऽत्र ते किं फलवृन्दमुज्ज्वलं सप्ताहयज्ञेन कथासु सञ्चितम् । कर्णेन गोकर्णकथाक्षरो यैः पीतश्च ते गर्भंगता न भूयः ॥८७ वाताम्बुपर्णाशनदेहशोषणै- स्तपोभिरुग्रैश्चिरकालसञ्चितैः । योगैश्च संयान्ति न तां गतिं वै सप्ताहगाथाश्रवणेन यान्ति याम् ॥८८ इतिहासमिमं पुण्यं शाण्डिल्योऽपि मुनीश्वरः । पठते चित्रकूटस्थो ब्रह्मानन्दपरिप्लुतः ॥८९ आख्यानमेतत्परमं पवित्रं श्रुतं सकृद्वै विदहेदघौघम् । श्राद्धे प्रयुक्तं पितृतृप्तिमावहे- न्नित्यं सुपाठादपुनर्भवं च ॥९०
नारदजी! सप्ताहयज्ञके द्वारा कथाश्रवण करनेसे जैसा उज्ज्वल फल संचित होता है, उसके विषयमें हम आपसे क्या कहें? अजी! जिन्होंने अपने कर्णपुटसे गोकर्णजीकी कथाके एक अक्षरका भी पान किया था, वे फिर माताके गर्भमें नहीं आये ॥८७॥ जिस गतिको लोग ebook converter DEMO Watermarks*
वायु, जल या पत्ते खाकर शरीर सुखानेसे, बहुत कालतक घोर तपस्या करनेसे और योगाभ्याससे भी नहीं पा सकते, उसे वे सप्ताहश्रवणसे सहजमें ही प्राप्त कर लेते हैं ।।८८।। इस परम पवित्र इतिहासका पाठ चित्रकूटपर विराजमान मुनीश्वर शाण्डिल्य भी ब्रह्मानन्दमें मग्न होकर करते रहते हैं ।।८९।। यह कथा बड़ी ही पवित्र है। एक बारके श्रवणसे ही समस्त पापराशिको भस्म कर देती है। यदि इसका श्राद्धके समय पाठ किया जाय, तो इससे पितृगणको बड़ी तृप्ति होती है और नित्य पाठ करनेसे मोक्षकी प्राप्ति होती है ।।९०।।
इति श्रीपद्मपुराणे उत्तरखण्डे श्रीमद्भागवतमाहात्म्ये गोकर्णमोक्षवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ।।५।।
अथ षष्ठोऽध्यायः सप्ताहयज्ञकी विधि
कुमारा ऊचुः
अथ ते सम्प्रवक्ष्यामः सप्ताहश्रवणे विधिम् ।
सहायैर्वसुभिश्चैव प्रायः साध्यो विधिः स्मृतः ।।१
दैवज्ञं तु समाहूय मुहूर्तं पृच्छद्य यत्नतः ।
विवाहे यादृशं वित्तं तादृशं परिकल्पयेत् ।।२
श्रीसनकादि कहते हैं—नारदजी! अब हम आपको सप्ताहश्रवणकी विधि बताते हैं। यह विधि प्रायः लोगोंकी सहायता और धनसे साध्य कही गयी है ।।१।।
पहले तो यत्नपूर्वक ज्योतिषीको बुलाकर मुहूर्त पूछना चाहिये तथा विवाहके लिये जिस प्रकार धनका प्रबन्ध किया जाता है उस प्रकार ही धनकी व्यवस्था इसके लिये करनी चाहिये ।।२।।
नभस्य आश्विनोर्जौं च मार्गशीर्षः शुचिर्नभाः ।
एते मासाः कथारम्भे श्रोतॄणां मोक्षसूचकाः ।।३
मासानां विप्र हेयानि तानि त्याज्यानि सर्वथा ।
सहायाश्चेतरे तत्र कर्तव्याः सोद्यमाश्च ये ।।४
देशे देशे तथा सेयं वार्ता प्रेष्या प्रयत्नतः ।
भविष्यति कथा चात्र आगन्तव्यं कुटुम्बिभिः ।।५
दूरे हरिकथाः केचिद्दूरे चाच्युतकीर्तनाः ।
स्त्रियः शूद्रादयो ये च तेषां बोधो यतो भवेत् ।।६
देशे देशे विरक्ता ये वैष्णवाः कीर्तनोत्सुकाः ।
तेष्वेव पत्रं प्रेष्यं च तल्लेखनमितीरितम् ।।७
सतां समाजो भविता सप्तरात्रं सुदुर्लभः ।
अपूर्वरसरूपैव कथा चात्र भविष्यति ।।८
श्रीभागवतपीयूषपानाय रसलम्पटाः ।
भवन्तश्च तथा शीघ्रमायाता प्रेमतत्पराः ।।९
नावकाशः कदाचिच्चेद् दिनमात्रं तथापि तु ।
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सर्वथाऽऽगमनं कार्यं क्षणोऽत्रैव सुदुर्लभः ॥१० एवमाकारणं तेषां कर्तव्यं विनयेन च । आगन्तुकानां सर्वेषां वासस्थानानि कल्पयेत् ॥११ तीर्थे वापि वने वापि गृहे वा श्रवणं मतम् । विशाला वसुधा यत्र कर्तव्यं तत्कथास्थलम् ॥१२ शोधनं मार्जनं भूमेर्लेपनं धातुमण्डनम् । गृहोपस्करमुद्धृत्य गृहकोणे निवेशयेत् ॥१३ अर्वाक्पञ्चाहतो यत्नादास्तीर्णानि प्रमेलयेत् । कर्तव्यो मण्डपः प्रोच्चैः कदलीखण्डमण्डितः ॥१४ फलपुष्पदलैर्विश्वग्वितानेन विराजितः । चतुर्दिक्षु ध्वजारोपो बहुसम्पद्विराजितः ॥१५
कथा आरम्भ करनेमें भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, आषाढ़ और श्रावण—ये छह महीने श्रोताओंके लिये मोक्षकी प्राप्तिके कारण हैं ॥३॥ देवर्षे! इन महीनोंमें भी भद्रा-व्यतीपात आदि कुयोगोंको सर्वथा त्याग देना चाहिये तथा दूसरे लोग जो उत्साही हों, उन्हें अपना सहायक बना लेना चाहिये ॥४॥ फिर प्रयत्न करके देश-देशान्तरोंमें यह संवाद भेजना चाहिये कि यहाँ कथा होगी, सब लोगोंको सपरिवार पधारना चाहिये ॥५॥ जो स्त्री और शूद्रादि भगवत्कथा एवं संकीर्तनसे दूर पड़ गये हैं। उनको भी सूचना हो जाय, ऐसा प्रबन्ध करना चाहिये ॥६॥ देश-देशमें जो विरक्त वैष्णव और हरिकीर्तनके प्रेमी हों, उनके पास निमन्त्रणपत्र अवश्य भेजे। उसे लिखनेकी विधि इस प्रकार बतायी गयी है ॥७॥ ‘महानुभावो! यहाँ सात दिनतक सत्पुरुषोंका बड़ा दुर्लभ समागम रहेगा और अपूर्व रसमयी श्रीमद्भागवतकी कथा होगी ॥८॥ आपलोग भगवद्रसके रसिक हैं, अतः श्रीभागवतामृतका पान करनेके लिये प्रेमपूर्वक शीघ्र ही पधारनेकी कृपा करें ॥९॥ यदि आपको विशेष अवकाश न हो, तो भी एक दिनके लिये तो अवश्य ही कृपा करनी चाहिये; क्योंकि यहाँका तो एक क्षण भी अत्यन्त दुर्लभ है’ ॥१०॥ इस प्रकार विनयपूर्वक उन्हें निमन्त्रित करे और जो लोग आयें, उनके लिये यथोचित निवास-स्थानका प्रबन्ध करे ॥११॥
कथाका श्रवण किसी तीर्थमें, वनमें अथवा अपने घरपर भी अच्छा माना गया है। जहाँ लम्बा-चौड़ा मैदान हो, वहीं कथास्थल रखना चाहिये ॥१२॥ भूमिका शोधन, मार्जन और लेपन करके रंग-बिरंगी धातुओंसे चौक पूरे। घरकी सारी सामग्री उठाकर एक कोनेमें रख दे ॥१३॥ पाँच दिन पहलेसे ही यत्नपूर्वक बहुत-से बिछानेके वस्त्र एकत्र कर ले तथा केलेके खंभोंसे सुशोभित एक ऊँचा मण्डप तैयार कराये ॥१४॥ उसे सब ओर फल, पुष्प, पत्र और चँदोवेसे अलंकृत करे तथा चारों ओर झंडियाँ लगाकर तरह-तरहके सामानोंसे सजा दे ॥१५॥ उस मण्डपमें कुछ ऊँचाईपर सात विशाल लोकोंकी कल्पना करे और उनमें विरक्त ब्राह्मणोंको बुला-बुलाकर बैठाये ॥१६॥ आगेकी ओर उनके लिये वहाँ यथोचित आसन
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तैयार रखे। इनके पीछे वक्ताके लिये भी एक दिव्य सिंहासनका प्रबन्ध करे ॥१७॥ यदि वक्ताका मुख उत्तरकी ओर रहे तो श्रोता पूर्वाभिमुख होकर बैठे और यदि वक्ता पूर्वाभिमुख रहे तो श्रोताको उत्तरकी ओर मुख करके बैठना चाहिये ॥१८॥ अथवा वक्ता और श्रोताको पूर्वमुख होकर बैठना चाहिये। देश-काल आदिको जाननेवाले महानुभावोंने श्रोताके लिये ऐसा ही नियम बताया है ॥१९॥ जो वेद-शास्त्रकी स्पष्ट व्याख्या करनेमें समर्थ हो, तरह-तरहके दृष्टान्त दे सकता हो तथा विवेकी और अत्यन्त निःस्पृह हो, ऐसे विरक्त और विष्णुभक्त ब्राह्मणको वक्ता बनाना चाहिये ॥२०॥ श्रीमद्भागवतके प्रवचनमें ऐसे लोगोंको नियुक्त नहीं करना चाहिये जो पण्डित होनेपर भी अनेक धर्मोंके चक्करमें पड़े हुए, स्त्री-लम्पट एवं पाखण्डके प्रचारक हों ॥२१॥ वक्ताके पास ही उसकी सहायताके लिये एक वैसा ही विद्वान् और स्थापित करना चाहिये। वह भी सब प्रकारके संशयोंकी निवृत्ति करनेमें समर्थ और लोगोंको समझानेमें कुशल हो ॥२२॥
ऊर्ध्वं सप्तैव लोकाश्च कल्पनीयाः सविस्तरम् ।
तेषु विप्रा विरक्ताश्च स्थापनीयाः प्रबोध्य च ॥१६
पूर्वं तेषामासनानि कर्तव्यानि यथोत्तरम् ।
वक्तुश्चापि तदा दिव्यमासनं परिकल्पयेत् ॥१७
उदङ्मुखो भवेद्वक्ता श्रोता वै प्राङ्मुखस्तदा ।
प्राङ्मुखश्चेद्भवेद्वक्ता श्रोता चोदङ्मुखस्तदा ॥१८
अथवा पूर्वदिग्ज्ञेया पूज्यपूजकमध्यतः ।
श्रोतॄणामागमे प्रोक्ता देशकालादिकोविदैः ॥१९
विरक्तो वैष्णवो विप्रो वेदशास्त्रविशुद्धिकृत् ।
दृष्टान्तकुशलो धीरो वक्ता कार्योऽतिनिःस्पृहः ॥२०
अनेकधर्मविभ्रान्ताः स्त्रैणाः पाखण्डवादिनः ।
शुकशास्त्रकथोच्चारे त्याज्यास्ते यदि पण्डिताः ॥२१
वक्तुः पार्श्वे सहायार्थमन्यः स्थाप्यस्तथाविधः ।
पण्डितः संशयच्छेत्ता लोकबोधनतत्परः ॥२२
वक्त्रा क्षौरं प्रकर्तव्यं दिनादर्वाग्व्रताप्तये ।
अरुणोदयेऽसौ निर्वर्त्य शौचं स्नानं समाचरेत् ॥२३
नित्यं संक्षेपतः कृत्वा संध्याद्यं स्वं प्रयत्नतः ।
कथाविघ्नविघाताय गणनाथं प्रपूजयेत् ॥२४
पितॄन् संतर्प्य शुद्ध्यर्थं प्रायश्चित्तं समाचरेत् ।
मण्डलं च प्रकर्तव्यं तत्र स्थाप्यो हरिस्तथा ॥२५
कृष्णमुद्दिश्य मन्त्रेण चरेत्पूजाविधिं क्रमात् ।
प्रदक्षिणनमस्कारान् पूजान्ते स्तुतिमाचरेत् ।।२६
कथा-प्रारम्भके दिनसे एक दिन पूर्व व्रत ग्रहण करनेके लिये वक्ताको क्षौर करा लेना चाहिये। तथा अरुणोदयके समय शौचसे निवृत्त होकर अच्छी तरह स्नान करे ।।२३।। और संध्यादि अपने नित्यकर्मोंको संक्षेपसे समाप्त करके कथाके विघ्नोंकी निवृत्तिके लिये गणेशजीका पूजन करे ।।२४।।
तदनन्तर पितृगणका तर्पण कर पूर्व पापोंकी शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त करे और एक मण्डल बनाकर उसमें श्रीहरिको स्थापित करे ।।२५।।
फिर भगवान् श्रीकृष्णको लक्ष्य करके मन्त्रोच्चारणपूर्वक क्रमशः षोडशोपचारविधिसे पूजन करे और उसके पश्चात् प्रदक्षिणा तथा नमस्कारादि कर इस प्रकार स्तुति करे ।।२६।।
संसारसागरे मग्नं दीनं मां करुणानिधे । कर्ममोहगृहीताङ्गं मामुद्धर भवार्णवात् ।।२७ श्रीमद्भागवतस्यापि ततः पूजा प्रयत्नतः । कर्तव्या विधिना प्रीत्या धूपदीपसमन्विता ।।२८ ततस्तु श्रीफलं धृत्वा नमस्कारं समाचरेत् । स्तुतिः प्रसन्नचित्तेन कर्तव्या केवलं तदा ।।२९ श्रीमद्भागवताख्योऽयं प्रत्यक्षः कृष्ण एव हि । स्वीकृतोऽसि मया नाथ मुक्त्यर्थं भवसागरे ।।३० मनोरथो मदीयोऽयं सफलः सर्वथा त्वया । निर्विघ्नेनैव कर्तव्यो दासोऽहं तव केशव ।।३१ एवं दीनवचः प्रोच्य वक्तारं चाथ पूजयेत् । सम्भूष्य वस्त्रभूषाभिः पूजान्ते तं च संस्तवेत् ।।३२ शुकरूप प्रबोधज्ञ सर्वशास्त्रविशारद । एतत्कथाप्रकाशेन मदज्ञानं विनाशय ।।३३ तदग्रे नियमः पश्चात्कर्तव्यः श्रेयसे मुदा । सप्तरात्रं यथाशक्त्या धारणीयः स एव हि ।।३४ वरणं पञ्चविप्राणां कथाभङ्गनिवृत्तये । कर्तव्यं तैर्हरिर्जप्यं द्वादशाक्षरविद्यया ।।३५ ब्राह्मणान् वैष्णवांश्चान्यांस्तथा कीर्तनकारिणः । नत्वा सम्पूज्य दत्ताज्ञः स्वयमासनमाविशेत् ।।३६ लोकवित्तधनागारपुत्रचिन्तां व्युदस्य च । कथाचित्तः शुद्धमतिः स लभेत्फलमुत्तमम् ।।३७
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आसूर्योदयमारभ्य सार्धत्रिप्रहरान्तकम् । वाचनीया कथा सम्यग्धीरकण्ठं सुधीमता ।।३८ कथाविरामः कर्तव्यो मध्याह्ने घटिकाद्वयम् । तत्कथामनु कार्यं वै कीर्तनं वैष्णवैस्तदा ।।३९
‘करुणानिधान! मैं संसारसागरमें डूबा हुआ और बड़ा दीन हूँ। कर्मोंके मोहरूपी ग्राहने मुझे पकड़ रखा है। आप इस संसारसागरसे मेरा उद्धार कीजिये’ ।।२७।। इसके पश्चात् धूप-दीप आदि सामग्रियोंसे श्रीमद्भागवतकी भी बड़े उत्साह और प्रीतिपूर्वक विधि-विधानसे पूजा करे ।।२८।। फिर पुस्तकके आगे नारियल रखकर नमस्कार करे और प्रसन्नचित्तसे इस प्रकार स्तुति करे— ।।२९।। ‘श्रीमद्भागवतके रूपमें आप साक्षात् श्रीकृष्णचन्द्र ही विराजमान हैं। नाथ! मैंने भवसागरसे छुटकारा पानेके लिये आपकी शरण ली है ।।३०।। मेरा यह मनोरथ आप बिना किसी विघ्न-बाधाके सांगोपांग पूरा करें। केशव! मैं आपका दास हूँ’ ।।३१।।
इस प्रकार दीन वचन कहकर फिर वक्ताका पूजन करे। उसे सुन्दर वस्त्राभूषणोंसे विभूषित करे और फिर पूजाके पश्चात् उसकी इस प्रकार स्तुति करे— ।।३२।। ‘शुकस्वरूप भगवन्! आप समझानेकी कलामें कुशल और सब शास्त्रोंमें पारंगत हैं; कृपया इस कथाको प्रकाशित करके मेरा अज्ञान दूर करें’ ।।३३।। फिर अपने कल्याणके लिये प्रसन्नता-पूर्वक उसके सामने नियम ग्रहण करे और सात दिनोंतक यथाशक्ति उसका पालन करे ।।३४।। कथामें विघ्न न हो, इसके लिये पाँच ब्राह्मणोंको और वरण करे; वे द्वादशाक्षर मन्त्रद्वारा भगवान्के नामोंका जप करें ।।३५।। फिर ब्राह्मण, अन्य विष्णुभक्त एवं कीर्तन करनेवालोंको नमस्कार करके उनकी पूजा करे और उनकी आज्ञा पाकर स्वयं भी आसनपर बैठ जाय ।।३६।। जो पुरुष लोक, सम्पत्ति, धन, घर और पुत्रादिकी चिन्ता छोड़कर शुद्धचित्तसे केवल कथामें ही ध्यान रखता है, उसे इसके श्रवणका उत्तम फल मिलता है ।।३७।।
बुद्धिमान् वक्ताको चाहिये कि सूर्योदयसे कथा आरम्भ करके साढ़े तीन पहरतक मध्यम स्वरसे अच्छी तरह कथा बाँचे ।।३८।। दोपहरके समय दो घड़ीतक कथा बंद रखे। उस समय कथाके प्रसंगके अनुसार वैष्णवोंको भगवान्के गुणोंका कीर्तन करना चाहिये—व्यर्थ बातें नहीं करनी चाहिये ।।३९।। कथाके समय मल-मूत्रके वेगको काबूमें रखनेके लिये अल्पाहार सुखकारी होता है; इसलिये श्रोता केवल एक ही समय हविष्यान्न भोजन करे ।।४०।। यदि शक्ति हो तो सातों दिन निराहार रहकर कथा सुने अथवा केवल घी या दूध पीकर सुखपूर्वक श्रवण करे ।।४१।। अथवा फलाहार या एक समय ही भोजन करे। जिससे जैसा नियम सुभीतेसे सध सके, उसीको कथाश्रवणके लिये ग्रहण करे ।।४२।। मैं तो उपवासकी अपेक्षा भोजन करना अच्छा समझता हूँ, यदि वह कथाश्रवणमें सहायक हो। यदि उपवाससे श्रवणमें बाधा पहुँचती हो तो वह किसी कामका नहीं ।।४३।।
मलमूत्रजयार्थं हि लघ्वाहारः सुखावहः । हविष्यान्नेन कर्तव्यो ह्येकवारं कथार्थिना ।।४०
उपोष्य सप्तरात्रं वै शक्तिश्चेच्छृणुयात्तदा । घृतपानं पयःपानं कृत्वा वै शृणुयात्सुखम् ॥४१ फलाहारेण वा भाव्यमेकभुक्तेन वा पुनः । सुखसाध्यं भवेद्यत्तु कर्तव्यं श्रवणाय तत् ॥४२ भोजनं तु वरं मन्ये कथाश्रवणकारकम् । नोपवासो वरः प्रोक्तः कथाविघ्नकरो यदि ॥४३ सप्ताहव्रतिनां पुंसां नियमाञ्छृणु नारद । विष्णुदीक्षाविहीनानां नाधिकारः कथाश्रवे ॥४४ ब्रह्मचर्यमधःसुप्तिः पत्रावल्यां च भोजनम् । कथासमाप्तौ भुक्तिं च कुर्यान्नित्यं कथाव्रती ॥४५ द्विदलं मधु तैलं च गरिष्ठान्नं तथैव च । भावदुष्टं पर्युषितं जह्यान्नित्यं कथाव्रती ॥४६ कामं क्रोधं मदं मानं मत्सरं लोभमेव च । दम्भं मोहं तथा द्वेषं दूरयेच्च कथाव्रती ॥४७ वेदवैष्णवविप्राणां गुरुगोव्रतिनां तथा । स्त्रीराजमहतां निन्दां वर्जयेद्यः कथाव्रती ॥४८ रजस्वलान्त्यजम्लेच्छपतितव्रात्यकैस्तथा । द्विजद्विड्वेदबाह्यैश्च न वदेद्यः कथाव्रती ॥४९ सत्यं शौचं दयां मौनमार्जवं विनयं तथा । उदारमानसं तद्वद्देवं कुर्यात्कथाव्रती ॥५० दरिद्रश्च क्षयी रोगी निर्भाग्यः पापकर्मवान् । अनपत्यो मोक्षकामः शृणुयाच्च कथामिमाम् ॥५१ अपुष्पा काकवन्ध्या च वन्ध्या या च मृतार्भका । स्रवद्गर्भा च या नारी तया श्राव्या प्रयत्नतः ॥५२ एतेषु विधिना श्रावे तदक्षयतरं भवेत् । अत्युत्तमा कथा दिव्या कोटियज्ञफलप्रदा ॥५३
नारदजी! नियमसे सप्ताह सुननेवाले पुरुषोंके नियम सुनिये। विष्णुभक्तकी दीक्षासे रहित पुरुष कथाश्रवणका अधिकारी नहीं है ॥४४॥ जो पुरुष नियमसे कथा सुने, उसे ब्रह्मचर्यसे रहना, भूमिपर सोना और नित्यप्रति कथा समाप्त होनेपर पत्तलमें भोजन करना चाहिये ॥४५॥ दाल, मधु, तेल, गरिष्ठ अन्न, भावदूषित पदार्थ और बासी अन्न—इनका उसे
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सर्वदा ही त्याग करना चाहिये ।।४६।। काम, क्रोध, मद, मान, मत्सर, लोभ, दम्भ, मोह और द्वेषको तो अपने पास भी नहीं फटकने देना चाहिये ।।४७।। वह वेद, वैष्णव, ब्राह्मण, गुरु, गोसेवक तथा स्त्री, राजा और महापुरुषोंकी निन्दासे भी बचे ।।४८।। नियमसे कथा सुननेवाले पुरुषको रजस्वला स्त्री, अन्त्यज, म्लेच्छ, पतित, गायत्रीहीन द्विज, ब्राह्मणोंसे द्वेष करनेवाले तथा वेदको न माननेवाले पुरुषोंसे बात नहीं करनी चाहिये ।।४९।। सर्वदा सत्य, शौच, दया, मौन, सरलता, विनय और उदारताका बर्ताव करना चाहिये ।।५०।। धनहीन, क्षयरोगी, किसी अन्य रोगसे पीड़ित, भाग्यहीन, पापी, पुत्रहीन और मुमुक्षु भी यह कथा श्रवण करे ।।५१।। जिस स्त्रीका रजोदर्शन रुक गया हो, जिसके एक ही संतान होकर रह गयी हो, जो बाँझ हो, जिसकी संतान होकर मर जाती हो अथवा जिसका गर्भ गिर जाता हो, वह यत्नपूर्वक इस कथाको सुने ।।५२।। ये सब यदि विधिवत् कथा सुनें तो इन्हें अक्षय फलकी प्राप्ति हो सकती है। यह अत्युत्तम दिव्य कथा करोड़ों यज्ञोंका फल देनेवाली है ।।५३।।
एवं कृत्वा व्रतविधिमुद्यापनमथाचरेत् ।
जन्माष्टमीव्रतमिव कर्तव्यं फलकाङ्क्षिभिः ।।५४
अकिञ्चनेषु भक्तेषु प्रायो नोद्यापनाग्रहः ।
श्रवणेनैव पूतास्ते निष्कामा वैष्णवा यतः ।।५५
एवं नगाहयज्ञेऽस्मिन् समाप्ते श्रोतृभिस्तदा ।
पुस्तकस्य च वक्तुश्च पूजा कार्यातिभक्तितः ।।५६
प्रसादतुलसीमाला श्रोतृभ्यश्चाथ दीयताम् ।
मृदङ्गातालललितं कर्तव्यं कीर्तनं ततः ।।५७
जयशब्दं नमःशब्दं शङ्खशब्दं च कारयेत् ।
विप्रेभ्यो याचकेभ्यश्च वित्तमन्नं च दीयताम् ।।५८
विरक्तश्चेद्भवेच्छ्रोता गीता वाच्या परेऽहनि ।
गृहस्थश्चेत्तदा होमः कर्तव्यः कर्मशान्तये ।।५९
प्रतिश्लोकं तु जुहुयाद्विधिना दशमस्य च ।
पायसं मधु सर्पिश्च तिलान्नादिक्संयुतम् ।।६०
अथवा हवनं कुर्याद्गायत्र्या सुसमाहितः ।
तन्मयत्वात्पुराणस्य परमस्य च तत्त्वतः ।।६१
होमाशक्तौ बुधो हৌম्यं दद्यात्तत्फलसिद्धये ।
नानाच्छिद्रनिरोधार्थं न्यूनताधिकतानयोः ।।६२
दोषयोः प्रशमार्थं च पठेन्नामसहस्रकम् ।
तेन स्यात्सफलं सर्वं नास्त्यस्मादधिकं यतः ।।६३
द्वादश ब्राह्मणान् पश्चाद्भोजयेन्मधुपायसैः । दद्यात्सुवर्णं धेनुं च व्रतपूर्णत्वहेतवे ।।६४ शक्तौ पलत्रयमितं स्वर्णसिंहं विधाय च । तत्रास्य पुस्तकं स्थाप्यं लिखितं ललिताक्षरम् ।।६५ सम्पूज्यावाहनाद्यैस्तदुपचारैः सदक्षिणम् । वस्त्रभूषणगन्धाद्यैः पूजिताय यतात्मने ।।६६
इस प्रकार इस व्रतकी विधियोंका पालन करके फिर उद्यापन करे। जिन्हें इसके विशेष फलकी इच्छा हो, वे जन्माष्टमीव्रतके समान ही इस कथाव्रतका उद्यापन करें ।।५४।। किन्तु जो भगवान्के अकिंचन भक्त हैं, उनके लिये उद्यापनका कोई आग्रह नहीं है। वे श्रवणसे ही पवित्र हैं; क्योंकि वे तो निष्काम भगवद्भक्त हैं ।।५५।।
इस प्रकार जब सप्ताहयज्ञ समाप्त हो जाय, तब श्रोताओंको अत्यन्त भक्तिपूर्वक पुस्तक और वक्ताकी पूजा करनी चाहिये ।।५६।। फिर वक्ता श्रोताओंको प्रसाद, तुलसी और प्रसादी मालाएँ दे तथा सब लोग मृदंग और झाँझकी मनोहर ध्वनिसे सुन्दर कीर्तन करें ।।५७।। जय-जयकार, नमस्कार और शंखध्वनिका घोष कराये तथा ब्राह्मण और याचकोंको धन और अन्न दे ।।५८।। श्रोता विरक्त हो तो कर्मकी शान्तिके लिये दूसरे दिन गीतापाठ करे; गृहस्थ हो तो हवन करे ।।५९।। उस हवनमें दशमस्कन्धका एक-एक श्लोक पढ़कर विधिपूर्वक खीर, मधु, घृत, तिल और अन्नादि सामग्रियोंसे आहुति दे ।।६०।।
अथवा एकाग्रचित्तसे गायत्री-मन्त्रद्वारा हवन करे; क्योंकि तत्त्वतः यह महापुराण गायत्रीस्वरूप ही है ।।६१।। होम करनेकी शक्ति न हो तो उसका फल प्राप्त करनेके लिये ब्राह्मणोंको हवनसामग्री दान करे तथा नाना प्रकारकी त्रुटियोंको दूर करनेके लिये और विधिमें फिर जो न्यूनाधिकता रह गयी हो, उसके दोषोंकी शान्तिके लिये विष्णुसहस्रनामका पाठ करे। उससे सभी कर्म सफल हो जाते हैं; क्योंकि कोई भी कर्म इससे बढ़कर नहीं है ।।६२-६३।।
फिर बारह ब्राह्मणोंको खीर और मधु आदि उत्तम-उत्तम पदार्थ खिलाये तथा व्रतकी पूर्तिके लिये गौ और सुवर्णका दान करे ।।६४।। सामर्थ्य हो तो तीन तोले सोनेका एक सिंहासन बनवाये, उसपर सुन्दर अक्षरोंमें लिखी हुई श्रीमद्भागवतकी पोथी रखकर उसकी आवाहनादि विविध उपचारोंसे पूजा करे और फिर जितेन्द्रिय आचार्यको—उसका वस्त्र, आभूषण एवं गन्धादिसे पूजनकर—दक्षिणाके सहित समर्पण कर दे ।।६५-६६।। यों करनेसे वह बुद्धिमान् दाता जन्म-मरणके बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है। यह सप्ताहपारायणकी विधि सब पापोंकी निवृत्ति करनेवाली है। इसका इस प्रकार ठीक-ठीक पालन करनेसे यह मंगलमय भागवतपुराण अभीष्ट फल प्रदान करता है तथा अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष—चारोंकी प्राप्तिका साधन हो जाता है—इसमें सन्देह नहीं ।।६७-६८।।
आचार्याय सुधीर्दत्त्वा मुक्तः स्याद्भवबन्धनैः ।
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एवं कृते विधाने च सर्वपापनिवारणे ॥६७
फलदं स्यात्पुराणं तु श्रीमद्भागवतं शुभम् । धर्मकामार्थमोक्षाणां साधनं स्यान्न संशयः ॥६८
कुमारा ऊचुः
इति ते कथितं सर्वं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि । श्रीमद्भागवतेनैव भुक्तिमुक्ती करे स्थिते ॥६९
सूत उवाच
इत्युक्त्वा ते महात्मानः प्रोचुर्भागवतीं कथाम् । सर्वपापहरां पुण्यां भुक्तिमुक्तिप्रदायिनीम् ॥७०
शृण्वतां सर्वभूतानां सप्ताहं नियतात्मनाम् । यथाविधि ततो देवं तुष्टुवुः पुरुषोत्तमम् ॥७१
तदन्ते ज्ञानवैराग्यभक्तीनां पुष्टता परा । तारुण्यं परमं चाभूत्सर्वभूतमनोहरम् ॥७२
नारदश्च कृतार्थोऽभूत्सिद्धे स्वीये मनोरथे । पुलकीकृतसर्वाङ्गः परमानन्दसम्भृतः ॥७३
एवं कथां समाकर्ण्य नारदो भगवत्प्रियः । प्रेमगद्गदया वाचा तानुवाच कृताञ्जलिः ॥७४
नारद उवाच
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि भवद्भिः करुणापरैः । अद्य मे भगवाँल्लब्धः सर्वपापहरो हरिः ॥७५
श्रवणं सर्वधर्मेभ्यो वरं मन्ये तपोधनाः । वैकुण्ठस्थो यतः कृष्णः श्रवणाद्यस्य लभ्यते ॥७६
सनकादि कहते हैं—नारदजी! इस प्रकार तुम्हें यह सप्ताहश्रवणकी विधि हमने पूरी-पूरी सुना दी, अब और क्या सुनना चाहते हो? इस श्रीमद्भागवतसे भोग और मोक्ष दोनों ही हाथ लग जाते हैं ॥६९॥
सूतजी कहते हैं—शौनकजी! यों कहकर महामुनि सनकादिने एक सप्ताहतक विधिपूर्वक इस सर्वपापनाशिनी, परम पवित्र तथा भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली भागवतकथाका प्रवचन किया। सब प्राणियोंने नियमपूर्वक इसे श्रवण किया। इसके पश्चात् उन्होंने विधिपूर्वक भगवान् पुरुषोत्तमकी स्तुति की ॥७०-७१॥ कथाके अन्तमें ज्ञान, वैराग्य और भक्तिको बड़ी पुष्टि मिली और वे तीनों एकदम तरुण होकर सब जीवोंका चित्त अपनी ओर आकर्षित करने लगे ॥७२॥ अपना मनोरथ पूरा होनेसे नारदजीको भी बड़ी प्रसन्नता हुई, उनके सारे शरीरमें रोमाञ्च हो आया और वे परमानन्दसे पूर्ण हो गये ॥७३॥ इस प्रकार कथा श्रवणकर भगवान्के प्यारे नारदजी हाथ जोड़कर प्रेमगद्गद वाणीसे सनकादिसे कहने लगे ॥७४॥
नारदजीने कहा—मैं धन्य हूँ, आपलोगोंने करुणा करके मुझे बड़ा ही अनुगृहीत किया है, आज मुझे सर्वपापहारी भगवान् श्रीहरिकी ही प्राप्ति हो गयी ॥७५॥ तपोधनो! मैं श्रीमद्भागवतश्रवणको ही सब धर्मोंसे श्रेष्ठ मानता हूँ; क्योंकि जिसके श्रवणसे वैकुण्ठ (गोलोक)-विहारी श्रीकृष्णकी प्राप्ति होती है ॥७६॥
सूत उवाच
एवं ब्रुवति वै तत्र नारदे वैष्णवोत्तमे ।
परिभ्रमन् समायातः शुको योगेश्वरस्तदा ॥७७
तत्राययौ षोडशवार्षिकस्तदा
व्यासात्मजो ज्ञानमहाब्धिचन्द्रमाः ।
कथावसाने निजलाभपूर्णः
प्रेम्णा पठन् भागवतं शनैः शनैः ॥७८
दृष्ट्वा सदस्याः परमोरुतेजसं
सद्यः समुत्थाय ददुर्महासनम् ।
प्रीत्या सुरर्षिस्तमपूजयत्सुखं
स्थितोऽवदत्संशृणुतामलां गिरम् ॥७९
श्रीशुक उवाच
निगमकल्पतरोर्गलितं फलं
शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम् ।
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