भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1379

आत्मनोऽन्यस्य वा दिष्टं दैवेनापोहितुं द्वयोः । अथासौ शक्तिभिः स्वाभिः शम्भोः प्राधानिकं व्यधात् ।।६५

धर्मज्ञानविरक्त्यृद्धितपोविद्याक्रियादिभिः । रथं सूतं ध्वजं वाहान्धनुर्वर्म शरादि यत् ।।६६

सन्नद्धो रथमास्थाय शरं धनुरुपाददे । शरं धनुषि सन्धाय मुहूर्तेऽभिजितीश्वरः ।।६७

ददाह तेन दुर्भेद्या हरोऽथ त्रिपुरो नृप । दिवि दुन्दुभयो नेदुर्विमानशतसङ्कुलाः ।।६८

देवर्षिपितृसिद्धेशा जयेति कुसुमोत्करैः । अवाकिरञ्जगुर्हृष्टा ननृतुश्चाप्सरोगणाः ।।६९

एवं दग्ध्वा पुरस्तिस्रो भगवान्पुरहा नृप । ब्रह्मादिभिः स्तूयमानः स्वधाम प्रत्यपद्यत ।।७०

एवंविधान्यस्य हरेः स्वमायया विडम्बमानस्य नृलोकमात्मनः । वीर्याणि गीतान्वृषिभिर्जगद्गुरो- र्लोकान् पुनानान्यपरं वदामि किम् ।।७१

यद्यपि उसके रक्षक दैत्य इन दोनोंको देख रहे थे, फिर भी भगवान्की मायासे वे इतने मोहित हो गये कि इन्हें रोक न सके। जब उपाय जाननेवालोंमें श्रेष्ठ मयासुरको यह बात मालूम हुई, तब भगवान्की इस लीलाका स्मरण करके उसे कोई शोक न हुआ। शोक करनेवाले अमृत-रक्षकोंसे उसने कहा—‘भाई! देवता, असुर, मनुष्य अथवा और कोई भी प्राणी अपने, पराये अथवा दोनोंके लिये जो प्रारब्धका विधान है, उसे मिटा नहीं सकता। जो होना था, हो गया। शोक करके क्या करना है?' इसके बाद भगवान् श्रीकृष्णने अपनी शक्तियोंके द्वारा भगवान् शंकरके युद्धकी सामग्री तैयार की ।।६३-६५।। उन्होंने धर्मसे रथ, ज्ञानसे सारथि, वैराग्यसे ध्वजा, ऐश्वर्यसे घोड़े, तपस्यासे धनुष, विद्यासे कवच, क्रियासे बाण और अपनी अन्यान्य शक्तियोंसे अन्यान्य वस्तुओंका निर्माण किया ।।६६।। इन सामग्रियोंसे सज-धजकर भगवान् शंकर रथपर सवार हुए एवं धनुष-बाण धारण किया। भगवान् शंकरने अभिजित् मुहूर्तमें धनुषपर बाण चढ़ाया और उन तीनों दुर्भेद्य विमानोंको भस्म कर दिया। युधिष्ठिर! उसी समय स्वर्गमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं। सैकड़ों

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