श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविमानोंकी भीड़ लग गयी ।।६७-६८।। देवता, ऋषि, पितर और सिद्धेश्वर आनन्दसे जय-जयकार करते हुए पुष्पोंकी वर्षा करने लगे। अप्सराएँ नाचने और गाने लगीं ।।६९।। युधिष्ठिर! इस प्रकार उन तीनों पुरोंको जलाकर भगवान् शंकरने ‘पुरारि’की पदवी प्राप्त की और ब्रह्मादिकोंकी स्तुति सुनते हुए अपने धामको चले गये ।।७०।। आत्मस्वरूप जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्ण इस प्रकार अपनी मायासे जो मनुष्योंकी-सी लीलाएँ करते हैं, ऋषिलोग उन्हीं अनेकों लोकपावन लीलाओंका गान किया करते हैं। बताओ, अब मैं तुम्हें और क्या सुनाऊँ? ।।७१।।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे युधिष्ठिरनारदसंवादे त्रिपुरविजयो नाम दशमोऽध्यायः ।।१०।।
१. प्रा० पा०—नैतेषु। २. प्रा० पा०—घटते। ३. प्रा० पा०—रिह। ४. प्रा० पा०—दास्यसि। १. प्रा० पा०—बलोन्मत्तः । २. प्रा० पा०—ते। ३. प्रा० पा०—तन्नियतोऽधुना। १. प्रा० पा०—लोकान्। २. प्रा० पा०—यान्ति। ३. प्रा० पा०—सर्वाश्रयं ब्रह्म। ४. प्रा० पा०—वस्तु तदानुव०।
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