भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,617 पृष्ठ

पृष्ठ 1506, कुल 1617 में से

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पृष्ठ 1506

सृष्टो दैत्येन सुमहान्वह्निः श्वसनसारथिः । सांवर्तक इवात्युग्रो विबुधध्वजिनीमधाक् ॥५०

ततः समुद्र उद्वेलः सर्वतः प्रत्यदृश्यत । प्रचण्डवातैरुद्भूततरङ्गावर्तभीषणः ॥५१

एवं दैत्यैर्महामायैरलक्ष्यगतिभीषणैः । सृज्यमानासु मायासु विषेदुः सुरसैनिकाः ॥५२

न१ तत्प्रतिविधिं यत्र विदुरिन्द्रादयो नृप । ध्यातः प्रादुरभूत् तत्र२ भगवान्विश्वभावनः ॥५३

ततः सुपर्णांसकृताङ्घ्रिपल्लवः पिशङ्गवासा नवकञ्जलोचनः । अदृश्यताष्टायुधबाहुरुल्लस- च्छ्रीकौस्तुभानर्घ्यकिरीटकुण्डलः ॥५४

तत्पश्चात् बड़े-बड़े साँप, दन्दशूक, बिच्छू और अन्य विषैले जीव उछल-उछलकर काटने और डंक मारने लगे। सिंह, बाघ और सूअर देवसेनाके बड़े-बड़े हाथियोंको फाड़ने लगे ॥४७॥ परीक्षित्! हाथोंमें शूल लिये ‘मारो-काटो’ इस प्रकार चिल्लाती हुई सैकड़ों नंग-धड़ंग राक्षसियाँ और राक्षस भी वहाँ प्रकट हो गये ॥४८॥ कुछ ही क्षण बाद आकाशमें बादलोंकी घनघोर घटाएँ मँडराने लगीं, उनके आपसमें टकरानेसे बड़ी गहरी और कठोर गर्जना होने लगी, बिजलियाँ चमकने लगीं और आँधीके झकझोरनेसे बादल अंगारोंकी वर्षा करने लगे ॥४९॥ दैत्यराज बलिने प्रलयकी अग्निके समान बड़ी भयानक आगकी सृष्टि की। वह बात-की-बातमें वायुकी सहायतासे देवसेनाको जलाने लगी ॥५०॥ थोड़ी ही देरमें ऐसा जान पड़ा कि प्रबल आँधीके थपेड़ोंसे समुद्रमें बड़ी-बड़ी लहरें और भयानक भँवर उठ रहे हैं और वह अपनी मर्यादा छोड़कर चारों ओरसे देवसेनाको घेरता हुआ उमड़ा आ रहा है ॥५१॥

इस प्रकार जब उन भयानक असुरोंने बहुत बड़ी मायाकी सृष्टि की और स्वयं अपनी मायाके प्रभावसे छिप रहे—न दीखनेके कारण उनपर प्रहार भी नहीं किया जा सकता था तब देवताओंके सैनिक बहुत दुःखी हो गये ॥५२॥ परीक्षित्! इन्द्र आदि देवताओंने उनकी मायाका प्रतीकार करनेके लिये बहुत कुछ सोचा-विचारा, परन्तु उन्हें कुछ न सूझा। तब उन्होंने विश्वके जीवनदाता भगवान्‌का ध्यान किया और ध्यान करते ही वे वहीं प्रकट हो गये ॥५३॥ बड़ी ही सुन्दर झाँकी थी। गरुड़के कंधेपर उनके चरण-कमल विराजमान थे। नवीन कमलके समान बड़े ही कोमल नेत्र थे। पीताम्बर धारण किये हुए थे। आठ भुजाओंमें **ebook converter DEMO Watermarks***

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