श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1507, कुल 1617 में से
संदर्भ में पढ़ेंआठ आयुध, गलेमें कौस्तुभमणि, मस्तकपर अमूल्य मुकुट एवं कानोंमें कुण्डल झलमला रहे थे। देवताओंने अपने नेत्रोंसे भगवान्की इस छविका दर्शन किया ।।५४।।
तस्मिन्प्रविष्टेऽसुरकूटकर्मजा माया विनेशुर्महिना महीयसः । स्वप्नो यथा हि प्रतिबोध आगते हरिस्मृतिः सर्वविपद्विमोक्षणम् ।।५५
दृष्ट्वा मृधे गरुडवाहमिवारिवाह आविध्य शूलमहिनोदथ कालनेमिः । तल्लीलया गरुडमूर्ध्नि पतद् गृहीत्वा तेनाहनन्नृप सवाहमरिं त्र्यधीशः ।।५६
माली सुमाल्यतिबलौ युधि पेततुर्य- च्चक्रेण कृत्तशिरसावथ माल्यवांस्तम् । आहत्य तिग्मगदयाहनदण्डजेन्द्रं तावच्छिरोऽच्छिनदरेर्नदतोऽरिणाऽऽद्यः ।।५७
परम पुरुष परमात्माके प्रकट होते ही उनके प्रभावसे असुरोंकी वह कपटभरी माया विलीन हो गयी—ठीक वैसे ही जैसे जग जानेपर स्वप्नकी वस्तुओंका पता नहीं चलता। ठीक ही है, भगवान्की स्मृति समस्त विपत्तियोंसे मुक्त कर देती है ।।५५।। इसके बाद कालनेमि दैत्यने देखा कि लड़ाईके मैदानमें गरुडवाहन भगवान् आ गये हैं तब उसने अपने सिंहपर बैठे-ही-बैठे बड़े वेगसे उनके ऊपर एक त्रिशूल चलाया। वह गरुडके सिरपर लगनेवाला ही था कि खेल-खेलमें भगवान्ने उसे पकड़ लिया और उसी त्रिशूलसे उसके चलानेवाले कालनेमि दैत्य तथा उसके वाहनको मार डाला ।।५६।। माली और सुमाली—दो दैत्य बड़े बलवान् थे, भगवान्ने युद्धमें अपने चक्रसे उनके सिर भी काट डाले और वे निर्जीव होकर गिर पड़े। तदनन्तर माल्यवान्ने अपनी प्रचण्ड गदासे गरुड़पर बड़े वेगके साथ प्रहार किया। परन्तु गर्जना करते हुए माल्यवान्के प्रहार करते-न-करते ही भगवान्ने चक्रसे उसके सिरको भी धड़से अलग कर दिया ।।५७।।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामष्टमस्कन्धे देवासुरसंग्रामे दशमोऽध्यायः ।।१०।।
१. प्रा० पा०—भेरीणां निःस्वनो। २. प्रा० पा०—नरैः खगैः। ३. प्रा० पा०—मृगैरन्ये। ४. प्रा० पा०—महायुधैर्व्रज०। १. प्रा० पा०—मर्पयत्। २. प्रा० पा०—यष्ट्यः। ३. प्रा० पा०—यद्यद्ददुर्मर्ष आदद्यात्०।