श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1521, कुल 1617 में से
संदर्भ में पढ़ेंकौतूहलाय दैत्यानां योषिद्वेषो मया कृतः । पश्यता सुरकार्याणि गते पीयूषभाजने ॥ १५
तत्तेऽहं दर्शयिष्यामि दिदृक्षोः सुरसत्तम । कामिनां बहु मन्तव्यं सङ्कल्पप्रभवोदयम् ॥ १६
श्रीशुक उवाच
इति ब्रुवाणो भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत । सर्वतश्चारयंश्चक्षुर्भव आस्ते सहोमया ॥ १७
ततो ददर्शोपवने वरस्त्रियं विचित्रपुष्पारुणपल्लवद्रुमे ।
विक्रीडतीं कन्दुकलीलया लसद् दुकूलपर्यस्तनितम्बमेखलाम् ॥ १८
आवर्तनोद्वर्तनकम्पितस्तन- प्रकृष्टहारोरुभरैः पदे पदे । प्रभज्यमानामिव मध्यतश्चलत्- पदप्रवालं नयतीं ततस्ततः ॥ १९
दिक्षु भ्रत्मकन्दुकचापलैर्भृशं प्रोद्विग्नतारायतलोललोचनाम् । स्वकर्णविभ्राजितकुण्डलोल्लसत्- कपोलनीलालकमण्डिताननाम् ॥ २०
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—जब भगवान् शंकरने विष्णुभगवान्से यह प्रार्थना की, तब वे गम्भीरभावसे हँसकर शंकरजीसे बोले ॥ १४॥
श्रीविष्णुभगवान्ने कहा—शंकरजी! उस समय अमृतका कलश दैत्योंके हाथमें चला गया था। अतः देवताओंका काम बनानेके लिये और दैत्योंका मन एक नये कौतूहलकी ओर खींच लेनेके लिये ही मैंने वह स्त्रीरूप धारण किया था ॥ १५॥ देवशिरोमणे! आप उसे देखना चाहते हैं, इसलिये मैं आपको वह रूप दिखाऊँगा। परन्तु वह रूप तो कामी पुरुषोंका ही आदरणीय है, क्योंकि वह कामभावको उत्तेजित करनेवाला है ॥ १६॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—इस तरह कहते-कहते विष्णुभगवान् वहीं अन्तर्धान हो गये
******ebook converter DEMO Watermarks*******