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श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1522

और भगवान् शंकर सती देवीके साथ चारों ओर दृष्टि दौड़ाते हुए वहीं बैठे रहे ।।१७।। इतनेमें ही उन्होंने देखा कि सामने एक बड़ा सुन्दर उपवन है। उसमें भाँति-भाँतिके वृक्ष लग रहे हैं, जो रंग-बिरंगे फूल और लाल-लाल कोंपलोंसे भरे-पूरे हैं। उन्होंने यह भी देखा कि उस उपवनमें एक सुन्दरी स्त्री गेंद उछाल-उछालकर खेल रही है। वह बड़ी ही सुन्दर साड़ी पहने हुए है और उसकी कमरमें करधनीकी लड़ियाँ लटक रही हैं ।।१८।। गेंदके उछालने और लपककर पकड़नेसे उसके स्तन और उनपर पड़े हुए हार हिल रहे हैं। ऐसा जान पड़ता था, मानो इनके भारसे उसकी पतली कमर पग-पगपर टूटते-टूटते बच जाती है। वह अपने लाल-लाल पल्लवोंके समान सुकुमार चरणोंसे बड़ी कलाके साथ ठुमुक-ठुमुक चल रही थी ।।१९।। उछलता हुआ गेंद जब इधर-उधर छलक जाता था, तब वह लपककर उसे रोक लेती थी। इससे उसकी बड़ी-बड़ी चंचल आँखें कुछ उद्विग्न-सी हो रही थीं। उसके कपोलोंपर कानोंके कुण्डलोंकी आभा जगमगा रही थी और घुँघराली काली-काली अलकें उनपर लटक आती थीं, जिससे मुख और भी उल्लसित हो उठता था ।।२०।।

श्लथद् दुकूलं कबरीं च विच्युतां सन्नह्यतीं वामकरेण वल्गुना । विनिघ्नतीमन्यकरेण कन्दुकं विमोहयन्तीं जगदात्ममायया ।।२१

तां वीक्ष्य देव इति कन्दुकलीलयेषद्- व्रीडास्फुटस्मितविसृष्टकटाक्षमुष्टः । स्त्रीप्रेक्षणप्रतिसमीक्षणविह्वलात्मा नात्मानमन्तिक उमां स्वगणांश्च वेद ।।२२

तस्याः कराग्रात् स तु कन्दुको यदा गतो विदूरं तमनुव्रजस्त्रियाः । वासः ससूत्रं लघु मारुतोऽहरद् भवस्य देवस्य किलानुपश्यतः ।।२३

एवं तां रुचिरापाङ्गीं दर्शनीयां मनोरमाम् । दृष्ट्वा तस्यां मनश्चक्रे विषज्जन्त्यां भवः किल ।।२४

तयापहृतविज्ञानस्तत्कृतस्मरविह्वलः¹ । भवान्या अपि पश्यन्त्या गतह्रीस्तत्पदं ययौ ।।२५

सा तमायान्तमालोक्य विवस्त्रा व्रीडिता भृशम् ।