श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्वे नक्षत्रताराद्याश्चक्रुस्तज्जन्म दक्षिणम् ॥५
द्वादश्यां सवितातिष्ठन्मध्यंदिनगतो नृप । विजया नाम सा प्रोक्ता यस्यां जन्म विदुर्हरेः ॥६
शङ्खदुन्दुभयो नेदुर्मृदङ्गपणवानकाः । चित्रवादित्रतूर्याणां निर्घोषस्तुमुलोऽभवत् ॥७
प्रीताश्चाप्सरसोऽनृत्यन्गन्धर्वप्रवरा जगुः । तुष्टुवुर्मुनयो देवा मनवः पितरोऽग्नयः ॥८
सिद्धविद्याधरगणाः सकिम्पुरुषकिन्नराः । चारणा यक्षरक्षांसि सुपर्णा भुजगोत्तमाः ॥९
गायन्तोऽतिप्रशंसन्तो नृत्यन्तो विबुधानुगाः । आदित्या आश्रमपदं कुसुमैः समवाकिरन् ॥१०
दृष्ट्वादितिस्तं निजगर्भसम्भवं परं पुमांसं मुदमाप विस्मिता । गृहीतदेहं निजयोगमायया प्रजापतिश्चाह जयेति विस्मितः ॥११
भगवान् गलेमें अपनी स्वरूपभूत वनमाला धारण किये हुए थे, जिसके चारों ओर झुंड-के-झुंड भौंरे गुंजार कर रहे थे। उनके कण्ठमें कौस्तुभमणि सुशोभित थी। भगवान्की अंगकान्तिसे प्रजापति कश्यपजीके घरका अन्धकार नष्ट हो गया ।।३।। उस समय दिशाएँ निर्मल हो गयीं। नदी और सरोवरोंका जल स्वच्छ हो गया। प्रजाके हृदयमें आनन्दकी बाढ़ आ गयी। सब ऋतुएँ एक साथ अपना-अपना गुण प्रकट करने लगीं। स्वर्गलोक, अन्तरिक्ष, पृथ्वी, देवता, गौ, द्विज और पर्वत—इन सबके हृदयमें हर्षका संचार हो गया ।।४।।
परीक्षित्! जिस समय भगवान्ने जन्म ग्रहण किया, उस समय चन्द्रमा श्रवण नक्षत्रपर थे। भाद्रपद मासके शुक्लपक्षकी श्रवणनक्षत्रवाली द्वादशी थी। अभिजित् मुहूर्तमें भगवान्का जन्म हुआ था। सभी नक्षत्र और तारे भगवान्के जन्मको मंगलमय सूचित कर रहे थे ।।५।। परीक्षित्! जिस तिथिमें भगवान्का जन्म हुआ था, उसे ‘विजया द्वादशी’ कहते हैं। जन्मके समय सूर्य आकाशके मध्यभागमें स्थित थे ।।६।। भगवान्के अवतारके समय शंख, ढोल, मृदंग, डफ और नगाड़े आदि बाजे बजने लगे। इन तरह-तरहके बाजों और तुरहियोंकी तुमुल ध्वनि होने लगी ।।७।।
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