श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1584, कुल 1617 में से
संदर्भ में पढ़ेंलिया, तब ब्रह्मा आदि लोकपालोंने अपने अनुचरोंके साथ बड़े आदरभावसे अपने स्वामी भगवान्को अनेकों प्रकारकी भेंटें समर्पित कीं ।।५।। उन लोगोंने जल-उपहार, माला, दिव्य गन्धोंसे भरे अंगराग, सुगन्धित धूप, दीप, खील, अक्षत, फल, अंकुर, भगवान्की महिमा और प्रभावसे युक्त स्तोत्र, जयघोष, नृत्य, बाजे-गाजे, गान एवं शंख और दुन्दुभिके शब्दोंसे भगवान्की आराधना की ।।६-७।। उस समय ऋक्षराज जाम्बवान् मनके समान वेगसे दौड़कर सब दिशाओंमें भेरी बजा-बजाकर भगवान्की मंगलमय विजयकी घोषणा कर आये ।।८।।
दैत्योंने देखा कि वामनजीने तीन पग पृथ्वी माँगनेके बहाने सारी पृथ्वी ही छीन ली। तब वे सोचने लगे कि हमारे स्वामी बलि इस समय यज्ञमें दीक्षित हैं, वे तो कुछ कहेंगे नहीं। इसलिये बहुत चिढ़कर वे आपसमें कहने लगे ।।९।। 'अरे, यह ब्राह्मण नहीं है। यह सबसे बड़ा मायावी विष्णु है। ब्राह्मणके रूपमें छिपकर यह देवताओंका काम बनाना चाहता है ।।१०।। जब हमारे स्वामी यज्ञमें दीक्षित होकर किसीको किसी प्रकारका दण्ड देनेके लिये उपरत हो गये हैं, तब इस शत्रुने ब्रह्मचारीका वेष बनाकर पहले तो याचना की और पीछे हमारा सर्वस्व हरण कर लिया ।।११।। यों तो हमारे स्वामी सदा ही सत्यनिष्ठ हैं, परन्तु यज्ञमें दीक्षित होनेपर वे इस बातका विशेष ध्यान रखते हैं। वे ब्राह्मणोंके बड़े भक्त हैं तथा उनके हृदयमें दया भी बहुत है। इसलिये वे कभी झूठ नहीं बोल सकते ।।१२।।
तस्मादस्य वधो धर्मो भर्तुः शुश्रूषणं च नः । इत्यायुधानि जगृहुर्बलेरनुचरासुराः ।।१३
ते सर्वे वामनं हन्तुं शूलपट्टिशपाणयः । अनिच्छतो बले राजन् प्राद्रवन् जातमन्यवः ।।१४
तानभिद्रवतो दृष्ट्वा दितिज्ञानीकपान् नृप । प्रहस्यानुचरा विष्णोः प्रत्यषेधन्नुदायुधाः ।।१५
नन्दः सुनन्दोऽथ जयो विजयः प्रबलो बलः । कुमुदः कुमुदाक्षश्च विष्वक्सेनः पतत्त्रिराट् ।।१६
जयन्तः श्रुतदेवश्च पुष्पदन्तोऽथ सात्वतः । सर्वे नागायुतप्राणाश्चमूं ते जघ्नुरासुरीम् ।।१७
हन्यमानान् स्वकान् दृष्ट्वा पुरुषानुचरैर्बलिः । वारयामास संरब्धान् काव्यशापमनुस्मरन् ।।१८
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