श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहे विप्रचित्ते हे राहो हे नेमे श्रूयतां वचः । मा युध्यत निवर्तध्वं न नः कालोऽयमर्थकृत् ॥१९
यः प्रभुः सर्वभूतानां सुखदुःखोपपत्तये । तं नातिवर्तितुं दैत्याः पौरुषैरीश्वरः पुमान् ॥२०
यो नो भवाय प्रागासीदभवाय दिवौकसाम् । स एव भगवानद्य वर्तते तद्विपर्ययम् ॥२१
बलेन सचिवैर्बुद्ध्या दुर्गैर्मन्त्रौषधादिभिः । सामादिभिरुपायैश्च कालं नात्येति वै जनः ॥२२
भवद्भिर्निर्जिता ह्येते बहुशोऽनुचरा हरेः । दैवेनर्द्धैस्त एवाद्य युधि जित्वा नदन्ति नः ॥२३
ऐसी अवस्थामें हमलोगोंका यही धर्म है कि इस शत्रुको मार डालें। इससे हमारे स्वामी बलिकी सेवा भी होती है।' यों सोचकर राजा बलिके अनुचर असुरोंने अपने-अपने हथियार उठा लिये ।।१३।। परीक्षित्! राजा बलिकी इच्छा न होनेपर भी वे सब बड़े क्रोधसे शूल, पट्टिश आदि ले-लेकर वामन-भगवान्को मारनेके लिये टूट पड़े ।।१४।। परीक्षित्! जब विष्णुभगवान्के पार्षदोंने देखा कि दैत्योंके सेनापति आक्रमण करनेके लिये दौड़े आ रहे हैं, तब उन्होंने हँसकर अपने-अपने शस्त्र उठा लिये और उन्हें रोक दिया ।।१५।। नन्द, सुनन्द, जय, विजय, प्रबल, बल, कुमुद, कुमुदाक्ष, विष्वक्सेन, गरुड, जयन्त, श्रुतदेव, पुष्पदन्त और सात्वत—ये सभी भगवान्के पार्षद दस-दस हजार हाथियोंका बल रखते हैं। वे असुरोंकी सेनाका संहार करने लगे ।।१६-१७।। जब राजा बलिने देखा कि भगवान्के पार्षद मेरे सैनिकोंको मार रहे हैं और वे भी क्रोधमें भरकर उनसे लड़नेके लिये तैयार हो रहे हैं, तो उन्होंने शुक्राचार्यके शापका स्मरण करके उन्हें युद्ध करनेसे रोक दिया ।।१८।। उन्होंने विप्रचित्ति, राहु, नेमि आदि दैत्योंको सम्बोधित करके कहा—'भाइयो! मेरी बात सुनो। लड़ो मत, वापस लौट आओ। यह समय हमारे कार्यके अनुकूल नहीं है ।।१९।। दैत्यो! जो काल समस्त प्राणियोंको सुख और दुःख देनेकी सामर्थ्य रखता है—उसे यदि कोई पुरुष चाहे कि मैं अपने प्रयत्नोंसे दबा दूँ, तो यह उसकी शक्तिसे बाहर है ।।२०।। जो पहले हमारी उन्नति और देवताओंकी अवनतिके कारण हुए थे, वही कालभगवान् अब उनकी उन्नति और हमारी अवनतिके कारण हो रहे हैं ।।२१।। बल, मन्त्री, बुद्धि, दुर्ग, मन्त्र, ओषधि और सामादि उपाय—इनमेंसे किसी भी साधनके द्वारा अथवा सबके द्वारा मनुष्य कालपर विजय नहीं प्राप्त कर सकता ।।२२।। जब दैव तुमलोगोंके अनुकूल था, तब तुमलोगोंने भगवान्के इन पार्षदोंको कई बार जीत लिया था। पर देखो, आज वे ही युद्धमें हमपर विजय प्राप्त करके सिंहनाद कर
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