श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1593, कुल 1617 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीभगवानुवाच
ब्रह्मन् यमनुगृह्णामि तद्विशो विधुनोम्यहम् । यन्मदः पुरुषः स्तब्धो लोकं मां चावमन्यते ॥२४
यदा कदाचिज्जीवात्मा संसरन् निजकर्मभिः । नानायोनिष्वनीशोऽयं पौरुषीं गतिमाव्रजेत् ॥२५
जन्मकर्मवयोरूपविद्यैश्वर्यधनादिभिः । यद्यस्य न भवेत् स्तम्भस्तत्रायं मदनुग्रहः ॥२६
मानस्तम्भनिमित्तानां जन्मादीनां समन्ततः । सर्वश्रेयः प्रतीपानां हन्त मोहोन्न मत्परः ॥२७
एष दानवदैत्यानामग्रणीः कीर्तिवर्धनः । अजैषीदजयां मायां सीदन्नपि न मुह्यति ॥२८
ब्रह्माजीने कहा—समस्त प्राणियोंके जीवनदाता, उनके स्वामी और जगत्स्वरूप देवाधिदेव प्रभो! अब आप इसे छोड़ दीजिये। आपने इसका सर्वस्व ले लिया है, अतः अब यह दण्डका पात्र नहीं है ।।२१।। इसने अपनी सारी भूमि और पुण्यकर्मोंसे उपार्जित स्वर्ग आदि लोक, अपना सर्वस्व तथा आत्मातक आपको समर्पित कर दिया है एवं ऐसा करते समय इसकी बुद्धि स्थिर रही है, यह धैर्यसे च्युत नहीं हुआ है ।।२२।। प्रभो! जो मनुष्य सच्चे हृदयसे कृपणता छोड़कर आपके चरणोंमें जलका अर्घ्य देता है और केवल दूर्वादलसे भी आपकी सच्ची पूजा करता है, उसे भी उत्तम गतिकी प्राप्ति होती है। फिर बलिने तो बड़ी प्रसन्नतासे धैर्य और स्थिरतापूर्वक आपको त्रिलोकीका दान कर दिया है। तब यह दुःखका भागी कैसे हो सकता है? ।।२३।। श्रीभगवान्ने कहा—ब्रह्माजी! मैं जिसपर कृपा करता हूँ, उसका धन छीन लिया करता हूँ। क्योंकि जब मनुष्य धनके मदसे मतवाला हो जाता है, तब मेरा और लोगोंका तिरस्कार करने लगता है ।।२४।। यह जीव अपने कर्मोंके कारण विवश होकर अनेक योनियोंमें भटकता रहता है, जब कभी मेरी बड़ी कृपासे मनुष्यका शरीर प्राप्त करता है ।।२५।। मनुष्ययोनिमें जन्म लेकर यदि कुलीनता, कर्म, अवस्था, रूप, विद्या, ऐश्वर्य और धन आदिके कारण घमंड न हो जाय तो समझना चाहिये कि मेरी बड़ी ही कृपा है ।।२६।। कुलीनता आदि बहुत-से ऐसे कारण हैं, जो अभिमान और जडता आदि उत्पन्न करके मनुष्यको कल्याणके समस्त साधनोंसे वंचित कर देते हैं; परन्तु जो मेरे शरणागत होते हैं, वे इनसे मोहित नहीं
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