भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,617 पृष्ठ

पृष्ठ 1594, कुल 1617 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1594

होते ॥२७॥ यह बलि दानव और दैत्य दोनों ही वंशोंमें अग्रगण्य और उनकी कीर्ति बढ़ानेवाला है। इसने उस मायापर विजय प्राप्त कर ली है, जिसे जीतना अत्यन्त कठिन है। तुम देख ही रहे हो, इतना दुःख भोगनेपर भी यह मोहित नहीं हुआ ॥२८॥

क्षीणरिक्थश्च्युतः १ स्थानात् क्षिप्तो बद्धश्च शत्रुभिः । ज्ञातिभिश्च परित्यक्तो यातनामन्वयापितः ॥२९

गुरुणा भर्त्सितः शप्तो जहौ सत्यं न सुव्रतः । छलैरुक्तो मया धर्मो नायं त्यजति सत्यवाक् ॥३०

एष मे प्रापितः स्थानं दुष्प्रापममरैरपि । सावर्णेरन्तरस्यायं भवितेन्द्रो मदाश्रयः २ ॥३१

तावत् सुतलमध्यास्तां विश्वकर्मविनिर्मितम् । यन्नाधयो व्याधयश्च क्लमस्तन्द्रा पराभवः । नोपसर्गा निवसतं संभवन्ति ममेक्षया ॥३२

इन्द्रसेन महाराज याहि भो भद्रमस्तु ते । सुतलं स्वर्गीभिः प्रार्थ्यं ज्ञातिभिः परिवारितः ॥३३

न त्वामभिभविष्यन्ति लोकेशाः किमुतापरे । त्वच्छासनातिगान् दैत्यांश्चक्रं मे सूदयिष्यति ॥३४

रक्षिष्ये सर्वतोऽहं त्वां सानुगं सपरिच्छदम् । सदा सन्निहितं वीर तत्र मां द्रक्ष्यते भवान् ॥३५

तत्र दानवदैत्यानां सङ्गात् ते भाव आसुरः । दृष्ट्वा मदनुभावं वै सद्यः कुण्ठो विनङ्क्ष्यति ॥३६

इसका धन छीन लिया, राजपदसे अलग कर दिया, तरह-तरहके आक्षेप किये, शत्रुओंने बाँध लिया, भाई-बन्धु छोड़कर चले गये, इतनी यातनाएँ भोगनी पड़ीं—यहाँतक कि गुरुदेवने भी इसको डाँटा-फटकारा और शापतक दे दिया। परन्तु इस दृढ़व्रतीने अपनी प्रतिज्ञा नहीं छोड़ी। मैंने इससे छलभरी बातें कीं, मनमें छल रखकर धर्मका उपदेश किया; परन्तु इस सत्यवादीने अपना धर्म न छोड़ा ॥२९-३०॥