श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतत्र तत्र सदैवाहं भवामि त्रिदशैः सह ॥१५॥ कलियुगमें जहाँ-जहाँ पवित्र भागवतशास्त्र रहता है, वहाँ-वहाँ सदा ही मैं देवताओंके साथ उपस्थित रहता हूँ । तत्र सर्वाणि तीर्थानि नदीनदसरांसि च । यज्ञाः सप्तपुरी नित्यं पुण्याः सर्वे शिलोच्चयाः ॥१६॥ यही नहीं—वहाँ नदी, नद और सरोवररूपमें प्रसिद्ध सभी तीर्थ वास करते हैं; सम्पूर्ण यज्ञ, सात पुरियाँ और सभी पावन पर्वत वहाँ नित्य निवास करते हैं । श्रोतव्यं मम शास्त्रं हि यशोधर्मजयार्थिना । पापक्षयार्थं लोकेश मोक्षार्थं धर्मबुद्धिना ॥१७॥ लोकेश! यश, धर्म और विजयके लिये तथा पापक्षय एवं मोक्षकी प्राप्तिके लिये धर्मात्मा मनुष्यको सदा ही मेरे भागवतशास्त्रका श्रवण करना चाहिये । श्रीमद्भागवतं पुण्यमायुरारोग्यपुष्टिदम् । पठनाच्छ्रवणाद् वापि सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥१८॥ यह पावन पुराण श्रीमद्भागवत आयु, आरोग्य और पुष्टिको देनेवाला है; इसका पाठ अथवा श्रवण करनेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है । न शृण्वन्ति न हृष्यन्ति श्रीमद्भागवतं परम् । सत्यं सत्यं हि लोकेश तेषां स्वामी सदा यमः ॥१९॥ लोकेश! जो इस परम उत्तम भागवतको न तो सुनते हैं और न सुनकर प्रसन्न ही होते हैं, उनके स्वामी सदा यमराज ही हैं—वे सदा यमराजके ही वशमें रहते हैं—यह मैं सत्य-सत्य कह रहा हूँ । न गच्छति यदा मर्त्यः श्रोतुं भागवतं सुत । एकादश्यां विशेषेण नास्ति पापरतस्ततः ॥२०॥ पुत्र! जो मनुष्य सदा ही—विशेषतः एकादशीको भागवत सुनने नहीं जाता, उससे बढ़कर पापी कोई नहीं है । श्लोकं भागवतं चापि श्लोकार्धं पादमेव वा । लिखितं तिष्ठते यस्य गृहे तस्य वसाम्यहम् ॥२१॥ जिसके घरमें एक श्लोक, आधा श्लोक अथवा श्लोकका एक ही चरण लिखा रहता है, उसके घरमें मैं निवास करता हूँ । सर्वाश्रमाभिगमनं सर्वतीर्थावगाहनम् । न तथा पावनं नृणां श्रीमद्भागवतं यथा ॥२२॥ मनुष्यके लिये सम्पूर्ण पुण्य-आश्रमोंकी यात्रा या सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करना भी वैसा पवित्रकारक नहीं है, जैसा श्रीमद्भागवत है ।