श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयत्र यत्र चतुर्वक्त्र श्रीमद्भागवतं भवेत् । गच्छामि तत्र तत्राहं गौर्यथा सुतवत्सला ॥२३॥ चतुर्मुख! जहाँ-जहाँ भागवतकी कथा होती है, वहाँ-वहाँ मैं उसी प्रकार जाता हूँ, जैसे पुत्रवत्सला गौ अपने बछड़ेके पीछे-पीछे जाती है ।
मत्कथावाचकं नित्यं मत्कथाश्रवणे रतम् । मत्कथाप्रीतमनसं नाहं त्यक्ष्यामि तं नरम् ॥२४॥ जो मेरी कथा कहता है, जो सदा उसे सुननेमें लगा रहता है तथा जो मेरी कथासे मन-ही-मन प्रसन्न होता है, उस मनुष्यका मैं कभी त्याग नहीं करता ।
श्रीमद्भागवतं पुण्यं दृष्ट्वा नोत्तिष्ठते हि यः । सांवत्सरं तस्य पुण्यं विलयं याति पुत्रक ॥२५॥ पुत्र! जो परम पुण्यमय श्रीमद्भागवतशास्त्रको देखकर अपने आसनसे उठकर खड़ा नहीं हो जाता, उसका एक वर्षका पुण्य नष्ट हो जाता है ।
श्रीमद्भागवतं दृष्ट्वा प्रत्युत्थानाभिवादनैः । सम्मानयेत तं दृष्ट्वा भवेत् प्रीतिर्ममातुला ॥२६॥ जो श्रीमद्भागवतपुराणको देखकर खड़ा होने और प्रणाम करने आदिके द्वारा उसका सम्मान करता है, उस मनुष्यको देखकर मुझे अनुपम आनन्द मिलता है ।
दृष्ट्वा भागवतं दूरात् प्रक्रमेत् सम्मुखं हि यः । पदे पदेऽश्वमेधस्य फलं प्राप्नोत्यसंशयम् ॥२७॥ जो श्रीमद्भागवतको दूरसे ही देखकर उसके सम्मुख जाता है, वह एक-एक पगपर अश्वमेध यज्ञके पुण्यको प्राप्त करता है—इसमें तनिक भी संदेह नहीं है ।
उत्थाय प्रणमेद् यो वै श्रीमद्भागवतं नरः । धनपुत्रांस्तथा दारान् भक्तिं च प्रददाम्यहम् ॥२८॥ जो मानव खड़ा होकर श्रीमद्भागवतको प्रणाम करता है, उसे मैं धन, स्त्री, पुत्र और अपनी भक्ति प्रदान करता हूँ ।
महाराजोपचारैस्तु श्रीमद्भागवतं सुत । शृण्वन्ति ये नरा भक्त्या तेषां वश्यो भवाम्यहम् ॥२९॥ हे पुत्र! जो लोग महाराजोचित सामग्रियोंसे युक्त होकर भक्तिपूर्वक श्रीमद्भागवतकी कथा सुनते हैं, मैं उनके वशीभूत हो जाता हूँ ।
ममोत्सवेषु सर्वेषु श्रीमद्भागवतं परम् । शृण्वन्ति ये नरा भक्त्या मम प्रीत्यै च सुव्रत ॥३०॥ वस्त्रालङ्करणैः पुष्पैर्धूपदीपोपहारकैः ।