श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरतिमुद्वहतादद्धा१ गङ्गेवौघमुदन्वति ॥४२
श्रीकृष्ण कृष्णसख वृष्ण्यृषभावनिध्रुग्- राजन्यवंशदहनानपवर्गवीर्य । गोविन्द गोद्विजसुरार्तिहरावतार योगेश्वराखिलगुरो भगवन्नमस्ते ॥४३
सूत उवाच
पृथेत्थं कलपदैः परिणूताखिलोदयः । मन्दं जहास वैकुण्ठो मोहयन्निव मायया ॥४४
तां बाढमित्युपामन्त्र्य प्रविश्य गजसाह्वयम् । स्त्रियश्च स्वपुरं यास्यन् प्रेम्णा राज्ञा निवारितः ॥४५
व्यासाद्यैरीश्वरेहाज्ञैः कृष्णेनाद्भुतकर्मणा । प्रबोधितोऽपीतिहासैर्नाबुध्यत शुचार्पितः२ ॥४६
आह राजा धर्मसुतश्चिन्तयन् सुहृदां वधम् । प्राकृतेनात्मना विप्राः स्नेहमोहवशं गतः ॥४७
अहो मे पश्यताज्ञानं हृदि रूढं दुरात्मनः । पारक्यस्यैव देहस्य बह्व्यो मेऽक्षौहिणीर्हताः ॥४८
बालद्विजसुहृन्मित्रपितृभ्रातृगुरुद्रुहः । न मे स्यान्निरयान्मोक्षो ह्यपि वर्षायुतायुतैः ॥४९
सूतजी कहते हैं—इस प्रकार कुन्तीने बड़े मधुर शब्दोंमें भगवान्की अधिकांश लीलाओंका वर्णन किया। यह सब सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण अपनी मायासे उसे मोहित करते हुए-से मन्द-मन्द मुसकराने लगे ॥४४॥ उन्होंने कुन्तीसे कह दिया—‘अच्छा ठीक है’ और रथके स्थानसे वे हस्तिनापुर लौट आये। वहाँ कुन्ती और सुभद्रा आदि देवियोंसे विदा लेकर जब वे जाने लगे, तब राजा युधिष्ठिरने बड़े प्रेमसे उन्हें रोक लिया ॥४५॥ राजा युधिष्ठिरको अपने भाई-बन्धुओंके मारे जानेका बड़ा शोक हो रहा था। भगवान्की लीलाका मर्म जाननेवाले व्यास आदि महर्षियोंने और स्वयं अद्भुत चरित्र करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने भी अनेकों इतिहास कहकर उन्हें समझानेकी बहुत चेष्टा की; परंतु उन्हें सान्त्वना न मिली,
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