श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउनका शोक न मिटा ।।४६।। शौनकादि ऋषियो! धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरको अपने स्वजनोंके वधसे बड़ी चिन्ता हुई। वे अविवेकयुक्त चित्तसे स्नेह और मोहके वशमें होकर कहने लगे— भला, मुझ दुरात्माके हृदयमें बद्धमूल हुए इस अज्ञानको तो देखो; मैंने सियार-कुत्तोंके आहार इस अनात्मा शरीरके लिये अनेक अक्षौहिणी$^*$ सेनाका नाश कर डाला ।।४७-४८।। मैंने बालक, ब्राह्मण, सम्बन्धी, मित्र, चाचा-ताऊ, भाई-बन्धु और गुरुजनोंसे द्रोह किया है। करोड़ों बरसोंसे भी नरकसे मेरा छुटकारा नहीं हो सकता ।।४९।। यद्यपि शास्त्रका वचन है कि राजा यदि प्रजाका पालन करनेके लिये धर्मयुद्धमें शत्रुओंको मारे तो उसे पाप नहीं लगता, फिर भी इससे मुझे संतोष नहीं होता ।।५०।। स्त्रियोंके पति और भाई-बन्धुओंको मारनेसे उनका मेरे द्वारा यहाँ जो अपराध हुआ है। उसका मैं गृहस्थोचित यज्ञ-यागादिकोंके द्वारा मार्जन करनेमें समर्थ नहीं हूँ ।।५१।। जैसे कीचड़से गँदला जल स्वच्छ नहीं किया जा सकता, मदिरासे मदिराकी अपवित्रता नहीं मिटायी जा सकती, वैसे ही बहुत-से हिंसाबहुल यज्ञोंके द्वारा एक भी प्राणीकी हत्याका प्रायश्चित्त नहीं किया जा सकता ।।५२।।
नैनो राज्ञः प्रजाभर्तुर्धर्मयुद्धे वधो द्विषाम् ।
इति मे न तु बोधाय कल्पते शासनं वचः ।।५०स्त्रीणां मद्द्रुतबन्धूनां द्रोहो योऽसाविहोत्थितः ।
कर्मभिर्गृहमेधायैर्नाहं कल्पो व्यपोहितुम् ।।५१यथा पङ्केन पङ्काम्भः सुरया वा सुराकृतम् ।
भूतहत्यां तथैवैकां न यज्ञैर्मार्ष्टुमर्हति ।।५२
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे कुन्तीस्तुतिर्युधिष्ठिरानुतापो नामाष्टमोऽध्यायः ।।८।।
१. प्रा० पा०—तेषां परेतानां। २. प्रा० पा०—शुचार्दितान्।
१. प्रा० पा०—नान्यत्र त्वभयं। २. प्रा० पा०—दहति। ३. प्रा० पा०—भृगुश्रेष्ठ। ४. प्रा० पा०—बहिरपि ध्रुवम्।
१. प्रा० पा०—नृष्वपि यादस्सु। २. प्रा० पा०—मृषा०।
१. प्रा० पा०—करिष्य इति। २. प्रा० पा०—वदन्त्य०। ३. प्रा० प्रा० स्वकृतेहितः। ४. प्रा० पा०—वीक्षिताः।
१. प्रा० पा०—रतिमुद्वहतां तद्धत्। २. प्रा० पा०—शुचार्दिताः ।
$^*$ २१,८७० रथ, २१,८७० हाथी, १,०९,३५० पैदल और ६५,६०० घुड़सवार—इतनी सेनाको अक्षौहिणी कहते हैं। (महाभारत)