श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंन्यास
विनियोगमें आये हुए ऋषि आदिका तथा प्रधान देवताके मन्त्राक्षरोंका अपने शरीरके विभिन्न अंगोंमें जो स्थापन किया जाता है, उसे 'न्यास' कहते हैं। मन्त्रका एक-एक अक्षर चिन्मय होता है, उसे मूर्तिमान् देवताके रूपमें देखना चाहिये। इन अक्षरोंके स्थापनसे साधव स्वयं मन्त्रमय हो जाता है, उसके हृदयमें दिव्य चेतनाका प्रकाश फैलता है, मन्त्रके देवता उसके स्वरूप होकर उसकी सर्वथा रक्षा करते हैं। इस प्रकार वह ‘देवो भूत्वा देवं यजेत्’ इस श्रुतिके अनुसार स्वयं देवस्वरूप होकर देवताओंका पूजन करता है। ऋषि आदिका न्यास सिर आदि कतिपय अंगोंमें होता है। मन्त्रपदों अथवा अक्षरोंका न्यास प्रायः हाथकी अँगुलियों और हृदयादि अंगोंमें होता है। इन्हें क्रमशः ‘करन्यास’ और ‘अंगन्यास’ कहते हैं। किन्हीं-किन्हीं मन्त्रोंका न्यास सर्वांगमें होता है। न्याससे बाहर-भीतरकी शुद्धि, दिव्यबलकी प्राप्ति और साधनाकी निर्विघ्न पूर्ति होती है। यहाँ क्रमशः ऋष्यादिन्यास, करन्यास और अंगन्यास दिये जा रहे हैं—
ऋष्यादिन्यास
नारदर्षये नमः शिरसि ॥१॥ बृहतीच्छन्दसे नमो मुखे ॥२॥ श्रीकृष्णपरमात्मदेवतायै नमो हृदये ॥३॥ ब्रह्मबीजाय नमो गुह्ये ॥४॥ भक्तिशक्तये नमः पादयोः ॥५॥ ज्ञानवैराग्यकीलकाभ्यां नमो नाभौ ॥६॥ विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ॥७॥
ऊपर न्यासके सात वाक्य उद्धृत किये गये हैं। इनमें पहला वाक्य पढ़कर दाहिने हाथकी अँगुलियोंसे सिरका स्पर्श करे, दूसरा वाक्य पढ़कर मुखका, तीसरे वाक्यसे हृदयका, चौथेसे गुदाका, पाँचवेंसे दोनों पैरोंका, छठेसे नाभिका और सातवें वाक्यसे सम्पूर्ण अंगोंका स्पर्श करना चाहिये।
करन्यास
इसमें ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ इस द्वादशाक्षरमन्त्रके एक-एक अक्षरको प्रणवसे सम्पुटित करके दोनों हाथोंकी अंगुलियोंमें स्थापित करना है। मन्त्र नीचे दिये जा रहे हैं—
‘ॐ ॐ ॐ नमो दक्षिणतर्जन्याम्’ ऐसा उच्चारण करके दाहिने हाथके अँगूठेसे दाहिने हाथकी तर्जनीका स्पर्श करे। ‘ॐ नं ॐ नमो दक्षिणमध्यमायाम्’—यह उच्चारण कर दाहिने हाथके अँगूठेसे दाहिने हाथकी मध्यमा अंगुलिका स्पर्श करे। ‘ॐ मों ॐ नमो दक्षिणानामिकायाम्’—यह पढ़कर दाहिने हाथके अँगूठेसे दाहिने हाथकी अनामिका अंगुलिका स्पर्श करे। ‘ॐ भं ॐ नमो दक्षिणकनिष्ठिकायाम्’—इससे दाहिने हाथके अँगूठेसे दाहिने हाथकी कनिष्ठिका अंगुलिका स्पर्श करे। ‘ॐ गं ॐ नमो वामकनिष्ठिकायाम्’—इससे बायें हाथके अँगूठेसे बायें हाथकी कनिष्ठिका अंगुलिका स्पर्श करे। ‘ॐ वं ॐ नमो वामानामिकायाम्’—इससे बायें हाथके अँगूठेसे बायें हाथकी