भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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हैं ॥३६॥

सोऽहं समाम्नायमयस्तपोमयः
  प्रजापतीनामभिवन्दितः पतिः ।
आस्थाय योगं निपुणं समाहित-
  स्तं नाध्यगच्छं यत आत्मसम्भवः ॥३४

नतोऽस्म्यहं तच्चरणं समीयुषां
  भवच्छिदं स्वस्त्ययनं सुमङ्गलम् ।
यो¹ ह्यात्ममायाविभवं स्म पर्यगाद्
  यथा नभः स्वान्तमथापरे कुतः ॥३५

नाहं न यूयं यदृतां गतिं विदु-
  र्न वामदेवः किमुतापरे सुराः ।
तन्मायया मोहितबुद्धयस्त्विदं
  विनिर्मितं चात्मसमं² विचक्ष्महे ॥३६

यस्यावतारकर्माणि गायन्ति ह्यस्मदादयः ।
न यं विदन्ति तत्त्वेन तस्मै भगवते नमः ॥३७

स एष आद्यः पुरुषः कल्पे कल्पे सृजत्यजः³ ।
आत्माऽऽत्मन्यात्मनाऽऽत्मानं संयच्छति⁴ च पाति च ॥३८

विशुद्धं केवलं ज्ञानं प्रत्यक् सम्यगवस्थितम् ।
सत्यं पूर्णमनाद्यन्तं निर्गुणं नित्यमद्वयम् ॥३९

ऋषे विदन्ति मुनयः प्रशान्तात्मेन्द्रियाशयाः ।
यदा तदेवासत्तर्कैस्तिरोधीयेत विप्लुतम् ॥४०

हमलोग केवल जिनके अवतारकी लीलाओंका गान ही करते रहते हैं, उनके तत्त्वको नहीं जानते—उन भगवान्‌के श्रीचरणोंमें मैं नमस्कार करता हूँ ॥३७॥ वे अजन्मा एवं पुरुषोत्तम हैं। प्रत्येक कल्पमें वे स्वयं अपने-आपमें अपने-आपकी ही सृष्टि करते हैं, रक्षा करते हैं और संहार कर लेते हैं ॥३८॥ वे मायाके लेशसे रहित, केवल ज्ञानस्वरूप हैं और अन्तरात्माके रूपमें एकरस स्थित हैं। वे तीनों कालमें सत्य एवं परिपूर्ण हैं; न उनका आदि है न अन्त। वे तीनों गुणोंसे रहित, सनातन एवं अद्वितीय हैं ॥३९॥ नारद! महात्मालोग जिस

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