श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 358, कुल 1617 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमय अपने अन्तःकरण, इन्द्रिय और शरीरको शान्त कर लेते हैं, उस समय उनका साक्षात्कार करते हैं। परन्तु जब असत्पुरुषोंके द्वारा कुतर्कोंका जाल बिछाकर उनको ढक दिया जाता है, तब उनके दर्शन नहीं हो पाते ॥४०॥
आद्योऽवतारः पुरुषः परस्य कालः स्वभावः सदसन्मनश्च । द्रव्यं विकारो गुण इन्द्रियाणि विराट् स्वराट् स्थास्नु चरिष्णु भूम्नः ॥४१
अहं भवो यज्ञ इमे प्रजेशा दक्षादयो ये भवदादयश्च । स्वर्लोकपालाः खगलोकपाला नृलोकपालास्तललोकपालाः ॥४२
गन्धर्वविद्याधरचारणेशा ये यक्षरक्षोरगनागनाथाः । ये वा ऋषीणामृषभाः पितॄणां दैत्येन्द्रसिद्धेश्वरदानवेन्द्राः । अन्ये च ये प्रेतपिशाचभूत- कूष्माण्डयादोमृगपक्ष्यधीशाः ॥४३
यत्किञ्च लोके भगवन्महस्व- दोजःसहस्वद् बलवत् क्षमावत् । श्रीह्रीविभूत्यात्मवदद्भुतार्णं तत्त्वं परं रूपवदस्वरूपम् ॥४४
प्राधान्यतो यानृष आमनन्ति लीलावतारान् पुरुषस्य भूम्नः । आपीयतां कर्णकषायशोषा- ननुक्रमिष्ये त इमान् सुपेशान् ॥४५
परमात्माका पहला अवतार विराट् पुरुष है; उसके सिवा काल, स्वभाव, कार्य, कारण, मन, पंचभूत, अहंकार, तीनों गुण, इन्द्रियाँ, ब्रह्माण्ड-शरीर, उसका अभिमानी, स्थावर और जंगम जीव—सब-के-सब उन अनन्तभगवान्के ही रूप हैं ॥४१॥ मैं, शंकर, विष्णु, दक्ष आदि ये प्रजापति, तुम और तुम्हारे-जैसे अन्य भक्तजन, स्वर्गलोकके रक्षक, पक्षियोंके राजा, मनुष्यलोकके राजा, नीचेके लोकोंके राजा; गन्धर्व, विद्याधर और चारणोंके अधिनायक; यक्ष, राक्षस, साँप और नागोंके स्वामी; महर्षि, पितृपति, दैत्येन्द्र, सिद्धेश्वर, दानवराज; और भी प्रेत-पिशाच, भूत-कूष्माण्ड, जल-जन्तु, मृग और पक्षियोंके स्वामी; एवं संसारमें और भी जितनी वस्तुएँ ऐश्वर्य, तेज, इन्द्रियबल, मनोबल, शरीरबल या क्षमासे युक्त हैं; अथवा जो भी
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