श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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विशेष सौन्दर्य, लज्जा, वैभव तथा विभूतिसे युक्त हैं; एवं जितनी भी वस्तुएँ अद्भुत वर्णवाली, रूपवान् या अरूप हैं—वे सब-के-सब परमतत्त्वमय भगवत्स्वरूप ही हैं ।।४२-४४।। नारद! इनके सिवा परम पुरुष परमात्माके परम पवित्र एवं प्रधान-प्रधान लीलावतार भी शास्त्रोंमें वर्णित हैं। उनका मैं क्रमशः वर्णन करता हूँ। उनके चरित्र सुननेमें बड़े मधुर एवं श्रवणेन्द्रियके दोषोंको दूर करनेवाले हैं। तुम सावधान होकर उनका रस लो ।।४५।।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे षष्ठोऽध्यायः ।।६।।
- गायत्री, त्रिष्टुप्, अनुष्टुप्, उष्णिक्, बृहती, पङ्क्ति और जगती—ये सात छन्द हैं।
- ब्रह्माण्डके सात आवरणोंका वर्णन करते हुए वेदान्त प्रक्रियामें ऐसा माना गया है कि—पृथ्वीसे दसगुना जल है, जलसे दसगुना अग्नि, अग्निसे दसगुना वायु, वायुसे दसगुना आकाश, आकाशसे दसगुना अहंकार, अहंकारसे दसगुना महत्तत्त्व और महत्तत्त्वसे दसगुनी मूल प्रकृति है। वह प्रकृति भगवान्के केवल एक पादमें है। इस प्रकार भगवान्की महत्ता प्रकट की गयी है। यह दशांगुलन्याय कहलाता है। १. प्रा० पा०—प्रातपत्प्राणो। २. प्रा० पा०—वापि। ३. प्रा० पा०—बहिस्त्वासन् प्रजानां त्रय आश्रमाः। ४. प्रा० पा०—महद्व्रतम्। ५. प्रा० पा०—विष्वक्। ६. प्रा० पा०—गुणाश्रयः। ७. प्रा० पा०—इवातपत्। १. प्रा० पा०—यज्ञेषु। २. प्रा० पा०—रेतैः। ३. प्रा० पा०—कालमीजिरे। ४. प्रा० पा०—न कर्हिचिन्मे। १. प्रा० पा०—यस्त्वात्ममायाविभवं स्वयं गतो यथा। २. प्रा० पा०—त्वात्म०। ३. प्रा० पा०—ऽसृजत्प्रजाः। ४. प्रा० पा०—समं गच्छति पाति।