भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 420

उत्तरायां धृतः पूरोर्वंशः साध्वभिमन्युना । स वै द्रौण्यस्त्रसंछिन्नः पुनर्भगवता धृतः ॥१७

अयाजयद्धर्मसुतमश्वमेधैस्त्रिभिर्विभुः । सोऽपि क्ष्मामनुजै रक्षन् रेमे कृष्णमनुव्रतः ॥१८

भगवानपि विश्वात्मा लोकवेदपथानुगः । कामान् सिषेवे द्वार्वत्यामसक्तः सांख्यमास्थितः ॥१९

यों सोचकर भगवान्ने युधिष्ठिरको अपनी पैतृक राजगद्दीपर बैठाया और अपने सभी सगे-सम्बन्धियोंको सत्पुरुषोंका मार्ग दिखाकर आनन्दित किया ।।१६।। उत्तराके उदरमें जो अभिमन्युने पूरुवंशका बीज स्थापित किया था, वह भी अश्वत्थामाके ब्रह्मास्त्रसे नष्ट-सा हो चुका था; किन्तु भगवान्ने उसे बचा लिया ।।१७।। उन्होंने धर्मराज युधिष्ठिरसे तीन अश्वमेधयज्ञ करवाये और वे भी श्रीकृष्णके अनुगामी होकर अपने छोटे भाइयोंकी सहायतासे पृथ्वीकी रक्षा करते हुए बड़े आनन्दसे रहने लगे ।।१८।। विश्वात्मा श्रीभगवान्ने भी द्वारकापुरीमें रहकर लोक और वेदकी मर्यादाका पालन करते हुए सब प्रकारके भोग भोगे, किन्तु सांख्ययोगकी स्थापना करनेके लिये उनमें कभी आसक्त नहीं हुए ।।१९।।

स्निग्धस्मितावलोकेन वाचा पीयूषकल्पया । चरित्रेणानवद्येन १ श्रीनिकेतेन चात्मना ।।२०

इमं लोकममुं चैव रमयन् सुतरां यदून् । रेमे क्षणदया दत्तक्षणस्त्रीक्षणसौहृदः ।।२१

तस्यैवं २ रममाणस्य संवत्सरगणान् बहून् । गृहमेधेषु योगेषु विरागः समजायत ।।२२

दैवाधीनेषु कामेषु दैवाधीनः स्वयं पुमान् । को विस्रम्भेत योगेन योगेश्वरमनुव्रतः ।।२३

पुर्यां कदाचित्क्रीडद्भिर्यदुभोजकुमारकैः । कोपिता मुनयः शेपुर्भगवन्मतकोविदाः ।।२४

ततः कतिपयैर्मासैर्वृष्णिभोजान्धकादयः । ययुः प्रभासं संहृष्टा रथैर्देवविमोहिताः ।।२५

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