श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतत्र स्नात्वा पितॄन्देवानृषींश्चैव तदम्भसा । तर्पयित्वाथ विप्रेभ्यो गावो बहुगुणा ददुः ॥२६
हिरण्यं रजतं शय्यां वासांस्यजिनकम्बलान् । यानं$^३$ रथानिभान् कन्या धरां वृत्तिकरीमपि ॥२७
अन्नं चोरुरसं तेभ्यो दत्त्वा भगवदर्पणम् । गोविप्रार्थासवः शूराः प्रणेमुर्भुवि मूर्धभिः ॥२८
मधुर मुसकान, स्नेहमयी चितवन, सुधामयी वाणी, निर्मल चरित्र तथा समस्त शोभा और सुन्दरताके निवास अपने श्रीविग्रहसे लोक-परलोक और विशेषतया यादवोंको आनन्दित किया तथा रात्रिमें अपनी प्रियाओंके साथ क्षणिक अनुरागयुक्त होकर समयोचित विहार किया और इस प्रकार उन्हें भी सुख दिया ।।२०-२१।। इस तरह बहुत वर्षोंतक विहार करते-करते उन्हें गृहस्थ-आश्रम-सम्बन्धी भोग-सामग्रियोंसे वैराग्य हो गया ।।२२।। ये भोग-सामग्रियाँ ईश्वरके अधीन हैं और जीव भी उन्हींके अधीन है। जब योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्णको ही उनसे वैराग्य हो गया तब भक्तियोगके द्वारा उनका अनुगमन करनेवाला भक्त तो उनपर विश्वास ही कैसे करेगा? ।।२३।।
एक बार द्वारकापुरीमें खेलते हुए यदुवंशी और भोजवंशी बालकोंने खेल-खेलमें कुछ मुनीश्वरोंको चिढ़ा दिया। तब यादवकलका नाश ही भगवान्को अभीष्ट है—यह समझकर उन ऋषियोंने बालकोंको शाप दे दिया ।।२४।। इसके कुछ ही महीने बाद भावीवश वृष्णि, भोज और अन्धकवंशी यादव बड़े हर्षसे रथोंपर चढ़कर प्रभासक्षेत्रको गये ।।२५।। वहाँ स्नान करके उन्होंने उस तीर्थके जलसे पितर, देवता और ऋषियोंका तर्पण किया तथा ब्राह्मणोंको श्रेष्ठ गौएँ दीं ।।२६।। उन्होंने सोना, चाँदी, शय्या, वस्त्र, मृगचर्म, कम्बल, पालकी, रथ, हाथी, कन्याएँ और ऐसी भूमि जिससे जीविका चल सके तथा नाना प्रकारके सरस अन्न भी भगवदर्पण करके ब्राह्मणोंको दिये। इसके पश्चात् गौ और ब्राह्मणोंके लिये ही प्राण धारण करनेवाले उन वीरोंने पृथ्वीपर सिर टेककर उन्हें प्रणाम किया ।।२७-२८।।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे विदुरोद्धवसंवादे तृतीयोऽध्यायः ।।३।।
१. प्रा० पा०—चारित्र्येणा०। २. प्रा० पा०—तस्येत्थं। ३. प्रा० पा०—हयान्रथानिभान्कन्यां।
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