श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 46, कुल 1617 में से
संदर्भ में पढ़ें'ॐ वैराग्याय नमः,' 'ॐ ऐश्वर्याय नमः'—इन मन्त्रोंद्वारा धर्मादिकी भावना एवं पूजा करे। फिर पीठोंके मध्यभागमें 'ॐ अनन्ताय नमः' से अनन्तकी और 'ॐ महापद्माय नमः' से महापद्मकी पूजा करे। फिर यह चिन्तन करे—उस महापद्मका कन्द (मूलभाग) आनन्दमय है। उसकी नाल संवित्स्वरूप है, उसके दल प्रकृतिमय हैं, उसके केसर विकृतिरूप हैं, उसके बीज पंचाशत् वर्णस्वरूप हैं—और उन्हींसे उस महापद्मकी कर्णिका (गद्दी) विभूषित है। उस कर्णिकामें अर्कमण्डल, सोममण्डल और वह्निमण्डलकी स्थिति है। वहीं प्रबोधात्मक सत्त्व, रज एवं तम भी विराजमान हैं। ऐसी भावनाके पश्चात् उन सबकी पंचोपचारसे पूजा करे। मन्त्र इस प्रकार हैं—'ॐ आनन्दमयकन्दाय नमः', 'ॐ संविन्नालाय नमः,' 'ॐ प्रकृतिमयपत्रेभ्यो नमः,' 'ॐ विकृतिमयकेसरेभ्यो नमः,' 'ॐ पञ्चाशद्वर्णबीजभूषितायै कर्णिकायै नमः', 'ॐ अं अर्कमण्डलाय नमः,' 'ॐ सं सोममण्डलाय नमः,' 'ॐ वं वह्निमण्डलाय नमः,' 'ॐ सं प्रबोधात्मने सत्त्वाय नमः,' 'ॐ रं रजसे नमः,' 'ॐ तं तमसे नमः'। इन सबकी पूजाके पश्चात् कमलके सब ओर पूर्वादि आठों दिशाओंमें क्रमशः 'ॐ विमलायै नमः,' 'ॐ उत्कर्षिण्यै नमः,' 'ॐ ज्ञानायै नमः,' 'ॐ क्रियायै नमः,' 'ॐ योगायै नमः,' 'ॐ प्रह्वयैनमः', 'ॐ सत्यायै नमः,' 'ॐ ईशानायै नमः'—इन मन्त्रोंद्वारा विमला आदि आठ शक्तियोंकी पूजा करे और कमलके मध्यभागमें 'ॐ अनुग्रहायै नमः' से अनुग्रहा नामकी शक्तिकी पूजा करे। तदनन्तर 'ॐ नमो भगवते विष्णवे सर्वभूतात्मने वासुदेवाय पद्मपीठात्मने नमः' इस मन्त्रसे सम्पूर्ण पद्मपीठका पूजन करके उसपर सुन्दर वस्त्र डाल दे और उसीके ऊपर स्थापित करनेके लिये श्रीमद्भागवतकी पुस्तकको हाथमें लेकर 'ॐ ध्रुवा द्यौर्ध्रुवा पृथिवी ध्रुवा सा पर्वता इमे । ध्रुवं विश्वमिदं जगत् ध्रुवो राजा विशामसि' इस मन्त्रको पढ़ते हुए उक्त पीठपर स्थापित करे। फिर 'ॐ मनो जूतिः०' इस मन्त्रसे पुस्तककी प्रतिष्ठा करके पुरुषसूक्तके षोडश मन्त्रोंद्वारा षोडशोपचार-विधिसे पूजा करे। (यह विधि पहले 'श्रीमद्भागवतकी पूजन-विधि' शीर्षक लेखमें दी गयी है।) तत्पश्चात् द्वितीय पीठको श्वेत वस्त्रसे आच्छादित करके उसपर देवर्षि नारदको स्थापित करे और 'ॐ सुरर्षिवरनारदाय नमः' इस मन्त्रसे उनकी विधिवत् पूजा करके निम्नांकितरूपसे प्रार्थना करे—
ॐ नमस्तुभ्यं भगवते ज्ञानवैराग्यशालिने ।
नारदाय सर्वलोकपूजिताय सुरर्षये ।।
—‘अनया पूजया देवर्षिनारदः प्रीयतां न मम ।’
इस प्रकार पूजनके पश्चात् यजमान पुष्प, चन्दन, ताम्बूल, वस्त्र, दक्षिणा, सुपारी तथा रक्षासूत्र हाथमें लेकर ‘ॐ अद्यामुकगोत्रममुकप्रवरममुकशर्माणं ब्राह्मणमेभिर्वरणद्रव्यैः सर्वदृष्टश्रीमद्भागवतवक्तृत्वेन भवन्तमहं वृणे’—इस प्रकार कहते हुए कथावाचक आचार्यका वरण करे। हाथमें ली हुई सब सामग्री उनको दे दे। वह सब लेकर कथावाचक व्यास ‘वृतोऽस्मि’ यों कहें। इसके बाद पुनः उन्हीं सब
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