श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकॉलेजके भूतपूर्व प्रिंसिपल परम श्रद्धेय विद्वद्वर डॉ० श्रीगोपीनाथजी कविराज, एम्० ए० से परामर्श किया गया। श्रीकविराज महोदयके परामर्श, प्रयत्न और परिश्रमसे काशीके सरकारी 'सरस्वती-भवन' पुस्तकालयमें सुरक्षित प्रायः आठ सौ वर्षकी पुरानी प्रति देखी गयी और गीताप्रेसके विद्वान् शास्त्रियोंके द्वारा उससे पाठ मिलाया गया। इसके लिये हम श्रद्धेय श्रीकविराजजीके हृदयसे कृतज्ञ हैं। इसके पाठनिर्णयमें मथुराके प्रसिद्ध वैष्णव विद्वान् श्रद्धेय पं० जवाहरलालजी चतुर्वेदीसे बड़ी सहायता मिली थी, एतदर्थ हम उनके कृतज्ञ हैं।
इसी समय श्रीमद्भागवतके अनुवादकी बात भी चली और मेरे अनुरोधसे प्रिय श्रीमुनिलालजी (वर्तमानमें श्रद्धेय स्वामी सनातनदेवजी)-ने अनुवाद करना स्वीकार किया और भगवत्कृपासे उन्होंने सं० १९८९ के आषाढ़में उसे पूरा कर दिया। उक्त अनुवादका संशोधन श्रीवल्लभसम्प्रदायके महान् विद्वान् गोलोकवासी श्रद्धेय देवर्षि पं० श्रीरमानाथजी भट्ट, अपने ही साथी पं० श्रीरामनारायणदत्तजी शास्त्री और भाई हरिकृष्णदासजी गोयन्दकाके द्वारा करवाया गया। तदनन्तर संवत् १९९७ में श्रीमद्भागवतका अनुवादसहित पाठभेदकी पाद-टिप्पणियोंसे युक्त संस्करण दो खण्डोंमें प्रकाशित किया गया, जिसको भावुक पाठकोंने बहुत ही अपनाया। इसीके साथ-साथ मूल पाठका गुटका-संस्करण भी निकाला गया, जिसकी अबतक १,०८,२५० प्रतियाँ छप चुकी हैं।
इसके अनन्तर संवत् १९९८ में 'कल्याण' का 'भागवताङ्क' प्रकाशित किया गया। इसमें अनुवादकी शैली कुछ बदल दी गयी। इस अनुवादका अधिकांश हमारे अपने ही पं० श्रीशान्तनुविहारीजी द्विवेदी (वर्तमानमें श्रद्धेय स्वामी श्रीअखण्डानन्दजी सरस्वती महाराज)- ने किया। कुछ श्रीमुनिलालजी तथा पं श्रीरामनारायणदत्तजी शास्त्रीने भी किया। फिर द्वितीय महायुद्धके कारण कई तरहकी अड़चनें आ गयीं। श्रीमद्भागवतके ये दोनों खण्ड और 'श्रीभागवताङ्क' दोनों ही अप्राप्य हो गये। पुनः प्रकाशनकी बात बराबर चलती रही, पर कुछ-न-कुछ अड़चनें आती ही रहीं। 'भागवताङ्क' वाली नयी शैलीके अनुसार अनुवादमें संशोधन करना हमारे पं० श्रीचिम्मनलालजी गोस्वामी, एम्० ए०, शास्त्रीने आरम्भ भी किया। परंतु अन्यान्य कार्योंमें अत्यधिक व्यस्त रहनेके कारण उनसे वह कार्य आगे नहीं बढ़ सका। गत फाल्गुनमें श्रद्धेय स्वामीजी श्रीअखण्डानन्दजी महाराज गोरखपुर पधारे, यों ही प्रसंगवश बात चल गयी और उन्होंने कृपापूर्वक इस कामको करना स्वीकार कर लिया। तदनुसार कार्य आरम्भ हो गया और भगवत्कृपासे अब यह छपकर पाठकोंके सामने प्रस्तुत है। श्रद्धेय श्रीस्वामीजी महाराज महीनोंतक लगातार अथक परिश्रम करके यह कार्य नहीं करते तो आज इस रूपमें इसका प्रकाशित होना सम्भव नहीं था। इसलिये हमलोग तो स्वामीजी महाराजके कृतज्ञ हैं ही, भागवतके प्रेमी पाठकोंको भी उनका कृतज्ञ होना चाहिये।
इस संस्करणमें अधिकांश अनुवाद 'भागवताङ्क' (मुख्यतया पं० श्रीशान्तनुविहारीजीके द्वारा अनुवादित)-के अनुसार ही है। कुछ अनुवाद तथा बहुत-सी अन्य सामग्री पूर्वप्रकाशित श्रीमद्भागवतके दोनों खण्डों (श्रीमुनिलालजीके द्वारा अनुवादित)-के अनुसार भी है। 'भागवताङ्क' के भावानुवादमें भी पं० श्रीशान्तनुविहारीजीके साथ-साथ श्रीमुनिलालजी और पं० श्रीरामनारायणदत्तजी शास्त्रीका कुछ हाथ था। उसी प्रकार इसमें भी