भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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है। इसीसे अनुवादकके रूपमें किन्हीं एक महानुभावका नाम नहीं दिया गया है। नाम-रूपके परित्यागी पूज्यद्वय संन्यासी महोदय (श्रद्धेय श्रीअखण्डानन्दजी महाराज और श्रद्धेय श्रीसनातनदेवजी महाराज) तो नाम न देनेसे प्रसन्न ही होंगे। हम तो इसको इन दोनों ही महानुभावोंका कृपाप्रसाद मानते हैं और दोनोंके ही कृतज्ञ हैं। पं० श्रीरामनारायणदत्तजी शास्त्री सम्पादकीय विभागके सदस्य हैं। अतः उनके नामकी पृथक् आवश्यकता भी नहीं। पाठकोंकी जानकारीके लिये यह परिचय दिया गया है। वस्तुतः अनुवादक महोदयोंके लिये इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी। उन्होंने जो कुछ किया है, कृपापूर्वक ही किया है और उनकी कृपा तथा सद्भावना हमें सदा सहज ही प्राप्त है।

इसमें श्लोकोंका केवल अक्षरानुवाद नहीं है, पाठकोंको श्लोकोंका भाव भलीभाँति समझानेके लिये श्लोकोंमें आये हुए प्रत्येक शब्दके भावकी पूर्ण रक्षा करते हुए छोटे-छोटे वाक्योंमें उनकी व्याख्या की गयी है, साथ ही बहुत विस्तार न हो, इसका भी ध्यान रखा गया है। इसे अनुवाद न कहकर 'सरल संक्षिप्त व्याख्या' कहना अधिक उपयुक्त होगा। स्थान- स्थानपर, विशेष करके दशम स्कन्धमें कई जगह श्रीभगवान्‌की मधुर लीलाओंके रसास्वादनके लिये और लीलारहस्यको समझनेके लिये नयी-नयी टिप्पणियाँ भी दे दी गयी हैं, जिससे इसकी उपादेयता और सुन्दरता विशेष बढ़ गयी है। साथ ही आरम्भमें स्कन्दपुराणोक्त एक छोटा माहात्म्य, श्रीमद्भागवतकी पूजनविधि आदि सप्ताहपारायणकी विधि तथा आवश्यक सामग्रीकी सूची एवं अन्तमें स्कन्दपुराणोक्त भागवतमाहात्म्य और विस्तृत प्रयोगविधि दे दी गयी है, इसलिये पहले संस्करणकी अपेक्षा इसमें पृष्ठ भी बहुत बढ़ गये हैं। चित्र भी अधिक दिये गये हैं। ये कुछ इस संस्करणकी विशेषताएँ हैं।

इसके पाठ-संशोधन, अनुवाद, प्रूफ-संशोधन आदिमें गोस्वामी श्रीचिम्मनलालजी और पं० श्रीरामनारायणदत्तजी शास्त्रीने बड़ा काम किया है। सभी बातोंमें सावधानी रखी गयी है, तथापि इतने बड़े ग्रन्थकी छपाईमें जहाँ-तहाँ भूलें अवश्य रही होंगी। कृपालु पाठकोंसे प्रार्थना है कि उन्हें पाठ, अनुवाद या छपाईमें जहाँ भूल दिखलायी दे, कृपया वे व्योरेवार लिख दें, जिससे आगामी संस्करणमें यथायोग्य संशोधन कर दिया जाय। सहृदय पाठकोंसे प्रार्थना है कि असावधानतावश होनेवाली भूलोंके लिये वे क्षमा करें।

अन्तमें निवेदन है कि यह सब जो कुछ हुआ है, इसमें भगवत्कृपा ही कारण है और सब तो निमित्तमात्र है। मैं अपना बड़ा सौभाग्य समझता हूँ और अपने प्रति श्रीभगवान्‌की बड़ी कृपा मानता हूँ, जिससे इधर कई महीने प्रायः श्रीमद्भागवतके ही पठन-चिन्तन आदिमें लगे।

—हनुमानप्रसाद पोद्दार