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श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 754

तां शशंसुर्जना राज्ञीं दिष्ट्या ते पुत्र आर्तिहा । प्रतिलब्धश्चिरं नष्टो रक्षिता मण्डलं भुवः ॥५१

अभ्यर्चितस्त्वया नूनं भगवान् प्रणतार्तिहा । यदनुध्यायिनो धीरा मृत्युं जिग्युः सुदुर्जयम् ॥५२

लाल्यमानं जनैरेवं ध्रुवं सभ्रातरं नृपः । आरोप्य करिणीं हृष्टः स्तूयमानोऽविशत्पुरम् ॥५३

तत्र तत्रोपसंकॢप्तैर्लसन्मकरतोरणैः । सवृन्दैः कदलीस्तम्भैः पूगपोतैश्च तद्विधैः ॥५४

चूतपल्लववासःस्रङ्मुक्तादामविलम्बिभिः । उपस्कृतं प्रतिद्वारमपां कुम्भैः सदीपकैः ॥५५

प्राकारैर्गोपुरागारैः शातकुम्भपरिच्छदैः । सर्वतोऽलंकृतं श्रीमद्विमानशिखरद्युभिः ॥५६

मृष्टचत्वररथ्याट्टमार्गं चन्दनचर्चितम् । लाजाक्षतैः पुष्पफलैस्तण्डुलैर्बलिभिर्युतम् ॥५७

ध्रुवाय पथि दृष्ट्वाय तत्र तत्र पुरस्त्रियः । सिद्धार्थक्षतदध्यम्बुदूर्वापुष्पफलानि च ॥५८

उपजह्रुः प्रयुंजाना वात्सल्यादाशिषः सतीः । शृण्वंस्तद्द्लगुगीतानि प्राविशद्भवनं पितुः ॥५९

वीरवर विदुरजी! वीरमाता सुनीतिके स्तन उसके नेत्रोंसे झरते हुए मंगलमय आनन्दाश्रुओंसे भीग गये और उनसे बार-बार दूध बहने लगा ।।५०।। उस समय पुरवासी लोग उनकी प्रशंसा करते हुए कहने लगे, ‘महारानीजी! आपका लाल बहुत दिनोंसे खोया हुआ था; सौभाग्यवश अब वह लौट आया, यह हम सबका दुःख दूर करनेवाला है। बहुत दिनोंतक भूमण्डलकी रक्षा करेगा ।।५१।। आपने अवश्य ही शरणागतभयभंजन श्रीहरिकी उपासना की है। उनका निरन्तर ध्यान करनेवाले धीर पुरुष परम दुर्जय मृत्युको भी जीत लेते हैं’ ।।५२।।

विदुरजी! इस प्रकार जब सभी लोग ध्रुवके प्रति अपना लाड़-प्यार प्रकट कर रहे थे,

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