श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउसी समय उन्हें भाई उत्तमके सहित हथिनीपर चढ़ाकर महाराज उत्तानपादने बड़े हर्षके साथ राजधानीमें प्रवेश किया। उस समय सभी लोग उनके भाग्यकी बड़ाई कर रहे थे ।।५३।। नगरमें जहाँ-तहाँ मगरके आकारके सुन्दर दरवाजे बनाये गये थे तथा फल-फूलोंके गुच्छोंके सहित केलेके खम्भे और सुपारीके पौधे सजाये गये थे ।।५४।। द्वार-द्वारपर दीपकके सहित जलके कलश रखे हुए थे—जो आमके पत्तों, वस्त्रों, पुष्पमालाओं तथा मोतीकी लड़ियोंसे सुसज्जित थे ।।५५।। जिन अनेकों परकोटों, फाटकों और महलोंसे नगरी सुशोभित थी, उन सबको सुवर्णकी सामग्रियोंसे सजाया गया था तथा उनके कँगूरे विमानोंके शिखरोंके समान चमक रहे थे ।।५६।। नगरके चौक, गलियों, अटारियों और सड़कोंको झाड़-बुहारकर उनपर चन्दनका छिड़काव किया गया था और जहाँ-तहाँ खील, चावल, पुष्प, फल, जौ एवं अन्य मांगलिक उपहार-सामग्रियाँ सजी रखी थीं ।।५७।। ध्रुवजी राजमार्गसे जा रहे थे। उस समय जहाँ-तहाँ नगरकी शीलवती सुन्दरियाँ उन्हें देखनेको एकत्र हो रही थीं। उन्होंने वात्सल्यभावसे अनेकों शुभाशीर्वाद देते हुए उनपर सफेद सरसों, अक्षत, दही, जल, दूर्वा, पुष्प और फलोंकी वर्षा की। इस प्रकार उनके मनोहर गीत सुनते हुए ध्रुवजीने अपने पिताके महलमें प्रवेश किया ।।५८-५९।। महामणिव्रातमये स तस्मिन् भवनोत्तमे । लालितो नितरां पित्रा न्यवसद्दिवि देववत् ।।६० पयःफेननिभाः शय्या दान्ता रुक्मपरिच्छदाः । आसनानि महार्हाणि यत्र रौक्मा उपस्कराः ।।६१ यत्र स्फटिककुड्येषु महामारकतेषु च । मणिप्रदीपा आभान्ति ललनारत्नसंयुताः ।।६२ उद्यानानि च रम्याणि विचित्रैरमरद्रुमैः । कूजद्विहंगमिथुनैर्गायनमत्तमधुव्रतैः ।।६३ वाप्यो वैदूर्यसोपानाः पद्मोत्पलकुमुद्वतीः । हंसकारण्डवकुलैर्जुष्टाश्चक्राह्वसारसैः ।।६४ उत्तानपादो राजर्षिः प्रभावं तनयस्य तम् । श्रुत्वा दृष्ट्वाद्भुततमं प्रपेदे विस्मयं परम् ।।६५ वीक्ष्योढवयसं तं च प्रकृतीनां च सम्मतम् । अनुरक्तप्रजं राजा ध्रुवं चक्रे भुवः पतिम् ।।६६ आत्मानं च प्रवयसमाकलय्य विशाम्पतिः । वनं विरक्तः प्रातिष्ठद्विमृशन्नात्मनो गतिम् ।।६७
वह श्रेष्ठ भवन महामूल्य मणियोंकी लड़ियोंसे सुसज्जित था। उसमें अपने पिताजीके लाड़-प्यारका सुख भोगते हुए वे उसी प्रकार आनन्दपूर्वक रहने लगे, जैसे स्वर्गमें देवतालोग ebook converter DEMO Watermarks*