श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 833, कुल 1617 में से
संदर्भ में पढ़ेंसभी पुरुषोंपर अखण्ड एवं अबाध शासन था ।।१२।। एक बार उन्होंने एक महासत्रकी दीक्षा ली; उस समय वहाँ देवताओं, ब्रह्मर्षियों और राजर्षियोंका बहुत बड़ा समाज एकत्र हुआ ।।१३।। उस समाजमें महाराज पृथुने उन पूजनीय अतिथियोंका यथायोग्य सत्कार किया और फिर उस सभामें, नक्षत्रमण्डलमें चन्द्रमाके समान खड़े हो गये ।।१४।। उनका शरीर ऊँचा, भुजाएँ भरी और विशाल, रंग गोरा, नेत्र कमलके समान सुन्दर और अरुणवर्ण, नासिका सुघड़, मुख मनोहर, स्वरूप सौम्य, कंधे ऊँचे और मुसकानसे युक्त दन्तपंक्ति सुन्दर थी ।।१५।। उनकी छाती चौड़ी, कमरका पिछला भाग स्थूल और उदर पीपलके पत्तेके समान सुडौल तथा बल पड़े हुए होनेसे और भी सुन्दर जान पड़ता था। नाभि भँवरके समान गम्भीर थी, शरीर तेजस्वी था, जंघाएँ सुवर्णके समान देदीप्यमान थीं तथा पैरोंके पंजे उभरे हुए थे ।।१६।। उनके बाल बारीक, घुँघराले, काले और चिकने थे; गरदन शंखके समान उतार-चढ़ाववाली तथा रेखाओंसे युक्त थी और वे उत्तम बहुमूल्य धोती पहने और वैसी ही चादर ओढ़े थे ।।१७।। दीक्षाके नियमानुसार उन्होंने समस्त आभूषण उतार दिये थे; इसीसे उनके शरीरके अंग-प्रत्यंगकी शोभा अपने स्वाभाविक रूपमें स्पष्ट झलक रही थी। वे शरीरपर कृष्णमृगका चर्म और हाथोंमें कुशा धारण किये हुए थे। इससे उनके शरीरकी कान्ति और भी बढ़ गयी थी। वे अपने सारे नित्यकृत्य यथाविधि सम्पन्न कर चुके थे ।।१८।। राजा पृथुने मानो सारी सभाको हर्षसे सराबोर करते हुए अपने शीतल एवं स्नेहपूर्ण नेत्रोंसे चारों ओर देखा और फिर अपना भाषण प्रारम्भ किया ।।१९।। उनका भाषण अत्यन्त सुन्दर, विचित्र पदोंसे युक्त, स्पष्ट, मधुर, गम्भीर एवं निःशंक था। मानो उस समय वे सबका उपकार करनेके लिये अपने अनुभवका ही अनुवाद कर रहे हों ।।२०।।
राजोवाच
सभ्याः शृणुत भद्रं वः साधवो य इहागताः । सत्सु जिज्ञासुभिर्धर्ममावेद्यं स्वमनीषितम् ।।२१
अहं दण्डधरो राजा प्रजानामिह योजितः । रक्षिता वृत्तिदः स्वेषु सेतुषु स्थापिता पृथक् ।।२२
तस्य मे तदनुष्ठानाद्यानाहुर्ब्रह्मवादिनः । लोकाः स्युः कामसन्दोहा यस्य तुष्यति दिष्टदृक् ।।२३
य उद्धरेत्करं राजा प्रजा धर्मेष्वशिक्षयन् । प्रजानां शमलं भुङ्क्ते भगं च स्वं जहाति सः ।।२४
तत् प्रजा भर्तृपिण्डार्थं स्वार्थमेवानसूयवः ।
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