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श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,617 पृष्ठ

सभी पुरुषोंपर अखण्ड एवं अबाध शासन था ।।१२।। एक बार उन्होंने एक महासत्रकी दीक्षा ली; उस समय वहाँ देवताओं, ब्रह्मर्षियों और राजर्षियोंका बहुत बड़ा समाज एकत्र हुआ ।।१३।। उस समाजमें महाराज पृथुने उन पूजनीय अतिथियोंका यथायोग्य सत्कार किया और फिर उस सभामें, नक्षत्रमण्डलमें चन्द्रमाके समान खड़े हो गये ।।१४।। उनका शरीर ऊँचा, भुजाएँ भरी और विशाल, रंग गोरा, नेत्र कमलके समान सुन्दर और अरुणवर्ण, नासिका सुघड़, मुख मनोहर, स्वरूप सौम्य, कंधे ऊँचे और मुसकानसे युक्त दन्तपंक्ति सुन्दर थी ।।१५।। उनकी छाती चौड़ी, कमरका पिछला भाग स्थूल और उदर पीपलके पत्तेके समान सुडौल तथा बल पड़े हुए होनेसे और भी सुन्दर जान पड़ता था। नाभि भँवरके समान गम्भीर थी, शरीर तेजस्वी था, जंघाएँ सुवर्णके समान देदीप्यमान थीं तथा पैरोंके पंजे उभरे हुए थे ।।१६।। उनके बाल बारीक, घुँघराले, काले और चिकने थे; गरदन शंखके समान उतार-चढ़ाववाली तथा रेखाओंसे युक्त थी और वे उत्तम बहुमूल्य धोती पहने और वैसी ही चादर ओढ़े थे ।।१७।। दीक्षाके नियमानुसार उन्होंने समस्त आभूषण उतार दिये थे; इसीसे उनके शरीरके अंग-प्रत्यंगकी शोभा अपने स्वाभाविक रूपमें स्पष्ट झलक रही थी। वे शरीरपर कृष्णमृगका चर्म और हाथोंमें कुशा धारण किये हुए थे। इससे उनके शरीरकी कान्ति और भी बढ़ गयी थी। वे अपने सारे नित्यकृत्य यथाविधि सम्पन्न कर चुके थे ।।१८।। राजा पृथुने मानो सारी सभाको हर्षसे सराबोर करते हुए अपने शीतल एवं स्नेहपूर्ण नेत्रोंसे चारों ओर देखा और फिर अपना भाषण प्रारम्भ किया ।।१९।। उनका भाषण अत्यन्त सुन्दर, विचित्र पदोंसे युक्त, स्पष्ट, मधुर, गम्भीर एवं निःशंक था। मानो उस समय वे सबका उपकार करनेके लिये अपने अनुभवका ही अनुवाद कर रहे हों ।।२०।।

राजोवाच

सभ्याः शृणुत भद्रं वः साधवो य इहागताः । सत्सु जिज्ञासुभिर्धर्ममावेद्यं स्वमनीषितम् ।।२१

अहं दण्डधरो राजा प्रजानामिह योजितः । रक्षिता वृत्तिदः स्वेषु सेतुषु स्थापिता पृथक् ।।२२

तस्य मे तदनुष्ठानाद्यानाहुर्ब्रह्मवादिनः । लोकाः स्युः कामसन्दोहा यस्य तुष्यति दिष्टदृक् ।।२३

य उद्धरेत्करं राजा प्रजा धर्मेष्वशिक्षयन् । प्रजानां शमलं भुङ्क्ते भगं च स्वं जहाति सः ।।२४

तत् प्रजा भर्तृपिण्डार्थं स्वार्थमेवानसूयवः ।

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कुरुताधोक्षजधियस्तर्हि मेऽनुग्रहः कृतः ॥२५

यूयं तदनुमोदध्वं पितृदेवर्षयोऽमलाः । कर्तुः शास्तुरनुज्ञातुस्तुल्यं यत्प्रेत्य तत्फलम् ॥२६

अस्ति यज्ञपतिर्नाम केषाञ्चिदर्हसत्तमाः । इहामुत्र च लक्ष्यन्ते ज्योत्स्नावत्यः क्वचिद्विभुवः ॥२७

मनोरुत्तानपादस्य ध्रुवस्यापि महीपतेः । प्रियव्रतस्य राजर्षेरंगस्यास्मत्पितुः पितुः ॥२८

ईदृशानामथान्येषामजस्य च भवस्य च । प्रह्लादस्य बलेश्रापि कृत्यमस्ति गदाभृता ॥२९

दौहित्रादीनृते मृत्योः शोच्यान् धर्मविमोहितान् । वर्गस्वर्गापवर्गाणां प्रायेणैकात्म्यहेतुना ॥३०

राजा पृथुने कहा—सज्जनो! आपका कल्याण हो। आप महानुभाव, जो यहाँ पधारे हैं, मेरी प्रार्थना सुनें—जिज्ञासु पुरुषोंको चाहिये कि संत-समाजमें अपने निश्चयका निवेदन करें ॥२१॥ इस लोकमें मुझे प्रजाजनोंका शासन, उनकी रक्षा, उनकी आजीविकाका प्रबन्ध तथा उन्हें अलग-अलग अपनी मर्यादामें रखनेके लिये राजा बनाया गया है ॥२२॥ अतः इनका यथावत् पालन करनेसे मुझे उन्हीं मनोरथ पूर्ण करनेवाले लोकोंकी प्राप्ति होनी चाहिये, जो वेदवादी मुनियोंके मतानुसार सम्पूर्ण कर्मोंके साक्षी श्रीहरिके प्रसन्न होनेपर मिलते हैं ॥२३॥ जो राजा प्रजाको धर्ममार्गकी शिक्षा न देकर केवल उससे कर वसूल करनेमें लगा रहता है, वह केवल प्रजाके पापका ही भागी होता है और अपने ऐश्वर्यसे हाथ धो बैठता है ॥२४॥ अतः प्रिय प्रजाजन! अपने इस राजाका परलोकमें हित करनेके लिये आपलोग परस्पर दोषदृष्टि छोड़कर हृदयसे भगवान्‌को याद रखते हुए अपने-अपने कर्तव्यका पालन करते रहिये; क्योंकि आपका स्वार्थ भी इसीमें है और इस प्रकार मुझपर भी आपका बड़ा अनुग्रह होगा ॥२५॥ विशुद्धचित्त देवता, पितर और महर्षिगण! आप भी मेरी इस प्रार्थनाका अनुमोदन कीजिये; क्योंकि कोई भी कर्म हो, मरनेके अनन्तर उसके कर्ता, उपदेष्टा और समर्थकको उसका समान फल मिलता है ॥२६॥ माननीय सज्जनो! किन्हीं श्रेष्ठ महानुभावोंके मतमें तो कर्मोंका फल देनेवाले भगवान् यज्ञपति ही हैं; क्योंकि इहलोक और परलोक दोनों ही जगह कोई-कोई शरीर बड़े तेजोमय देखे जाते हैं ॥२७॥ मनु, उत्तानपाद, महीपति ध्रुव, राजर्षि प्रियव्रत, हमारे दादा अंग तथा ब्रह्मा, शिव, प्रह्लाद, बलि और इसी कोटिके अन्यान्य महानुभावोंके मतमें तो धर्म-अर्थ-काम-मोक्षरूप चतुर्वर्ग तथा स्वर्ग और

अपवर्गके स्वाधीन नियामक, कर्मफलदातारूपसे भगवान् गदाधरकी आवश्यकता है ही। इस विषयमें तो केवल मृत्युके दौहित्र वेन आदि कुछ शोचनीय और धर्मविमूढ़ लोगोंका ही मतभेद है। अतः उसका कोई विशेष महत्त्व नहीं हो सकता ।।२८-३०।।

यत्पादसेवाभिरुचिस्तपस्विना- मशेषजन्मोपचितं मलं धियः । सद्यः क्षिणोत्यन्वहमेधती सती यथा पदांगुष्ठविनिःसृता सरित् ।।३१

विनिर्धुताशेषमनोमलः पुमा- नसंगविज्ञानविशेषवीर्यवान् । यदङ्घ्रिमूले कृतकेतनः पुन- र्न संसृतिं क्लेशवहां प्रपद्यते ।।३२

तमेव यूयं भजतात्मवृत्तिभि- र्मनोवचःकायगुणैः स्वकर्मभिः । अमायिनः कामदुघाङ्घ्रिपङ्कजं यथाधिकारावसितार्थसिद्धयः ।।३३

असाविहानेकगुणोऽगुणोऽध्वरः पृथग्विधद्रव्यगुणक्रियोक्तिभिः । सम्पद्यतेऽर्थाशयलिंगनामभि- र्विशुद्धविज्ञानघनः स्वरूपतः ।।३४

प्रधानकालाशयधर्मसंग्रहे शरीर एष प्रतिपद्य चेतनाम् । क्रियाफलत्वेन विभुर्विभाव्यते यथानलो दारुषु तद्गुणात्मकः ।।३५

अहो ममामी वितरन्त्यनुग्रहं हरिं गुरुं यज्ञभुजामधीश्वरम् । स्वधर्मयोगेन यजन्ति मामका निरन्तरं क्षोणितले दृढव्रताः ।।३६

मा जातु तेजः प्रभवेन्महर्द्धिभि- स्तितिक्षया तपसा विद्यया च । देदीप्यमानेऽजितदेवतानां कुले स्वयं राजकुलाद् द्विजानाम् ।।३७

जिनके चरणकमलोंकी सेवाके लिये निरन्तर बढ़नेवाली अभिलाषा उन्हींके चरणनखसे

निकली हुई गंगाजीके समान, संसारतापसे संतप्त जीवोंके समस्त जन्मोंके संचित मनोमलको तत्काल नष्ट कर देती है, जिनके चरणतलका आश्रय लेनेवाला पुरुष सब प्रकारके मानसिक दोषोंको धो डालता तथा वैराग्य और तत्त्वसाक्षात्काररूप बल पाकर फिर इस दुःखमय संसारचक्रमें नहीं पड़ता और जिनके चरणकमल सब प्रकारकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं—उन प्रभुको आपलोग अपनी-अपनी आजीविकाके उपयोगी वर्णाश्रमोचित अध्यापनादि कर्मों तथा ध्यान-स्तुति-पूजादि मानसिक, वाचिक एवं शारीरिक क्रियाओंके द्वारा भजें। हृदयमें किसी प्रकारका कपट न रखें तथा यह निश्चय रखें कि हमें अपने-अपने अधिकारानुसार इसका फल अवश्य प्राप्त होगा ।।३१-३३।।

भगवान् स्वरूपतः विशुद्ध विज्ञानघन और समस्त विशेषणोंसे रहित हैं; किन्तु इस कर्ममार्गमें जौ-चावल आदि विविध द्रव्य, शुक्लादि गुण, अवघात (कूटना) आदि क्रिया एवं मन्त्रोंके द्वारा और अर्थ, आशय (संकल्प), लिंग (पदार्थ-शक्ति) तथा ज्योतिष्टोम आदि नामोंसे सम्पन्न होनेवाले, अनेक विशेषणयुक्त यज्ञके रूपमें प्रकाशित होते हैं ।।३४।। जिस प्रकार एक ही अग्नि भिन्न-भिन्न काष्ठोंमें उन्हींके आकारादिके अनुरूप भासती है, उसी प्रकार वे सर्वव्यापक प्रभु परमानन्दस्वरूप होते हुए भी प्रकृति, काल, वासना और अदृष्टसे उत्पन्न हुए शरीरमें विषयाकार बनी हुई बुद्धिमें स्थित होकर उन यज्ञ-यागादि क्रियाओंके फलस्वरूपसे अनेक प्रकारके जान पड़ते हैं ।।३५।।

अहो! इस पृथ्वीतलपर मेरे जो प्रजाजन यज्ञ-भोक्ताओंके अधीश्वर सर्वगुरु श्रीहरिका एकनिष्ठभावसे अपने-अपने धर्मोंके द्वारा निरन्तर पूजन करते हैं, वे मुझपर बड़ी कृपा करते हैं ।।३६।। सहनशीलता, तपस्या और ज्ञान इन विशिष्ट विभूतियोंके कारण वैष्णव और ब्राह्मणोंके वंश स्वभावतः ही उज्ज्वल होते हैं। उनपर राजकुलका तेज, धन, ऐश्वर्य आदि समृद्धियोंके कारण अपना प्रभाव न डाले ।।३७।।

ब्रह्मण्यदेवः पुरुषः पुरातनो नित्यं हरैर्यच्चरणाभिवन्दनात् । अवाप लक्ष्मीमनपायिनीं यशो जगत्पवित्रं च महत्तमाग्रणीः ।।३८

यत्सेवयाशेषगुहाशयः स्वराड् विप्रप्रियस्तुष्यति काममीश्वरः । तदेव तद्धर्मपरैर्विनीतैः सर्वात्मना ब्रह्मकुलं निषेव्यताम् ।।३९

पुमाँल्लभेतानतिवेलमात्मनः प्रसीदतोऽत्यन्तशमं स्वतः स्वयम् । यन्नित्यसम्बन्धनिषेवया ततः परं किमत्रास्ति मुखं हविर्भुजाम् ।।४०

अश्नात्यनन्तः खलु तत्त्वकोविदैः

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श्रद्धाहुतं यन्मुख इज्यनामभिः । न वै तथा चेतनया बहिष्कृते हुताशने पारमहंस्यपर्यगुः ॥४१ यद्ब्रह्म नित्यं विरजं सनातनं श्रद्धातपोमंगलमौनसंयमैः । समाधिना बिभ्रति हार्थदृष्टये यत्रेदमादर्श इवावभासते ॥४२ तेषामहं पादसरोजरेणु- मार्या वहेयाधिकिरीटमाऽऽयुः । यं नित्यदा बिभ्रत आशु पापं नश्यत्यमुं सर्वगुणा भजन्ति ॥४३ गुणायनं शीलधनं कृतज्ञं वृद्धाश्रयं संवृणतेऽनु सम्पदः । प्रसीदतां ब्रह्मकुलं गवां च जनार्दनः सानुचरश्च मह्यम् ॥४४

ब्रह्मादि समस्त महापुरुषोंमें अग्रगण्य, ब्राह्मणभक्त, पुराणपुरुष श्रीहरिने भी निरन्तर इन्हींके चरणोंकी वन्दना करके अविचल लक्ष्मी और संसारको पवित्र करनेवाली कीर्ति प्राप्त की है ।।३८।। आपलोग भगवान्के लोकसंग्रहरूप धर्मका पालन करनेवाले हैं तथा सर्वान्तर्यामी स्वयंप्रकाश ब्राह्मणप्रिय श्रीहरि विप्रवंशकी सेवा करनेसे ही परम सन्तुष्ट होते हैं, अतः आप सभीको सब प्रकारसे विनयपूर्वक ब्राह्मणकुलकी सेवा करनी चाहिये ।।३९।। इनकी नित्य सेवा करनेसे शीघ्र ही चित्त शुद्ध हो जानेके कारण मनुष्य स्वयं ही (ज्ञान और अभ्यास आदिके बिना ही) परम शान्तिरूप मोक्ष प्राप्त कर लेता है। अतः लोकमें इन ब्राह्मणोंसे बढ़कर दूसरा कौन है जो हविष्यभोजी देवताओंका मुख हो सके? ।।४०।। उपनिषदोंके ज्ञान-परक वचन एकमात्र जिनमें ही गतार्थ होते हैं, वे भगवान् अनन्त इन्द्रादि यज्ञीय देवताओंके नामसे तत्त्वज्ञानियोंद्वारा ब्राह्मणोंके मुखमें श्रद्धापूर्वक हवन किये हुए पदार्थको जैसे चावसे ग्रहण करते हैं, वैसे चेतनाशून्य अग्निमें होमे हुए द्रव्यको नहीं ग्रहण करते ।।४१।। सभ्यगण! जिस प्रकार स्वच्छ दर्पणमें प्रतिबिम्बका भान होता है—उसी प्रकार जिससे इस सम्पूर्ण प्रपंचका ठीक-ठीक ज्ञान होता है, उस नित्य, शुद्ध और सनातन ब्रह्म (वेद)-को जो परमार्थ-तत्त्वकी उपलब्धिके लिये श्रद्धा, तप, मंगलमय आचरण, स्वाध्यायविरोधी वार्तालापके त्याग तथा संयम और समाधिके अभ्यासद्वारा धारण करते हैं, उन ब्राह्मणोंके चरणकमलोंकी धूलिको मैं आयुपर्यन्त अपने मुकुटपर धारण करूँ; क्योंकि उसे सर्वदा सिरपर चढ़ाते रहनेसे मनुष्यके सारे पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं और सम्पूर्ण गुण उसकी सेवा करने लगते हैं ।।४२-४३।। उस गुणवान्, शीलसम्पन्न, कृतज्ञ और गुरुजनोंकी

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सेवा करनेवाले पुरुषके पास सारी सम्पदाएँ अपने-आप आ जाती हैं। अतः मेरी तो यही अभिलाषा है कि ब्राह्मणकुल, गोवंश और भक्तोंके सहित श्रीभगवान् मुझपर सदा प्रसन्न रहें ।।४४।।

मैत्रेय उवाच

इति ब्रुवाणं नृपतिं पितृदेवद्विजातयः ।
तुष्टुवुर्हृष्टमनसः साधुवादेन साधवः ।।४५

पुत्रेण जयते लोकानिति सत्यवती श्रुतिः ।
ब्रह्मदण्डहतः पापो यद्वेनोऽत्यतरत्तमः ।।४६

हिरण्यकशिपुश्चापि भगवन्निन्दया तमः ।
विविक्षुरत्यगात्सूनोः प्रह्लादस्यानुभावतः ।।४७

वीरवर्य पितः पृथ्व्याः समाः संजीव शाश्वतीः ।
यस्येदृश्यच्युते भक्तिः सर्वलोकैकभर्तरि ।।४८

अहो वयं ह्यद्य पवित्रकीर्ते
त्वयैव नाथेन मुकुन्दनाथाः ।
य उत्तमश्लोकत Corinth? -> य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? -> य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? 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य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य

यथार्थ है; पापी वेन ब्राह्मणोंके शापसे मारा गया था; फिर भी इनके पुण्यबलसे उसका नरकसे निस्तार हो गया ।।४६।।

इसी प्रकार हिरण्यकशिपु भी भगवान्‌की निन्दा करनेके कारण नरकोंमें गिरनेवाला ही था कि अपने पुत्र प्रह्लादके प्रभावसे उन्हें पार कर गया ।।४७।। वीरवर पृथुजी! आप तो पृथ्वीके पिता ही हैं और सब लोकोंके एकमात्र स्वामी श्रीहरिमें भी आपकी ऐसी अविचल भक्ति है, इसलिये आप अनन्त वर्षोंतक जीवित रहें ।।४८।।

आपका सुयश बड़ा पवित्र है; आप उदारकीर्ति ब्रह्मण्यदेव श्रीहरिकी कथाओंका प्रचार करते हैं। हमारा बड़ा सौभाग्य है; आज आपको अपने स्वामीके रूपमें पाकर हम अपनेको भगवान्‌के ही राज्यमें समझते हैं ।।४९।।

स्वामिन्‌! अपने आश्रितोंको इस प्रकारका श्रेष्ठ उपदेश देना आपके लिये कोई आश्चर्यकी बात नहीं है; क्योंकि अपनी प्रजाके ऊपर प्रेम रखना तो करुणामय महापुरुषोंका स्वभाव ही होता है ।।५०।।

हमलोग प्रारब्धवश विवेकहीन होकर संसारारण्यमें भटक रहे थे; सो प्रभो! आज आपने हमें इस अज्ञानान्धकारके पार पहुँचा दिया ।।५१।।

आप शुद्ध सत्त्वमय परमपुरुष हैं, जो ब्राह्मणजातिमें प्रविष्ट होकर क्षत्रियोंकी और क्षत्रियजातिमें प्रविष्ट होकर ब्राह्मणोंकी तथा दोनों जातियोंमें प्रतिष्ठित होकर सारे जगत्‌की रक्षा करते हैं। हमारा आपको नमस्कार है ।।५२।।

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे एकविंशोऽध्यायः ।।२१।।


१. प्रा० पा०—तदाधिरा०। २. प्रा० पा०—उपयन्ति।

अथ द्वाविंशोऽध्यायः महाराज पृथुको सनकादिका उपदेश

मैत्रेय उवाच

जनेषु प्रगृणत्स्वेवं पृथुं पृथुलविक्रमम् । तत्रोपजग्मुर्मुनयश्चत्वारः सूर्यवर्चसः ॥१

तांस्तु सिद्धेश्वरान् राजा व्योम्नोऽवतरतोऽर्चिषा । लोकानपापान् कुर्वत्या सानुगोऽचष्ट लक्षितान् ॥२

तद्दर्शनोद्गतान् प्राणान् प्रत्यादित्सुरिवोत्थितः । ससदस्यानुगो वैन्य इन्द्रियेशो गुणानिव ॥३

गौरवाद्यन्त्रितः सभ्यः प्रश्रयानतकन्धरः । विधिवत्पूजयांचक्रे गृहीतार्घ्यर्हणासनान् ॥४

तत्पादशौचसलिलैर्मार्जितालकबन्धनः । तत्र शीलवतां वृत्तमाचरन्मानयन्निव ॥५

हाटकासन आसीनान् स्वधिष्ण्येष्विव पावकान् । श्रद्धासंयमसंयुक्तः प्रीतः प्राह भवाग्रजान् ॥६

पृथुरुवाच

अहो आचरितं किं मे मंगलं मंगलायनाः । यस्य वो दर्शनं ह्यासीद्दुर्दर्शनां च योगिभिः ॥७

किं तस्य दुर्लभतरमिह लोके परत्र च । यस्य विप्राः प्रसीदन्ति शिवो विष्णुश्च सानुगः ॥८

नैव लक्ष्यते लोको लोकान् पर्यटतोऽपि यान् । यथा सर्वदृशं सर्व आत्मानं येऽस्य हेतवः ॥९

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—जिस समय प्रजाजन परमपराक्रमी पृथ्वीपाल पृथुकी इस प्रकार प्रार्थना कर रहे थे, उसी समय वहाँ सूर्यके समान तेजस्वी चार मुनीश्वर आये ॥१॥ राजा और उनके अनुचरोंने देखा तथा पहचान लिया कि वे सिद्धेश्वर अपनी दिव्य कान्तिसे सम्पूर्ण लोकोंको पापनिर्मुक्त करते हुए आकाशसे उतरकर आ रहे हैं ॥२॥ राजाके प्राण सनकादिकोंका दर्शन करते ही, जैसे विषयी जीव विषयोंकी ओर दौड़ता है, उनकी ओर चल पड़े—मानो उन्हें रोकनेके लिये ही वे अपने सदस्यों और अनुयायियोंके साथ एकाएक उठकर खड़े हो गये ॥३॥ जब वे मुनिगण अर्घ्य स्वीकारकर आसनपर विराज गये, तब शिष्टाग्रणी पृथुने उनके गौरवसे प्रभावित हो विनयवश गरदन झुकाये हुए उनकी विधिवत् पूजा की ॥४॥ फिर उनके चरणोदकको अपने सिरके बालोंपर छिड़का। इस प्रकार शिष्टजनोचित आचारका आदर तथा पालन करके उन्होंने यही दिखाया कि सभी सत्पुरुषोंको ऐसा व्यवहार करना चाहिये ॥५॥ सनकादि मुनीश्वर भगवान् शंकरके भी अग्रज हैं। सोनेके सिंहासनपर वे ऐसे सुशोभित हुए, जैसे अपने-अपने स्थानोंपर अग्नि देवता। महाराज पृथुने बड़ी श्रद्धा और संयमके साथ प्रेमपूर्वक उनसे कहा ॥६॥

पृथुजीने कहा—मंगलमूर्ति मुनीश्वरो! आपके दर्शन तो योगियोंको भी दुर्लभ हैं; मुझसे ऐसा क्या पुण्य बना है जिससे स्वतः आपका दर्शन प्राप्त हुआ ॥७॥ जिसपर ब्राह्मण अथवा अनुचरोंके सहित श्रीशंकर या विष्णुभगवान् प्रसन्न हों, उसके लिये इहलोक और परलोकमें कौन-सी वस्तु दुर्लभ है ॥८॥ इस दृश्य-प्रपंचके कारण महत्तत्त्वादि यद्यपि सर्वगत हैं, तो भी वे सर्वसाक्षी आत्माको नहीं देख सकते; इसी प्रकार यद्यपि आप समस्त लोकोंमें विचरते रहते हैं, तो भी अनधिकारीलोग आपको देख नहीं पाते ॥९॥

अधना१ अपि ते धन्याः साधवो गृहमेधिनः । यद्गृहा ह्यर्हवर्याम्बुतृणभूमीश्वरावराः२ ॥१०

व्यालालयद्रुमा वै३ तेऽप्यरिक्ताखिलसम्पदः । यद्गृहास्तीर्थपादीयपादतीर्थविवर्जिताः ॥११

स्वागतं वो द्विजश्रेष्ठा यद्व्रतानि मुमुक्षवः । चरन्ति श्रद्धया धीरा बाला एव बृहन्ति च४ ॥१२

कच्चिन्नः कुशलं नाथा इन्द्रियार्थार्थवेदिनाम् । व्यसनावाप एतस्मिन् पतितानां स्वकर्मभिः ॥१३

भवत्सु कुशलप्रश्न आत्मारामेषु नेष्यते । कुशलाकुशला यत्र न सन्ति मतिवृत्तयः ॥१४

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तदहं कृतविश्रम्भः सुहृदो वस्तपस्विनाम् । संपृच्छे भव एतस्मिन् क्षेमः केनाञ्जसा भवेत् ॥१५

व्यक्तमात्मवतामात्मा भगवानात्मभावनः । स्वानामनुग्रहायेमां सिद्धरूपी चरत्यजः ॥१६

मैत्रेय उवाच

पृथोस्तत्सूक्तमाकर्ण्य सारं सुष्ठु मितं मधु । स्मयमान इव प्रीत्या कुमारः प्रत्युवाच ह ॥१७

सनत्कुमार उवाच

साधु पृष्टं महाराज सर्वभूतहितात्मना । भवता विदुषा चापि साधूनां मतिरीदृशी ॥१८

जिनके घरोंमें आप-जैसे पूज्य पुरुष उनके जल, तृण, पृथ्वी, गृहस्वामी अथवा सेवकादि किसी अन्य पदार्थको स्वीकार कर लेते हैं, वे गृहस्थ धनहीन होनेपर भी धन्य हैं ॥१०॥ जिन घरोंमें कभी भगवद्भक्तोंके परमपवित्र चरणोदकके छींटे नहीं पड़े, वे सब प्रकारकी ऋद्धि-सिद्धियोंसे भरे होनेपर भी ऐसे वृक्षोंके समान हैं कि जिनपर साँप रहते हैं ॥११॥ मुनीश्वरो! आपका स्वागत है। आपलोग तो बाल्यावस्थासे ही मुमुक्षुओंके मार्गका अनुसरण करते हुए एकाग्रचित्तसे ब्रह्मचर्यादि महान् व्रतोंका बड़ी श्रद्धापूर्वक आचरण कर रहे हैं ॥१२॥ स्वामियो! हमलोग अपने कर्मोंके वशीभूत होकर विपत्तियोंके क्षेत्ररूप इस संसारमें पड़े हुए केवल इन्द्रियसम्बन्धी भोगोंको ही परम पुरुषार्थ मान रहे हैं; सो क्या हमारे निस्तारका भी कोई उपाय है ॥१३॥ आपलोगोंसे कुशलप्रश्न करना उचित नहीं है, क्योंकि आप निरन्तर आत्मामें ही रमण करते हैं। आपमें यह कुशल है और यह अकुशल है—इस प्रकारकी वृत्तियाँ कभी होती ही नहीं ॥१४॥ आप संसारानलसे सन्तप्त जीवोंके परम सुहृद् हैं, इसलिये आपमें विश्वास करके मैं यह पूछना चाहता हूँ कि इस संसारमें मनुष्यका किस प्रकार सुगमतासे कल्याण हो सकता है? ॥१५॥ यह निश्चय है कि जो आत्मवान् (धीर) पुरुषोंमें 'आत्मा' रूपसे प्रकाशित होते हैं और उपासकोंके हृदयमें अपने स्वरूपको प्रकट करनेवाले हैं, वे अजन्मा भगवान् नारायण ही अपने भक्तोंपर कृपा करनेके लिये आप-जैसे सिद्ध पुरुषोंके रूपमें इस पृथ्वीपर विचरा करते हैं ॥१६॥

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—राजा पृथुके ये युक्तियुक्त, गम्भीर, परिमित और मधुर वचन सुनकर श्रीसनत्कुमारजी बड़े प्रसन्न हुए और कुछ मुसकराते हुए कहने लगे ॥१७॥

श्रीसनत्कुमारजीने कहा—महाराज! आपने सब कुछ जानते हुए भी समस्त प्राणियोंके

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कल्याणकी दृष्टिसे बड़ी अच्छी बात पूछी है। सच है, साधुपुरुषोंकी बुद्धि ऐसी ही हुआ करती है ।।१८।।

संगमः खलु साधूनामुभयेषां च सम्मतः। यत्सम्भाषणसम्पश्नः सर्वेषां वितनोति शम् ।।१९ अस्त्येव राजन् भवतो मधुद्विषः पादारविन्दस्य गुणानुवादने । रतिर्दुरापा विधुनोति नैष्ठिकी कामं कषायं मलमन्तरात्मनः ।।२० शास्त्रेष्वियानेव सुनिश्चितो नृणां क्षेमस्य सध्रयग्विम्शृशेषु हेतुः । असङ्ग आत्मव्यतिरिक्त आत्मनि दृढा रतिर्ब्रह्मणि१ निर्गुणे च या ।।२१ सा श्रद्धया भगवद्धर्मचर्यया जिज्ञासयाऽऽध्यात्मिकयोगनिष्ठया । योगेश्वरोपासनया च नित्यं पुण्यश्रवःकथया पुण्यया च ।।२२ अर्थेन्द्रियारामसगोष्ठ्यतृष्णया तत्सम्मतानामपरिग्रहेण च । विविक्तरुच्या परितोष आत्मन् विना हरेर्गुणपीयूषपानात् ।।२३ अहिंसया पारमहंस्यचर्यया स्मृत्या मुकुन्दाचरिताग्र्यसीधुना । यमैरकामैर्नियमैश्चाप्यनिन्दया निरीहया द्वन्द्वतितिक्षया च ।।२४ हरेर्मुहुस्तत्परकर्णपूर- गुणाभिधानेन विजृम्भमाणया । भक्त्या ह्यसङ्गः सदसत्यनात्मनि स्यान्निर्गुणे ब्रह्मणि चाञ्जसा रतिः ।।२५

सत्पुरुषोंका समागम श्रोता और वक्ता दोनोंको ही अभिमत होता है, क्योंकि उनके प्रश्नोत्तर सभीका कल्याण करते हैं ॥१९॥ राजन्! श्रीमधुसूदन भगवान्‌के चरणकमलोंके गुणानुवादमें अवश्य ही आपकी अविचल प्रीति है। हर किसीको इसका प्राप्त होना बहुत कठिन है और प्राप्त हो जानेपर यह हृदयके भीतर रहनेवाले उस वासनारूप मलको सर्वथा

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नष्ट कर देती है, जो और किसी उपायसे जल्दी नहीं छूटता ।।२०।। शास्त्र जीवोंके कल्याणके लिये भलीभाँति विचार करनेवाले हैं; उनमें आत्मासे भिन्न देहादिके प्रति वैराग्य तथा अपने आत्मस्वरूप निर्गुण ब्रह्ममें सुदृढ़ अनुराग होना—यही कल्याणका साधन निश्चित किया गया है ।।२१।। शास्त्रोंका यह भी कहना है कि गुरु और शास्त्रके वचनोंमें विश्वास रखनेसे, भागवतधर्मोंका आचरण करनेसे, तत्त्वजिज्ञासासे, ज्ञानयोगकी निष्ठासे, योगेश्वर श्रीहरिकी उपासनासे, नित्यप्रति पुण्यकीर्ति श्रीभगवान्‌की पावन कथाओंको सुननेसे, जो लोग धन और इन्द्रियोंके भोगोंमें ही रत हैं उनकी गोष्ठीमें प्रेम न रखनेसे, उन्हें प्रिय लगनेवाले पदार्थोंका आसक्तिपूर्वक संग्रह न करनेसे, भगवद्गुणामृतका पान करनेके सिवा अन्य समय आत्मामें ही सन्तुष्ट रहते हुए एकान्तसेवनमें प्रेम रखनेसे, किसी भी जीवको कष्ट न देनेसे, निवृत्तिनिष्ठासे, आत्महितका अनुसन्धान करते रहनेसे, श्रीहरिके पवित्र चरित्ररूप श्रेष्ठ अमृतका आस्वादन करनेसे, निष्कामभावसे यम-नियमोंका पालन करनेसे, कभी किसीकी निन्दा न करनेसे, योगक्षेमके लिये प्रयत्न न करनेसे, शीतोष्णादि द्वन्द्वोंको सहन करनेसे, भक्तजनोंके कानोंको सुख देनेवाले श्रीहरिके गुणोंका बार-बार वर्णन करनेसे और बढ़ते हुए भक्तिभावसे मनुष्यका कार्य-कारणरूप सम्पूर्ण जड प्रपंचसे वैराग्य हो जाता है और आत्मस्वरूप निर्गुण परब्रह्ममें अनायास ही उसकी प्रीति हो जाती है ।।२२-२५।।

यदा रतिर्ब्रह्मणि नैष्ठिकी पुमा-
नाचार्यवान् ज्ञानविरागरंहसा ।
दहत्यवीर्यं हृदयं जीवकोशं१
पञ्चात्मकं योनिमिवोत्थितोऽग्निः ॥२६

दग्धाशयो मुक्तसमस्ततद्गुणो
नैवात्मनो बहिरन्तर्विचेष्टे ।
परात्मनोर्यद् व्यवधानं पुरस्तात्
स्वप्ने यथा पुरुषस्तद्विनाशे ॥२७

आत्मानमिन्द्रियार्थं च परं यदुभयोरपि ।
सत्याशय उपाधौ वै पुमान् पश्यति नान्यदा ॥२८

निमित्ते सति सर्वत्र जलादावपि पूरुषः ।
आत्मनश्च परस्यापि भिदां पश्यति नान्यदा ॥२९

इन्द्रियैर्विषयाकृष्टैराक्षिप्तं ध्यायतां मनः ।
चेतनां हरते बुद्धेः स्तम्बस्तोयमित्र ह्रदात् ॥३०

भ्रश्यत्यनु स्मृतिश्चित्तं ज्ञानभ्रंशः स्मृतिक्षये ।
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तद्रोधं कवयः प्राहुरारत्मापह्नवमात्मनः ।।३१

नातः परतरो लोके पुंसः स्वार्थव्यतिक्रमः ।
यद्ध्यन्यस्य प्रेयस्त्वमात्मनः स्वव्यतिक्रमात् ।।३२

परब्रह्ममें सुदृढ़ प्रीति हो जानेपर पुरुष सद्गुरुकी शरण लेता है; फिर ज्ञान और वैराग्यके प्रबल वेगके कारण वासनाशून्य हुए अपने अविद्यादि पाँच प्रकारके क्लेशोंसे युक्त अहंकारात्मक अपने लिंगशरीरको वह उसी प्रकार भस्म कर देता है, जैसे अग्नि लकड़ीसे प्रकट होकर फिर उसीको जला डालती है ।।२६।। इस प्रकार लिंग देहका नाश हो जानेपर वह उसके कर्तृत्वादि सभी गुणोंसे मुक्त हो जाता है। फिर तो जैसे स्वप्नावस्थामें तरह-तरहके पदार्थ देखनेपर भी उससे जग पड़नेपर उनमेंसे कोई चीज दिखायी नहीं देती, उसी प्रकार वह पुरुष शरीरके बाहर दिखायी देनेवाले घट-पटादि और भीतर अनुभव होनेवाले सुख-दुःखादिको भी नहीं देखता। इस स्थितिके प्राप्त होनेसे पहले ये पदार्थ ही जीवात्मा और परमात्माके बीचमें रहकर उनका भेद कर रहे थे ।।२७।।

जबतक अन्तःकरणरूप उपाधि रहती है, तभीतक पुरुषको जीवात्मा, इन्द्रियोंके विषय और इन दोनोंका सम्बन्ध करानेवाले अहंकारका अनुभव होता है; इसके बाद नहीं ।।२८।। बाह्य जगत्में भी देखा जाता है कि जल, दर्पण आदि निमित्तोंके रहनेपर ही अपने बिम्ब और प्रतिबिम्बका भेद दिखायी देता है, अन्य समय नहीं ।।२९।। जो लोग विषयचिन्तनमें लगे रहते हैं, उनकी इन्द्रियाँ विषयोंमें फँस जाती हैं तथा मनको भी उन्हींकी ओर खींच ले जाती हैं। फिर तो जैसे जलाशयके तीरपर उगे हुए कुशादि अपनी जड़ोंसे उसका जल खींचते रहते हैं, उसी प्रकार वह इन्द्रियासक्त मन बुद्धिकी विचारशक्तिको क्रमशः हर लेता है ।।३०।। विचारशक्तिके नष्ट हो जानेपर पूर्वापरकी स्मृति जाती रहती है और स्मृतिका नाश हो जानेपर ज्ञान नहीं रहता। इस ज्ञानके नाशको ही पण्डितजन ‘अपने-आप अपना नाश करना’ कहते हैं ।।३१।। जिसके उद्देश्यसे अन्य सब पदार्थोंमें प्रियताका बोध होता है—उस आत्माका अपनेद्वारा ही नाश होनेसे जो स्वार्थहानि होती है, उससे बढ़कर लोकमें जीवकी और कोई हानि नहीं है ।।३२।।

अर्थेन्द्रियार्थाभिध्यानं सर्वार्थापह्नवॊ नृणाम् ।
भ्रंशितो ज्ञानविज्ञानाद्येनाविशति मुख्यताम् ।।३३
न कुर्यात्कर्हिचित्सङ्गं तमस्तीव्रं तितीरिषुः ।
धर्मार्थकाममोक्षाणां यदत्यन्तविघातकम् ।।३४
तत्रापि मोक्ष एवार्थ आत्यन्तिकतयेष्यते ।
त्रैवर्ग्योऽर्थो यतो नित्यं कृतान्तभयसंयुतः ।।३५
परोऽवरे च ये भावा गुणव्यतिकरादनु ।
न तेषां विद्यते क्षेममीशविध्वंसिताशिषाम् ।।३६

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तत् त्वं नरेन्द्र जगतामथ तस्थुषां च देहेन्द्रियासुधिषणात्मभिरावृतानाम् । यः क्षेत्रवित्तपतया हृदि विष्वगाविः प्रत्यक् चकास्ति भगवांस्तमवेहि सोऽस्मि ॥३७ यस्मिन्निदं सदसदात्मतया विभाति माया विवेकविधुति स्रजि वाहिबुद्धिः । तं नित्यमुक्तपरिशुद्धविबुद्धतत्त्वं प्रत्यूढकर्मकलिलप्रकृतिं प्रपद्ये ॥३८ यत्पादपङ्कजपलाशविलासभक्त्या कर्माशयं ग्रथितमुद्ग्रथयन्ति सन्तः । तद्वन्न रिक्तमतयो यतयोऽपि रुद्ध- स्रोतोगणास्तमरणं भज वासुदेवम् ॥३९ कृच्छ्रो महानिह भवार्णवमप्लवेशां षड्वर्गनक्रमसुखेन तितीर्षन्ति । तत् त्वं हरेर्भगवतो भजनीयमङ्घ्रिं कृत्वोडुपं व्यसनमुत्तर दुस्तरार्णम् ॥४०

धन और इन्द्रियोंके विषयोंका चिन्तन करना मनुष्यके सभी पुरुषार्थोंका नाश करनेवाला है; क्योंकि इनकी चिन्तासे वह ज्ञान और विज्ञानसे भ्रष्ट होकर वृक्षादि स्थावर योनियोंमें जन्म पाता है ॥३३॥ इसलिये जिसे अज्ञानान्धकारसे पार होनेकी इच्छा हो, उस पुरुषको विषयोंमें आसक्ति कभी नहीं करनी चाहिये; क्योंकि यह धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी प्राप्तिमें बड़ी बाधक है ॥३४॥ इन चार पुरुषार्थोंमें भी सबसे श्रेष्ठ मोक्ष ही माना जाता है; क्योंकि अन्य तीन पुरुषार्थोंमें सर्वदा कालका भय लगा रहता है ॥३५॥ प्रकृतिमें गुणक्षोभ होनेके बाद जितने भी उत्तम और अधम भाव—पदार्थ प्रकट हुए हैं, उनमें कुशलसे रह सके ऐसा कोई भी नहीं है। कालभगवान् उन सभीके कुशलोंको कुचलते रहते हैं ॥३६॥

अतः राजन्! जो भगवान् देह, इन्द्रिय, प्राण, बुद्धि और अहंकारसे आवृत सभी स्थावर-जंगम प्राणियोंके हृदयोंमें जीवके नियामक अन्तर्यामी आत्मारूपसे सर्वत्र साक्षात् प्रकाशित हो रहे हैं—उन्हें तुम ‘वह मैं ही हूँ’ ऐसा जानो ॥३७॥ जिस प्रकार मालाका ज्ञान हो जानेपर उसमें सर्पबुद्धि नहीं रहती, उसी प्रकार विवेक होनेपर जिसका कहीं पता नहीं लगता, ऐसा यह मायामय प्रपंच जिसमें कार्य-कारणरूपसे प्रतीत हो रहा है और जो स्वयं कर्मफल कलुषित प्रकृतिसे परे है, उस नित्यमुक्त, निर्मल और ज्ञानस्वरूप परमात्माको मैं प्राप्त हो रहा हूँ ॥३८॥ संत-महात्मा जिनके चरणकमलोंके अंगुलिदलकी छिटकती हुई छटाका स्मरण करके अहंकाररूप हृदयग्रन्थिको, जो कर्मोंसे गठित है, इस प्रकार छिन्न-भिन्न कर डालते हैं कि समस्त इन्द्रियोंका प्रत्याहार करके अपने अन्तःकरणको निर्विषय करनेवाले संन्यासी भी

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वैसा नहीं कर पाते। तुम उन सर्वाश्रय भगवान् वासुदेवका भजन करो ॥३९॥ जो लोग मन और इन्द्रियरूप मगरोंसे भरे हुए इस संसारसागरको योगादि दुष्कर साधनोंसे पार करना चाहते हैं, उनका उस पार पहुँचना कठिन ही है; क्योंकि उन्हें कर्णधाररूप श्रीहरिका आश्रय नहीं है। अतः तुम तो भगवान्‌के आराधनीय चरणकमलोंको नौका बनाकर अनायास ही इस दुस्तर समुद्रको पार कर लो ॥४०॥

मैत्रेय उवाच

स एवं ब्रह्मपुत्रेण कुमारेणात्ममेधसा । दर्शितात्मगतिः सम्यक्प्रशस्योवाच तं नृपः ॥४१

राजोवाच

कृतो मेऽनुग्रहः पूर्वं हरिणाऽऽर्तानुकम्पिना । तमापादयितुं ब्रह्मन् भगवन् यूयमागताः ॥४२

निष्पादितश्च कार्त्स्न्येन भगवद्भिर्घृणालुभिः । साधूच्छिष्टं हि मे सर्वमात्मना सह किं ददे ॥४३

प्राणा दाराः सुता ब्रह्मन् गृहाश्च सपरिच्छदाः । राज्यं बलं मही कोश इति सर्वं निवेदितम् ॥४४

सेनापत्यं च राज्यं च दण्डनेतृत्वमेव च । सर्वलोकाधिपत्यं च वेदशास्त्रविदर्हति ॥४५

स्वमेव ब्राह्मणो भुङ्क्ते स्वं वस्ते स्वं ददाति च । तस्यैवानुग्रहेणान्नं भुंजते क्षत्रियादयः ॥४६

यैरीदृशी भगवतो गतिरात्मवादे एकान्ततो निगमिभिः प्रतिपादिता नः । तुष्यन्त्वदभ्रकरुणाः स्वकृतेन नित्यं को नाम तत्प्रतिकरोति विनोदपात्रम् ॥४७

मैत्रेय उवाच

त आत्मयोगपतय आदिराजेन पूजिताः । शीलं तदीयं शंसन्तः खेऽभूवन्मिषतां नृणाम् ॥४८

वैन्यस्तु धुर्यो महतां संस्थित्याध्यात्मशिक्षया । आप्तकाममिवात्मानं मेन आत्मन्यवस्थितः ॥४९

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! ब्रह्माजीके पुत्र आत्मज्ञानी सनत्कुमारजीसे इस प्रकार आत्मतत्त्वका उपदेश पाकर महाराज पृथुने उनकी बहुत प्रशंसा करते हुए कहा ॥४१॥

राजा पृथुने कहा—भगवन्! दीनदयाल श्रीहरिने मुझपर पहले कृपा की थी, उसीको पूर्ण करनेके लिये आपलोग पधारे हैं ॥४२॥ आपलोग बड़े ही दयालु हैं। जिस कार्यके लिये आपलोग पधारे थे, उसे आपलोगोंने अच्छी तरह सम्पन्न कर दिया। अब, इसके बदलेमें मैं आपलोगोंको क्या दूँ? मेरे पास तो शरीर और इसके साथ जो कुछ है, वह सब महापुरुषोंका ही प्रसाद है ॥४३॥ ब्रह्मन्! प्राण, स्त्री, पुत्र सब प्रकारकी सामग्रियोंसे भरा हुआ भवन, राज्य, सेना, पृथ्वी और कोश—यह सब कुछ आप ही लोगोंका है, अतः आपके ही श्रीचरणोंमें अर्पित है ॥४४॥ वास्तवमें तो सेनापतित्व, राज्य, दण्डविधान और सम्पूर्ण लोकोंके शासनका अधिकार वेद-शास्त्रोंके ज्ञाता ब्राह्मणोंको ही है ॥४५॥ ब्राह्मण अपना ही खाता है, अपना ही पहनता है और अपनी ही वस्तु दान देता है। दूसरे—क्षत्रिय आदि तो उसीकी कृपासे अन्न खानेको पाते हैं ॥४६॥ आपलोग वेदके पारगामी हैं, आपने अध्यात्मतत्त्वका विचार करके हमें निश्चितरूपसे समझा दिया है कि भगवान्‌के प्रति इस प्रकारकी अभेद-भक्ति ही उनकी उपलब्धिका प्रधान साधन है। आपलोग परम कृपालु हैं। अतः अपने इस दीनोद्धाररूप कर्मसे ही सर्वदा सन्तुष्ट रहें। आपके इस उपकारका बदला कोई क्या दे सकता है? उसके लिये प्रयत्न करना भी अपनी हँसी कराना ही है ॥४७॥

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! फिर आदिराज पृथुने आत्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ सनकादिकी पूजा की और वे उनके शीलकी प्रशंसा करते हुए सब लोगोंके सामने ही आकाशमार्गसे चले गये ॥४८॥ महात्माओंमें अग्रगण्य महाराज पृथु उनसे आत्मोपदेश पाकर चित्तकी एकाग्रतासे आत्मामें ही स्थित रहनेके कारण अपनेको कृतकृत्य-सा अनुभव करने लगे ॥४९॥

कर्माणि च यथाकालं यथादेशं यथाबलम् । यथोचितं यथावित्तमकरोद्ब्रह्मसात्कृतम् ॥५०

फलं ब्रह्मणि विन्यस्य निर्विषङ्गः समाहितः । कर्माध्यक्षं च मन्वान आत्मानं प्रकृतेः परम् ॥५१

गृहेषु वर्तमानोऽपि स साम्राज्यश्रियान्वितः ।

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नासज्जतेन्द्रियार्थेषु निरहंमतिरर्कवत् ॥५२

एवमध्यात्मयोगेन कर्माण्यनुसमाचरन् । पुत्रानुत्पादयामास पंचार्चिष्यात्मसम्मतान् ॥५३

विजिताश्वं धूम्रकेशं हर्यक्षं द्रविणं वृकम् । सर्वेषां लोकपालानां दधारैकः पृथुर्गुणान् ॥५४

गोपीथाय जगत्सृष्टेः काले स्वे स्वेऽच्युतात्मकः । मनोवाग्वृत्तिभिः सौम्यैर्गुणैः संरंजयन् प्रजाः ॥५५

राजेत्यधान्नामधेयं सोमराज इवापरः । सूर्यवद्विसृजन् गृह्णन् प्रतपंश्च भुवो वसु ॥५६

दुर्धर्षस्तेजसेवाग्निर्महेन्द्र इव दुर्जयः । तितिक्षया धरित्रीव द्यौरिवाभीष्टदो नृणाम् ॥५७

वर्षति स्म यथाकामं पर्जन्य इव तर्पयन् । समुद्र इव दुर्बोधः सत्त्वेनाचलराडिव ॥५८

वे ब्रह्मार्पण—बुद्धिसे समय, स्थान, शक्ति, न्याय और धनके अनुसार सभी कर्म करते थे ॥५०॥ इस प्रकार एकाग्र चित्तसे समस्त कर्मोंका फल परमात्माको अर्पण करके आत्माको कर्मोंका साक्षी एवं प्रकृतिसे अतीत देखनेके कारण वे सर्वथा निर्लिप्त रहे ॥५१॥ जिस प्रकार सूर्यदेव सर्वत्र प्रकाश करनेपर भी वस्तुओंके गुण-दोषसे निर्लेप रहते हैं, उसी प्रकार सार्वभौम साम्राज्यलक्ष्मीसे सम्पन्न और गृहस्थाश्रममें रहते हुए भी अहंकारशून्य होनेके कारण वे इन्द्रियोंके विषयोंमें आसक्त नहीं हुए ॥५२॥

इस प्रकार आत्मनिष्ठामें स्थित होकर सभी कर्तव्यकर्मोंका यथोचित रीतिसे अनुष्ठान करते हुए उन्होंने अपनी भार्या अर्चिके गर्भसे अपने अनुरूप पाँच पुत्र उत्पन्न किये ॥५३॥ उनके नाम विजिताश्व, धूम्रकेश, हर्यक्ष, द्रविण और वृक थे। महाराज पृथु भगवान्‌के अंश थे। वे समय-समयपर, जब-जब आवश्यक होता था, जगत्‌के प्राणियोंकी रक्षाके लिये अकेले ही समस्त लोकपालोंके गुण धारण कर लिया करते थे। अपने उदार मन, प्रिय और हितकर वचन, मनोहर मूर्ति और सौम्य गुणोंके द्वारा प्रजाका रंजन करते रहनेसे दूसरे चन्द्रमाके समान उनका 'राजा' यह नाम सार्थक हुआ। सूर्य जिस प्रकार गरमीमें पृथ्वीका जल खींचकर वर्षाकालमें उसे पुनः पृथ्वीपर बरसा देता है तथा अपनी किरणोंसे सबको ताप पहुँचाता है, उसी प्रकार वे कररूपसे प्रजाका धन लेकर उसे दुष्कालादिके समय मुक्तहस्तसे प्रजाके

हितमें लगा देते थे तथा सबपर अपना प्रभाव जमाये रखते थे ।।५४-५६।। वे तेजमें अग्निके समान दुर्धर्ष, इन्द्रके समान अजेय, पृथ्वीके समान क्षमाशील और स्वर्गके समान मनुष्योंकी समस्त कामनाएँ पूर्ण करनेवाले थे ।।५७।। समय-समयपर प्रजाजनोंको तृप्त करनेके लिये वे मेघके समान उनके अभीष्ट अर्थोंको खुले हाथसे लुटाते रहते थे। वे समुद्रके समान गम्भीर और पर्वतराज सुमेरुके समान धैर्यवान् भी थे ।।५८।।

धर्मराडिव शिक्षायामाश्चर्ये हिमवानिव । कुबेर इव कोशाढ्यो गुप्तार्थो वरुणो यथा ।।५९ मातरिश्वैव सर्वात्मा बलेन सहसौजसा । अविषह्यतया देवो भगवान् भूतराडिव ।।६० कन्दर्प इव सौन्दर्ये मनस्वी मृगराडिव । वात्सल्ये मनुवन्नॄणां प्रभुत्वे भगवानजः ।।६१ बृहस्पतिर्ब्रह्मवादे आत्मवत्त्वे स्वयं हरिः । भक्त्या गोगुरुविप्रेषु विष्वक्सेनानुवर्तिषु । ह्रिया प्रश्रयशीलाभ्यामात्मतुल्यः परोद्यमे ।।६२ कीर्त्योर्ध्वगीतया पुम्भिस्त्रैलोक्ये तत्र तत्र ह । प्रविष्टः कर्णरन्ध्रेषु स्त्रीणां रामः सतामिव ।।६३

महाराज पृथु दुष्टोंके दमन करनेमें यमराजके समान, आश्चर्यपूर्ण वस्तुओंके संग्रहमें हिमालयके समान, कोशकी समृद्धि करनेमें कुबेरके समान और धनको छिपानेमें वरुणके समान थे ।।५९।। शारीरिक बल, इन्द्रियोंकी पटुता तथा पराक्रममें सर्वत्र गतिशील वायुके समान और तेजकी असह्यतामें भगवान् शंकरके समान थे ।।६०।। सौन्दर्यमें कामदेवके समान, उत्साहमें सिंहके समान, वात्सल्यमें मनुके समान और मनुष्योंके आधिपत्यमें सर्वसमर्थ ब्रह्माजीके समान थे ।।६१।। ब्रह्मविचारमें बृहस्पति, इन्द्रियजयमें साक्षात् श्रीहरि तथा गौ, ब्राह्मण, गुरुजन एवं भगवद्भक्तोंकी भक्ति, लज्जा, विनय, शील एवं परोपकार आदि गुणोंमें अपने ही समान (अनुपम) थे ।।६२।। लोग त्रिलोकीमें सर्वत्र उच्च स्वरसे उनकी कीर्तिका गान करते थे, इससे वे स्त्रियोंतकके कानोंमें वैसे ही प्रवेश पाये हुए थे जैसे सत्पुरुषोंके हृदयमें श्रीराम ।।६३।।

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे पृथुचरिते द्वाविंशोऽध्यायः ।।२२।।


१. प्रा० पा०—अधन्या। २. प्रा० पा०—श्वराश्वराः। ३. प्रा० पा०—द्रुमाश्रैते। ४. प्रा० पा०—वै। १. प्रा० पा०—मति।

१. प्रा० पा०—पाञ्चकोशं।

अथ त्रयोविंशोऽध्यायः राजा पृथुकी तपस्या और परलोकगमन

मैत्रेय उवाच

दृष्ट्वाऽऽत्मानं प्रवयसमेकदा वैन्य आत्मवान् ।
आत्मना वर्धिताशेषस्वानुसर्गः प्रजापतिः ।।१

जगतस्तस्थुषश्चापि वृत्तिदो धर्मभृत्सताम् ।
निष्पादितेश्वरादेशो यदर्थमिह जज्ञिवान् ।।२

आत्मजेष्वात्मजां न्यस्य विरहाद्रुदतीमिव ।
प्रजासु विमनस्स्वेकः सदारोऽगात्तपोवनम् ।।३

तत्राप्यदाभ्यनियमो वैखानससुसम्मते ।
आरब्ध उग्रतपसि यथा स्वविजये पुरा ।।४

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—इस प्रकार महामनस्वी प्रजापति पृथुके स्वयमेव अन्नादि तथा पुर-ग्रामादि सर्गकी व्यवस्था करके स्थावर-जंगम सभीकी आजीविकाका सुभीता कर दिया तथा साधुजनोचित धर्मोंका भी खूब पालन किया। 'मेरी अवस्था कुछ ढल गयी है और जिसके लिये मैंने इस लोकमें जन्म लिया था, उस प्रजारक्षणरूप ईश्वराज्ञाका पालन भी हो चुका है; अतः अब मुझे अन्तिम पुरुषार्थ—मोक्षके लिये प्रयत्न करना चाहिये' यह सोचकर उन्होंने अपने विरहमें रोती हुई अपनी पुत्रीरूपा पृथ्वीका भार पुत्रोंको सौंप दिया और सारी प्रजाको बिलखती छोड़कर वे अपनी पत्नीसहित अकेले ही तपोवनको चल दिये ।।१-३।। वहाँ भी वे वानप्रस्थ आश्रमके नियमानुसार उसी प्रकार कठोर तपस्यामें लग गये, जैसे पहले गृहस्थाश्रममें अखण्ड व्रतपूर्वक पृथ्वीको विजय करनेमें लगे थे! ।।४।।

कन्दमूलफलाहारः शुष्कपर्णाशनः क्वचित् ।
अब्भक्षः कतिचित्पक्षान् वायुभक्षस्ततः परम् ।।५

ग्रीष्मे पंचतपा वीरो वर्षास्वासारषाण्मुनिः ।
आकण्ठमग्नः शिशिरे उदके स्थण्डिलेशयः ।।६

तितिक्षुर्यतवाग्दान्त ऊर्ध्वरेता जितानिलः ।

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