भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,617 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 1617 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 85

दृष्ट्वा दूराद्गतः सोऽहं कौतुकेन तदन्तिकम् । मां दृष्ट्वा चोत्थिता बाला विह्वला चाब्रवीद्वचः ॥४१

इस तरह कलियुगके दोष देखता और पृथ्वीपर विचरता हुआ मैं यमुनाजीके तटपर पहुँचा जहाँ भगवान् श्रीकृष्णकी अनेकों लीलाएँ हो चुकी हैं ।।३७।। मुनिवरो! सुनिये, वहाँ मैंने एक बड़ा आश्चर्य देखा। वहाँ एक युवती स्त्री खिन्न मनसे बैठी थी ।।३८।। उसके पास दो वृद्ध पुरुष अचेत अवस्थामें पड़े जोर-जोरसे साँस ले रहे थे। वह तरुणी उनकी सेवा करती हुई कभी उन्हें चेत करानेका प्रयत्न करती और कभी उनके आगे रोने लगती थी ।।३९।। वह अपने शरीरके रक्षक परमात्माको दशों दिशाओंमें देख रही थी। उसके चारों ओर सैकड़ों स्त्रियाँ उसे पंखा झल रही थीं और बार-बार समझाती जाती थीं ।।४०।। दूरसे यह सब चरित देखकर मैं कुतूहलवश उसके पास चला गया। मुझे देखकर वह युवती खड़ी हो गयी और बड़ी व्याकुल होकर कहने लगी ।।४१।।

बालोवाच

भो भोः साधो क्षणं तिष्ठ मच्छिन्तामपि नाशय । दर्शनं तव लोकस्य सर्वथाघहरं परम् ।।४२

बहुधा तव वाक्येन दुःखशान्तिर्भविष्यति । यदा भाग्यं भवेद्भूरि भवतो दर्शनं तदा ।।४३

नारद उवाच

कासि त्वं काविमौ चेमा नार्यः काः पद्मलोचनाः । वद देवि सविस्तारं स्वस्य दुःखस्य कारणम् ।।४४

बालोवाच

अहं भक्तिरिति ख्याता इमौ मे तनयौ मतौ । ज्ञानवैराग्यनामानौ कालयोगेन जर्जरौ ।।४५ गङ्गाद्याः सरितश्चैमा मत्सेवार्थं समागताः । तथापि न च मे श्रेयः सेवितायाः सुरैरपि ।।४६ इदानीं शृणु मद्धार्तां सचित्तस्त्वं तपोधन । वार्ता मे वितताप्यस्ति तां श्रुत्वा सुखमावह ।।४७

ebook converter DEMO Watermarks*