भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 86

उत्पन्ना द्रविडे साहं वृद्धिं कर्णाटके गता ।

क्वचित्क्वचिन्महाराष्‍ट्रे गुर्जरे जीर्णतां गता ।।४८

तत्र घोरकलेर्‍योगात्पाखण्डैः खण्डिताङ्गका ।

दुर्बलाहं चिरं याता पुत्राभ्यां सह मन्दताम् ।।४९

वृन्दावनं पुनः प्राप्य नवीनेव सुरूपिणी ।

जाताहं युवती सम्यक्प्रेष्ठरूपा तु साम्प्रतम् ।।५०

इमौ तु शयितावत्र सुतौ मे क्लिश्यतः श्रमात् ।

इदं स्थानं परित्यज्य विदेशं गम्यते मया ।।५१

जरठत्वं समायातौ तेन दुःखेन दुःखिता ।

साहं तु तरुणी कस्मात्सुतौ वृद्धाविमौ कुतः ।।५२

त्रयाणां सहचारित्वाद्वैपरीत्यं कुतः स्थितम् ।

घटते जरठा माता तरुणौ तनयाविति ।।५३

युवतीने कहा—अजी महात्माजी! क्षणभर ठहर जाइये और मेरी चिन्ताको भी नष्ट कर

दीजिये। आपका दर्शन तो संसारके सभी पापोंको सर्वथा नष्ट कर देनेवाला है ।।४२।। आपके

वचनोंसे मेरे दुःखकी भी बहुत कुछ शान्ति हो जायगी। मनुष्यका जब बड़ा भाग्य होता है,

तभी आपके दर्शन हुआ करते हैं ।।४३।।

नारदजी कहते हैं—तब मैंने उस स्त्रीसे पूछा—देवि! तुम कौन हो? ये दोनों पुरुष तुम्हारे

क्या होते हैं? और तुम्हारे पास ये कमलनयनी देवियाँ कौन हैं? तुम हमें विस्तारसे अपने

दुःखका कारण बताओ ।।४४।।

युवतीने कहा—मेरा नाम भक्ति है, ये ज्ञान और वैराग्य नामक मेरे पुत्र हैं। समयके फेरसे

ही ये ऐसे जर्जर हो गये हैं ।।४५।। ये देवियाँ गंगाजी आदि नदियाँ हैं। ये सब मेरी सेवा

करनेके लिये ही आयी हैं। इस प्रकार साक्षात् देवियोंके द्वारा सेवित होनेपर भी मुझे सुख-

शान्ति नहीं है ।।४६।। तपोधन! अब ध्यान देकर मेरा वृत्तान्त सुनिये। मेरी कथा वैसे तो

प्रसिद्ध है, फिर भी उसे सुनकर आप मुझे शान्ति प्रदान करें ।।४७।।

मैं द्रविड़ देशमें उत्पन्न हुई, कर्नाटकमें बढ़ी, कहीं-कहीं महाराष्ट्रमें सम्मानित हुई; किन्तु

गुजरातमें मुझको बुढ़ापेने आ घेरा ।।४८।। वहाँ घोर कलियुगके प्रभावसे पाखण्डियोंने मुझे

अंग-भंग कर दिया। चिरकालतक यह अवस्था रहनेके कारण मैं अपने पुत्रोंके साथ दुर्बल

और निस्तेज हो गयी ।।४९।। अब जबसे मैं वृन्दावन आयी, तबसे पुनः परम सुन्दरी

सुरूपवती नवयुवती हो गयी हूँ ।।५०।। किन्तु सामने पड़े हुए ये दोनों मेरे पुत्र थके-माँदे

दुःखी हो रहे हैं। अब मैं यह स्थान छोड़कर अन्यत्र जाना चाहती हूँ ।।५१।। ये दोनों बूढ़े हो

गये हैं—इसी दुःखसे मैं दुःखी हूँ। मैं तरुणी क्यों और ये दोनों मेरे पुत्र बूढ़े क्यों? ।।५२।। हम

तीनों साथ-साथ रहनेवाले हैं। फिर यह विपरीतता क्यों? होना तो यह चाहिये कि माता बूढ़ी

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