भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 873

अथ पञ्चविंशोऽध्यायः पुरंजनोपाख्यानका प्रारम्भ

मैत्रेय उवाच

इति सन्दि‍श्य भगवान् बार्हिषदैरभिपूजितः । पश्यतां राजपुत्राणां तत्रैवान्तर्दधे हरः ॥१

रुद्रगीतं भगवतः स्तोत्रं सर्वे प्रचेतसः । जपन्तस्ते तपस्तेपुर्वर्षाणामयुतं जले ॥२

प्राचीनबर्हिषं क्षत्तः कर्मस्वासक्तमानसम् । नारदोऽध्यात्मतत्त्वज्ञः कृपालुः प्रत्यबोधयत् ॥३

श्रेयस्त्वं कतमद्राजन् कर्मणाऽऽत्मन ईहसे । दुःखहानिः सुखावाप्तिः श्रेयस्तन्नेह चेष्यते ॥४

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! इस प्रकार भगवान् शंकरने प्रचेताओंको उपदेश दिया। फिर प्रचेताओँने शंकरजीकी बड़े भक्तिभावसे पूजा की। इसके पश्चात् वे उन राजकुमारोंके सामने ही अन्तर्धान हो गये ॥१॥ सब-के-सब प्रचेता जलमें खड़े रहकर भगवान् रुद्रके बताये स्तोत्रका जप करते हुए दस हजार वर्षतक तपस्या करते रहे ॥२॥ इन दिनों राजा प्राचीनबर्हिका चित्त कर्मकाण्डमें बहुत रम गया था। उन्हें अध्यात्मविद्या-विशारद परम कृपालु नारदजीने उपदेश दिया ॥३॥ उन्होंने कहा कि 'राजन्! इन कर्मोंके द्वारा तुम अपना कौन-सा कल्याण करना चाहते हो? दुःखके आत्यन्तिक नाश और परमानन्दकी प्राप्तिका नाम कल्याण है; वह तो कर्मोंसे नहीं मिलता' ॥४॥

राजोवाच

न जानामि महाभाग परं कर्मापविद्धधीः । ब्रूहि मे विमलं ज्ञानं येन मुच्येय कर्मभिः ॥५

गृहेषु कूटधर्मेषु पुत्रदारधनार्थधीः । न परं विन्दते मूढो भ्राम्यन् संसारवर्त्मसु ॥६

नारद उवाच

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