भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 874

भो भोः प्रजापते राजन् पशून् पश्य त्वयाध्वरे । संज्ञापिताञ्जीवसङ्घान्निघृणेन सहस्रशः ॥७ एते त्वां सम्प्रतीक्षन्ते स्मरन्तो वैशसं तव । सम्परेतमयःकूटैश्छिन्दन्त्युत्थितमन्यवः ॥८ अत्र ते कथयिष्येऽमुमितिहासं पुरातनम् । पुरंजनस्य चरितं निबोध गदतो मम ॥९ आसीत्पुरंजनो नाम राजा राजन् बृहच्छ्रवाः । तस्याविज्ञातनामाऽऽसीत्सखाविज्ञातचेष्टितः ॥१० सोऽन्वेषमाणः शरणं बभ्राम पृथिवीं प्रभुः । नानुरूपं यदाविन्ददभूत्स विमना इव ॥११ न साधु मेने ताः सर्वा भूतले यावतीः पुरः । कामान् कामयमानोऽसौ तस्य तस्योपपत्तये ॥१२ स एकदा हिमवतो दक्षिणेष्वथ सानुषु । ददर्श नवभिर्द्वारैः १ पुरं लक्षितलक्षणाम् ॥१३ प्राकारोपवनाट्टालपरिखैरक्षतोरणैः । स्वर्णरौप्यायसैः शृङ्गैः संकुलां सर्वतो गृहैः ॥१४

राजाने कहा—महाभाग नारदजी! मेरी बुद्धि कर्ममें फँसी हुई है, इसलिये मुझे परम कल्याणका कोई पता नहीं है। आप मुझे विशुद्ध ज्ञानका उपदेश दीजिये, जिससे मैं इस कर्मबन्धनसे छूट जाऊँ ॥५॥ जो पुरुष कपटधर्ममय गृहस्थाश्रममें ही रहता हुआ पुत्र, स्त्री और धनको ही परम पुरुषार्थ मानता है, वह अज्ञानवश संसारारण्यमें ही भटकता रहनेके कारण उस परम कल्याणको प्राप्त नहीं कर सकता ॥६॥

श्रीनारदजीने कहा—देखो, देखो, राजन्! तुमने यज्ञमें निर्दयतापूर्वक जिन हजारों पशुओंकी बलि दी है—उन्हें आकाशमें देखो ॥७॥ ये सब तुम्हारे द्वारा प्राप्त हुई पीड़ाओंको याद करते हुए बदला लेनेके लिये तुम्हारी बाट देख रहे हैं। जब तुम मरकर परलोकमें जाओगे, तब ये अत्यन्त क्रोधमें भरकर तुम्हें अपने लोहेके-से सींगोंसे छेदेंगे ॥८॥ अच्छा, इस विषयमें मैं तुम्हें एक प्राचीन उपाख्यान सुनाता हूँ। वह राजा पुरंजनका चरित्र है, उसे तुम मुझसे सावधान होकर सुनो ॥९॥

राजन्! पूर्वकालमें पुरंजन नामका एक बड़ा यशस्वी राजा था। उसका अविज्ञात नामक एक मित्र था। कोई भी उसकी चेष्टाओंको समझ नहीं सकता था ॥१०॥ राजा पुरंजन अपने रहनेयोग्य स्थानकी खोजमें सारी पृथ्वीमें घूमा; फिर भी जब उसे कोई अनुरूप स्थान न मिला, तब वह कुछ उदास-सा हो गया ॥११॥ उसे तरह-तरहके भोगोंकी लालसा थी; उन्हें भोगनेके लिये उसने संसारमें जितने नगर देखे, उनमेंसे कोई भी उसे ठीक न जँचा ॥१२॥

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