भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 875

एक दिन उसने हिमालयके दक्षिण तटवर्ती शिखरोंपर कर्मभूमि भारतखण्डमें एक नौ द्वारोंका नगर देखा। वह सब प्रकारके सुलक्षणोंसे सम्पन्न था ।।१३।। सब ओरसे परकोटों, बगीचों, अटरियों, खाइयों, झरोखों और राजद्वारोंसे सुशोभित था और सोने, चाँदी तथा लोहेके शिखरोंवाले विशाल भवनोंसे खचाखच भरा था ।।१४।।

नीलस्फटिकवैदूर्यमुक्तामरकतारुणैः । क्लृप्तहर्म्यस्थलीं दीप्तां श्रिया भोगवतीमिव ।।१५

सभाचत्वररथ्याभिराक्रीडायत्तनापणैः । चैत्यध्वजपताकाभिर्युक्तां विद्रुमवेदिभिः ।।१६

पुर्यास्तु बाह्योपवने दिव्यद्रुमलताकुले । नदद्विहंगालिकुलकोलाहलजलाशये ।।१७

हिमनिर्झरविप्रुष्मत्कुसुमाकरवायुना । चलत्प्रवालविटपनलिनीतटसम्पदि ।।१८

नानारण्यमृगव्रातैरनाबाधे मुनिव्रतैः । आहूतं मन्यते पान्थो यत्र कोकिलकूजितैः ।।१९

यद‍ृच्छयाऽऽगतां तत्र ददर्श प्रमदोत्तमाम् । भृत्यैर्दशभिरायान्तीमेकैकशतनायकैः ।।२०

पंचशीर्षाहिना गुप्तां प्रतीहारेण सर्वतः । अन्वेषमाणामृषभम्प्रौढां कामरूपिणीम् ।।२१

सुनासां सुदतीं बालां सुकपोलां वराननाम् । समविन्यस्तकर्णाभ्यां बिभ्रतीं कुण्डलश्रियम् ।।२२

पिशंगनीवीं सुश्रोणीं श्यामां कनकमेखलाम् । पद्भ्यां क्वणद्भ्यां चलतीं नूपुरैर्देवतामिव ।।२३

स्तनौ व्यञ्जितकैशोरौ समवृत्तौ निरन्तरौ । वस्त्रान्तेन निगूहन्तीं व्रीडया गजगामिनीम् ।।२४

उसके महलोंकी फर्शें नीलम, स्फटिक, वैदूर्य, मोती, पन्ने और लालोंकी बनी हुई थीं।