भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 880

पितृहूर्नृप पुर्या द्वार्दक्षिणेन पुरंजनः । राष्ट्रं दक्षिणपंचालं याति श्रुतधरान्वितः ।।५० देवहूर्नाम पुर्या द्वा उत्तरेण पुरंजनः । राष्ट्रमुत्तरपंचालं याति श्रुतधरान्वितः ।।५१ आसुरी नाम पश्चाद् द्वास्तया याति पुरंजनः । ग्रामकं नाम विषयं दुर्मदेन समन्वितः ।।५२ निर्ऋर्तिर्नाम पश्चाद् द्वास्तया याति पुरंजनः । वैशसं नाम विषयं लुब्धकेन समन्वितः ।।५३

श्रीनारदजी कहते हैं—राजन्! उन स्त्री-पुरुषोंने इस प्रकार एक-दूसरेकी बातका समर्थन कर फिर सौ वर्षोंतक उस पुरीमें रहकर आनन्द भोगा ।।४३।। गायक लोग सुमधुर स्वरमें जहाँ-तहाँ राजा पुरंजनकी कीर्ति गाया करते थे। जब ग्रीष्म-ऋतु आती, तब वह अनेकों स्त्रियोंके साथ सरोवरमें घुसकर जलक्रीड़ा करता ।।४४।। उस नगरमें जो नौ द्वार थे, उनमेंसे सात नगरीके ऊपर और दो नीचे थे। उस नगरका जो कोई राजा होता, उसके पृथक्-पृथक् देशोंमें जानेके लिये ये द्वार बनाये गये थे ।।४५।। राजन्! इनमेंसे पाँच पूर्व, एक दक्षिण, एक उत्तर और दो पश्चिमकी ओर थे। उनके नामोंका वर्णन करता हूँ ।।४६।। पूर्वकी ओर खद्योता और आविर्मुखी नामके दो द्वार एक ही जगह बनाये गये थे। उनमें होकर राजा पुरंजन अपने मित्र द्युमान्‌के साथ विभ्राजित नामक देशको जाया करता था ।।४७।। इसी प्रकार उस ओर नलिनी और नालिनी नामके दो द्वार और भी एक ही जगह बनाये गये थे। उनसे होकर वह अवधूतके साथ सौरभ नामक देशको जाता था ।।४८।। पूर्वदिशाकी ओर मुख्या नामका जो पाँचवाँ द्वार था, उसमें होकर वह रसज्ञ और विपणके साथ क्रमशः बहूदन और आपण नामके देशोंको जाता था ।।४९।। पुरीके दक्षिणकी ओर जो पितृहू नामका द्वार था, उसमें होकर राजा पुरंजन श्रुतधरके साथ दक्षिणपांचाल देशको जाता था ।।५०।। उत्तरकी ओर जो देवहू नामका द्वार था, उससे श्रुतधरके ही साथ वह उत्तरपांचाल देशको जाता था ।।५१।। पश्चिम दिशामें आसुरी नामका दरवाजा था, उसमें होकर वह दुर्मदके साथ ग्रामक देशको जाता था ।।५२।। तथा निर्ऋति नामका जो दूसरा पश्चिम द्वार था, उससे लुब्धकके साथ वह वैशस नामके देशको जाता था ।।५३।।

अन्धावमीषां पौराणां निर्वाक्पेशस्कृतावुभौ । अक्षण्वतामधिपतिस्ताभ्यां याति करोति च ।।५४

स यर्ह्यन्तःपुरगतो विषूचीनसमन्वितः । मोहं प्रसादं हर्षं वा याति जायात्मजोद्भवम् ।।५५

एवं कर्मसु संसक्तः कामात्मा वञ्चितोऽबुधः ।

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