भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 881

महिषी यद्यदीहेत तत्तदेवान्ववर्तत ।।५६

क्वचित्पिबन्त्यां पिबति मदिरां मदविह्वलः । अश्नन्त्यां क्वचिदश्नाति जक्षत्यां सह जक्षति ।।५७

क्वचिद्गायति गायन्त्यां रुदत्यां रुदति क्वचित् । क्वचिद्धसन्त्यां हसति जल्पन्त्यामनु जल्पति ।।५८

क्वचिद्धावति धावन्त्यां तिष्ठन्त्यामनु तिष्ठति । अनु शेते शयानायामान्वास्ते क्वचिदासतीम् ।।५९

क्वचिच्छृणोति शृण्वन्त्यां पश्यन्त्यामनु पश्यति । क्वचिज्जिघ्रति जिघ्रन्त्यां स्पृशन्त्यां स्पृशति क्वचित् ।।६०

क्वचिच्च शोचतीं जायामनुशोचति दीनवत् । अनु हृष्यति हृष्यन्त्यां मुदितामनु मोदते ।।६१

विप्रलब्धो महिष्यैवं सर्वप्रकृतिवंचितः । नेच्छन्ननुकरोत्यज्ञः क्लैब्यात्क्रीडामृगो यथा ।।६२

इस नगरके निवासियोंमें निर्वाक् और पेशस्कृत्—ये दो नागरिक अन्धे थे। राजा पुरंजन आँखवाले नागरिकोंका अधिपति होनेपर भी इन्हींकी सहायतासे जहाँ-तहाँ जाता और सब प्रकारके कार्य करता था ।।५४।। जब कभी अपने प्रधान सेवक विषूचीनके साथ अन्तःपुरमें जाता, तब उसे स्त्री और पुत्रोंके कारण होनेवाले मोह, प्रसन्नता एवं हर्ष आदि विकारोंका अनुभव होता ।।५५।। उसका चित्त तरह-तरहके कर्मोंमें फँसा हुआ था और काम-परवश होनेके कारण वह मूढ़ रमणीके द्वारा ठगा गया था। उसकी रानी जो-जो काम करती थी, वही वह भी करने लगता था ।।५६।। वह जब मद्यपान करती, तब वह भी मदिरा पीता और मदसे उन्मत्त हो जाता था; जब वह भोजन करती, तब आप भी भोजन करने लगता और जब कुछ चबाती, तब आप भी वही वस्तु चबाने लगता था ।।५७।। इसी प्रकार कभी उसके गानेपर गाने लगता, रोनेपर रोने लगता, हँसनेपर हँसने लगता और बोलनेपर बोलने लगता ।।५८।। वह दौड़ती तो आप भी दौड़ने लगता, खड़ी होती तो आप भी खड़ा हो जाता, सोती तो आप भी उसीके साथ सो जाता और बैठती तो आप भी बैठ जाता ।।५९।। कभी वह सुनने लगती तो आप भी सुनने लगता, देखती तो देखने लगता, सूँघती तो सूँघने लगता और किसी चीजको छूती तो आप भी छूने लगता ।।६०।। कभी उसकी प्रिया शोकाकुल होती तो आप भी अत्यन्त दीनके समान

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