भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,617 पृष्ठ

पृष्ठ 882, कुल 1617 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 882

व्याकुल हो जाता; जब वह प्रसन्न होती, आप भी प्रसन्न हो जाता और उसके आनन्दित होनेपर आप भी आनन्दित हो जाता ॥६१॥ (इस प्रकार) राजा पुरंजन अपनी सुन्दरी रानीके द्वारा ठगा गया। सारा प्रकृतिवर्ग—परिकर ही उसको धोखा देने लगा। वह मूर्ख विवश होकर इच्छा न होनेपर भी खेलके लिये घरपर पाले हुए बंदरके समान अनुकरण करता रहता ॥६२॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे पुरंजनोपाख्याने पञ्चविंशोऽध्यायः ॥२५॥


१. प्रा० पा०—द्वारिः।
१. प्रा० पा०—एते ते पुरोगा ये। २. प्रा० पा०—एताश्च। ३. प्रा० पा०—श्रीर्भवान्य०। ४. प्रा० पा०—वा उमापतिं। ५. प्रा० पा०—ते मानुगृहाण। ६. प्रा० पा०—सुनास०। ७. प्रा० पा०—संकुलम्।
१. प्रा० पा०—क्षेमं। २. प्रा० पा०—पतिं। ३. प्रा० पा०—स्वयम्।