श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतरह अपने वशमें कर उसे आनन्दित करती हुई विहार करने लगी ।।१।। उसने अच्छी तरह स्नान कर अनेक प्रकारके मांगलिक श्रृंगार किये तथा भोजनादिसे तृप्त होकर वह राजाके पास आयी। राजाने उस मनोहर मुखवाली राजमहिषीका सादर अभिनन्दन किया ।।२।। पुरंजनीने राजाका आलिंगन किया और राजाने उसे गले लगाया। फिर एकान्तमें मनके अनुकूल रहस्यकी बातें करते हुए वह ऐसा मोहित हो गया कि उस कामिनीमें ही चित्त लगा रहनेके कारण उसे दिन-रातके भेदसे निरन्तर बीतते हुए कालकी दुस्तर गतिका भी कुछ पता न चला ।।३।। मदसे छका हुआ मनस्वी पुरंजन अपनी प्रियाकी भुजापर सिर रखे महामूल्य शय्यापर पड़ा रहता। उसे तो वह रमणी ही जीवनका परम फल जान पड़ती थी। अज्ञानसे आवृत्त हो जानेके कारण उसे आत्मा अथवा परमात्माका कोई ज्ञान न रहा ।।४।।
राजन्! इस प्रकार कामातुर चित्तसे उसके साथ विहार करते-करते राजा पुरंजनकी जवानी आधे क्षणके समान बीत गयी ।।५।। प्रजापते! उस पुरंजनीसे राजा पुरंजनके ग्यारह सौ पुत्र और एक सौ दस कन्याएँ हुईं, जो सभी माता-पिताका सुयश बढ़ानेवाली और सुशीलता, उदारता आदि गुणोंसे सम्पन्न थीं। ये पौरंजनी नामसे विख्यात हुईं। इतनेमें ही उस सम्राट्की लंबी आयुका आधा भाग निकल गया ।।६-७।। फिर पांचालराज पुरंजनने पितृवंशकी वृद्धि करनेवाले पुत्रोंका वधुओंके साथ और कन्याओंका उनके योग्य वरोंके साथ विवाह कर दिया ।।८।। पुत्रोंमेंसे प्रत्येकके सौ-सौ पुत्र हुए। उनसे वृद्धिको प्राप्त होकर पुरंजनका वंश सारे पांचाल देशमें फैल गया ।।९।। इन पुत्र, पौत्र, गृह, कोश, सेवक और मन्त्री आदिमें दृढ़ ममता हो जानेसे वह इन विषयोंमें ही बँध गया ।।१०।।
ईजे च क्रतुभिर्घोरैर्दीक्षितः पशुमारकैः ।
देवान् पितॄन् भूतपतीन्नानाकामो यथा भवान् ।।११
युक्तेष्वेवं प्रमत्तस्य कुटुम्बासक्तचेतसः ।
आससाद१ स वै कालो योऽप्रियः प्रिययोषिताम् ।।१२
चण्डवेग इति ख्यातो गन्धर्वाधिपतिर्नृप ।
गन्धर्वास्तस्य बलिनः षष्ट्युत्तरशतत्रयम् ।।१३
गन्धर्व्यस्तादृशीरस्य मैथुन्यश्च सितासिताः ।
परिवृत्त्या विलुम्पन्ति सर्वकामविनिर्मिताम् ।।१४
ते चण्डवेगानुचराः पुरंजनपुरं२ यदा ।
हर्तुमारेभिरे तत्र प्रत्यषेधत्प्रजागरः ।।१५
स सप्तभिः शतैरेको विंशत्या च शतं समाः ।
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