भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,617 पृष्ठ

पृष्ठ 900, कुल 1617 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 900

रहस्यको न जाननेके कारण वह उनके पास जाकर उनकी पूर्ववत् सेवा करने लगी ।।४५।। चरणसेवा करते समय जब उसे अपने पतिके चरणोंमें गरमी बिलकुल नहीं मालूम हुई, तब तो वह झुंडसे बिछुड़ी हुई मृगीके समान चित्तमें अत्यन्त व्याकुल हो गयी ।।४६।। उस बीहड़ वनमें अपनेको अकेली और दीन अवस्थामें देखकर वह बड़ी शोकाकुल हुई और आँसुओंकी धारासे स्तनोंको भिगोती हुई बड़े जोर-जोरसे रोने लगी ।।४७।। वह बोली, 'राजर्षे! उठिये, उठिये; समुद्रसे घिरी हुई यह वसुन्धरा लुटेरों और अधार्मिक राजाओंसे भयभीत हो रही है, आप इसकी रक्षा कीजिये' ।।४८।।

एवं विलपती बाला विपिनेऽनुगता पतिम् । पतिता पादयोर्भर्तू रुदत्यश्रूण्यवर्तयत् ।।४९ चितिं१ दारुमयीं चित्वा तस्यां पत्युः कलेवरम् । आदीप्य चानुमरणे विलपन्ती मनो दधे ।।५० तत्र पूर्वतरः कश्चित्सखा ब्राह्मण आत्मवान् । सान्त्वयन् वल्गुना साम्ना तामाह रुदतीं प्रभो ।।५१

ब्राह्मण उवाच

का त्वं कस्यासि को वायं शयानो यस्य शोचसि । जानासि२ किं सखायं मां येनाग्रे विचचर्थ३ ह ।।५२ अपि स्मरसि चात्मानमविज्ञातसखं सखे । हित्वा मां पदमन्विच्छन् भौमभोगरतो गतः ।।५३ हंसावहं च त्वं चार्य सखायौ मानसायनौ । अभूतामन्तरा वौकः सहस्रपरिवत्सरान् ।।५४ स त्वं विहाय मां बन्धो गतो ग्राम्यमतिर्महीम् । विचरन् पदमद्राक्षीः कयाचिन्निर्मितं स्त्रिया ।।५५ पंचारामं नवद्वारमेकपालं त्रिकोष्ठकम् । षट्कुलं पंचविपणं पंचप्रकृति स्त्रीधवम् ।।५६ पंचेन्द्रियार्था आरामा द्वारः प्राणा नव प्रभो । तेजोऽबन्नानि कोष्ठानि कुलमिन्द्रियसंग्रहः ।।५७ विपणस्तु क्रियाशक्तिर्भूतप्रकृतिरव्यया । शक्त्यधीशः पुमांस्त्वत्र प्रविष्टो नावबुध्यते ।।५८

पतिके साथ वनमें गयी हुई वह अबला इस प्रकार विलाप करती पतिके चरणोंमें गिर

ebook converter DEMO Watermarks*