भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 901

गयी और रो-रोकर आँसू बहाने लगी ॥४९॥ लकड़ियोंकी चिता बनाकर उसने उसपर पतिकी शव रखा और अग्नि लगाकर विलाप करते-करते स्वयं सती होनेका निश्चय किया ॥५०॥ राजन्! इसी समय उसका कोई पुराना मित्र एक आत्मज्ञानी ब्राह्मण वहाँ आया। उसने उस रोती हुई अबलाको मधुर वाणीसे समझाते हुए कहा ॥५१॥

ब्राह्मणने कहा—तू कौन है? किसकी पुत्री है? और जिसके लिये तू शोक कर रही है, वह यह सोया हुआ पुरुष कौन है? क्या तुम मुझे नहीं जानती? मैं वही तेरा मित्र हूँ, जिसके साथ तू पहले विचरा करती थी ॥५२॥ सखे! क्या तुम्हें अपनी याद आती है, किसी समय मैं तुम्हारा अविज्ञात नामका सखा था? तुम पृथ्वीके भोग भोगनेके लिये निवास-स्थानकी खोजमें मुझे छोड़कर चले गये थे ॥५३॥ आर्य! पहले मैं और तुम एक-दूसरेके मित्र एवं मानसनिवासी हंस थे। हम दोनों सहस्रों वर्षोंतक बिना किसी निवास-स्थानके ही रहे थे ॥५४॥ किन्तु मित्र! तुम विषयभोगोंकी इच्छासे मुझे छोड़कर यहाँ पृथ्वीपर चले आये! यहाँ घूमते-घूमते तुमने एक स्त्रीका रचा हुआ स्थान देखा ॥५५॥ उसमें पाँच बगीचे, नौ दरवाजे, एक द्वारपाल, तीन परकोटे, छः वैश्यकुल और पाँच बाजार थे। वह पाँच उपादान-कारणोंसे बना हुआ था और उसकी स्वामिनी एक स्त्री थी ॥५६॥ महाराज! इन्द्रियोंके पाँच विषय उसके बगीचे थे, नौ इन्द्रिय-छिद्र द्वार थे; तेज, जल और अन्न—तीन परकोटे थे; मन और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ—छः वैश्यकुल थे; क्रियाशक्तिरूप कर्मेन्द्रियाँ ही बाजार थीं; पाँच भूत ही उसके कभी क्षीण न होनेवाले उपादान कारण थे और बुद्धिशक्ति ही उसकी स्वामिनी थी। यह ऐसा नगर था, जिसमें प्रवेश करनेपर पुरुष ज्ञानशून्य हो जाता है—अपने स्वरूपको भूल जाता है ॥५७-५८॥

तस्मिंस्त्वं रमया स्पृष्टो रममाणोऽश्रुतस्मृतिः । तत्संगादीदृशीं प्राप्तो दशां पापीयसीं प्रभो ॥५९

न त्वं विदर्भदुहिता नायं वीरः सुहृत्तव । न पतिस्त्वं पुरंजन्या रुद्धो नवमुखे यया ॥६०

माया ह्येषा मया सृष्टा यत्पुमांसं स्त्रियं सतीम्१ । मन्यसे नोभयं यद्धै हंसौ पश्यावयोर्र्गतिम् ॥६१

अहं भवान्न चान्यस्त्वं त्वमेवाहं विचक्ष्व भोः । न नौ पश्यन्ति कवयश्छिद्रं जातु मनागपि ॥६२

यथा पुरुष आत्मानमेकमादर्शचक्षुषोः । द्विधाभूतमवेक्षेत तथैवान्तरमावयोः ॥६३

एवं स मानसो हंसो हंसेन प्रतिबोधितः ।