श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 902, कुल 1617 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्वस्थस्तदव्यभिचारेण नष्टामाप पुनः स्मृतिम् ॥६४
बर्हिष्मन्नेतदध्यात्मं पारोक्ष्येण प्रदर्शितम्। यत्परोक्षप्रियो देवो भगवान् विश्वभावनः ॥६५
भाई! उस नगरमें उसकी स्वामिनीके फंदेमें पड़कर उसके साथ विहार करते-करते तुम भी अपने स्वरूपको भूल गये और उसीके संगसे तुम्हारी यह दुर्दशा हुई है ॥५९॥
देखो, तुम न तो विदर्भराजकी पुत्री ही हो और न यह वीर मलयध्वज तुम्हारा पति ही। जिसने तुम्हें नौ द्वारोंके नगरमें बंद किया था, उस पुरंजनके पति भी तुम नहीं हो ॥६०॥
तुम पहले जन्ममें अपनेको पुरुष समझते थे और अब सती स्त्री मानते हो—यह सब मेरी ही फैलायी हुई माया है। वास्तवमें तुम न पुरुष हो न स्त्री। हम दोनों तो हंस हैं; हमारा जो वास्तविक स्वरूप है, उसका अनुभव करो ॥६१॥
मित्र! जो मैं (ईश्वर) हूँ, वही तुम (जीव) हो। तुम मुझसे भिन्न नहीं हो और तुम विचारपूर्वक देखो, मैं भी वही हूँ जो तुम हो। ज्ञानी पुरुष हम दोनोंमें कभी थोड़ा-सा भी अन्तर नहीं देखते ॥६२॥
जैसे एक पुरुष अपने शरीरकी परछाईंको शीशेमें और किसी व्यक्तिके नेत्रमें भिन्न-भिन्न रूपसे देखता है वैसे ही—एक ही आत्मा विद्या और अविद्याकी उपाधिके भेदसे अपनेको ईश्वर और जीवके रूपमें दो प्रकारसे देख रहा है ॥६३॥
इस प्रकार जब हंस (ईश्वर)-ने उसे सावधान किया, तब वह मानसरोवरका हंस (जीव) अपने स्वरूपमें स्थित हो गया और उसे अपने मित्रके विछोहसे भूला हुआ आत्मज्ञान फिर प्राप्त हो गया ॥६४॥
प्राचीनबर्हि! मैंने तुम्हें परोक्षरूपसे यह आत्मज्ञानका दिग्दर्शन कराया है; क्योंकि जगत्कर्ता जगदीश्वरको परोक्ष वर्णन ही अधिक प्रिय है ॥६५॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे पुरंजनोपाख्यानेऽष्टाविंशोऽध्यायः ॥२८॥
१. प्रा० पा०—आवापो०।
१. प्रा० पा०—राजन् तां पुरीमभिनिकामतः। २. प्रा० पा०—जामातृमित्रपार्षदान्। ३. प्रा० पा०—त्वेका।
१. प्रा० पा०—तु संत्र०। २. प्रा० पा०—रभिनेष्यति। ३. प्रा० पा०—मृते।
१. प्रा० पा०—चिता। २. प्रा० पा०—किं जानासि। ३. प्रा० पा०—विचरेम हि।
१. प्रा० पा०—ततः।
ebook converter DEMO Watermarks*