श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे प्रियव्रतविजये प्रथमोऽध्यायः ॥१॥
१. प्रा० पा०—निवासोऽयम्।
१. प्रा० पा०—परमात्मतत्त्वो। २. प्रा० पा०—प्रवरगुणैकान्त। ३. प्रा० पा०—न वाभ्यनन्दद्यदपि तदप्रत्याम्नातं। ४. प्रा० पा०—सर्गस्य बृंहणा। ५. प्रा० पा०—रखिलनिजगणपरिवेष्टितः। ६. प्रा० पा०—तत्र गगनतले। ७. प्रा० पा०—ममरपरिवृन्दैरभिषू०।
१. प्रा० पा०—प्रमोदमोद प्रसरण०। २. प्रा० पा०—यौष्ण्यव्रीडाप्रमोदित०। ३. प्रा० पा०—विवेको नावबुध्यमा०। ४. प्रा० पा०—यदेवाभासयति। ५. प्रा० पा०—सप्त सप्त सिन्ध०। ६. प्रा० पा०—द्विगुणेन बहिः समन्ततः।
१. प्रा० पा०—द्वीपशिखाभ्यन्तरे द्वीप०। २. प्रा० पा०—एकैकस्येव। ३. प्रा० पा०—पृथक् परिवृय उपकल्पिता०। ४. प्रा० पा०—तेषु बर्हिष्मतीपति०। ५. प्रा० पा०—वाह०। ६. प्रा० पा०—यथासंख्यकमैकैकस्मिन्नेकमेवाधि०। ७. प्रा० पा०—सुकृदाददीत। ८. प्रा० पा०—सहजातितत्त्वम् ।
* इनका क्रम इस प्रकार समझना चाहिये—पहले जम्बूद्वीप है, उसके चारों ओर क्षार समुद्र है। वह प्लक्षद्वीपसे घिरा हुआ है, उसके चारों ओर ईखके रसका समुद्र है। उसे शाल्मलिद्वीप घेरे हुए है, उसके चारों ओर मदिराका समुद्र है। फिर कुशद्वीप है, वह घीके समुद्रसे घिरा हुआ है। उसके बाहर क्रौंचद्वीप है, उसके चारों ओर दूधका समुद्र है। फिर शाकद्वीप है, उसे मट्ठेका समुद्र घेरे हुए है। उसके चारों ओर पुष्करद्वीप है, वह मीठे जलके समुद्रसे घिरा हुआ है।