श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ द्वितीयोऽध्यायः
आग्नीध्र-चरित्र
श्रीशुक उवाच
एवं पितरि सम्प्रवृत्ते तदनुशासने वर्तमान आग्नीध्रो जम्बूद्वीपौकसः प्रजा औरस-वद्धर्मवेक्षमाणः पर्यगोपायत् ॥१॥
स च कदाचित्पितृलोककामः सुरवरवनिताक्रीडाचलद्रोण्यां भगवन्तं विश्वसृजां पतिमाभृतपरिचर्योपकरण आत्मैकाग्रयेण तपस्याराधयाम्बभूव ॥२॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—पिता प्रियव्रतके इस प्रकार तपस्यामें संलग्न हो जानेपर राजा आग्नीध्र उनकी आज्ञाका अनुसरण करते हुए जम्बूद्वीपकी प्रजाका धर्मानुसार पुत्रवत् पालन करने लगे ॥१॥ एक बार वे पितृलोककी कामनासे सत्पुत्रप्राप्तिके लिये पूजाकी सब सामग्री जुटाकर सुरसुन्दरियोंके क्रीडास्थल मन्दराचलकी एक घाटीमें गये और तपस्यामें तत्पर होकर एकाग्रचित्तसे प्रजापतियोंके पति श्रीब्रह्माजीकी आराधना करने लगे ॥२॥
तदुपलभ्य भगवानादिपुरुषः सदसि गायन्तीं पूर्वचित्तिं नामाप्सरसमभियापयामास ॥३॥ सा च तदाश्रमोपवनमतिरमणीयं विविधनिबिड-विटपिविटपनिकरसंश्लिष्टपुरटलतारूढस्थल-विहङ्गममिथुनैः प्रोच्यमानश्रुतिभिः प्रतिबोध्यमान-सलिलकुक्कुटकारण्डवकलहंसादिभिर्विचित्रमुप-कूजितामलजलाशयकमलाकरमुपबभ्राम ॥४॥
तस्याः सुललितगमनपदविन्यासगतिविला-सायाश्चानुपदं खणखणायमानरुचिरचरणा-भरणस्वनमुपाकर्ण्य नरदेवकुमारः समाधियोगेनामीलितनयननलिनमुकुलयुगल-मीषद्विकचय्य व्यचष्ट ॥५॥ तामेवाविदूरे मधुकरीमिव सुमनस उपजिघ्रन्तीं दिविज-मनुजमनोनयनाह्लाददुघैर्गतिविहारव्रीडाविनया-वलोकसुस्वराक्षरावयवैर्मनसि नृणां कुसुमायुधस्य विदधतीं विवरं निजमुख-विगलितामृतासवसहासभाषामोदमदान्ध-मधुकरनिकरोपरोधेन द्रुतपदविन्यासेन वल्गुस्पन्दनस्तनकलशकबरभाररशनां देवीं तदवलोकनेन विवृतावसरस्य भगवतो मकरध्वजस्य वशमुपनीतो जडवदिति होवाच ॥६॥
आदिदेव भगवान् ब्रह्माजीने उनकी अभिलाषा जान ली। अतः अपनी सभाकी गायिका पूर्वचित्ति नामकी अप्सराको उनके पास भेज दिया ॥३॥ आग्नीध्रजीके आश्रमके पास एक अति रमणीय उपवन था। वह अप्सरा उसीमें विचरने लगी। उस उपवनमें तरह-तरहके सघन तरुवरोंकी शाखाओंपर स्वर्णलताएँ फैली हुई थीं। उनपर बैठे हुए मयूरादि कई प्रकारके स्थलचारी पक्षियोंके जोड़े सुमधुर बोली बोल रहे थे। उनकी षड्जादि स्वरयुक्त ध्वनि सुनकर