श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयेषां भ्रूभङ्गमात्रेण द्वारपालौ हरेः पुरा । भूमौ निपतितौ सद्यो यत्कृपातः पुरं गतौ ॥४९ अहो भाग्यस्य योगेन दर्शनं भवतामिह । अनुग्रहस्तु कर्तव्यो मयि दीने दयापरैः ॥५०
तब नारदजी बहुत चिन्तातुर हुए और बदरीवनमें आये। ज्ञान-वैराग्यको जगानेके लिये वहाँ उन्होंने यह निश्चय किया कि 'मैं तप करूँगा' ।।४३।। इसी समय उन्हें अपने सामने करोड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी सनकादि मुनीश्वर दिखायी दिये। उन्हें देखकर वे मुनिश्रेष्ठ कहने लगे ।।४४।।
नारदजीने कहा—महात्माओ! इस समय बड़े भाग्यसे मेरा आपलोगोंके साथ समागम हुआ है, आप मुझपर कृपा करके शीघ्र ही वह साधन बताइये ।।४५।। आप सभी लोग बड़े योगी, बुद्धिमान् और विद्वान् हैं। आप देखनेमें पाँच-पाँच वर्षके बालक-से जान पड़ते हैं, किंतु हैं पूर्वजोंके भी पूर्वज ।।४६।। आपलोग सदा वैकुण्ठधाममें निवास करते हैं, निरन्तर हरिकीर्तनमें तत्पर रहते हैं, भगवल्लीलामृतका रसास्वादन कर सदा उसीमें उन्मत्त रहते हैं और एकमात्र भगवत्कथा ही आपके जीवनका आधार है ।।४७।। 'हरिः शरणम्' (भगवान् ही हमारे रक्षक हैं) यह वाक्य (मन्त्र) सर्वदा आपके मुखमें रहता है; इसीसे कालप्रेरित वृद्धावस्था भी आपको बाधा नहीं पहुँचाती ।।४८।। पूर्वकालमें आपके भ्रूभंगमात्रसे भगवान् विष्णुके द्वारपाल जय और विजय तुरंत पृथ्वीपर गिर गये थे और फिर आपकी ही कृपासे वे पुनः वैकुण्ठलोक पहुँच गये ।।४९।। धन्य है, इस समय आपका दर्शन बड़े सौभाग्यसे ही हुआ है। मैं बहुत दीन हूँ और आपलोग स्वभावसे ही दयालु हैं; इसलिये मुझपर आपको अवश्य कृपा करनी चाहिये ।।५०।।
अशरीरगिरोक्तं यत्तत्किं साधनमुच्यताम् । अनुष्ठेयं कथं तावत्प्रब्रुवन्तु सविस्तरम् ॥५१ भक्तिज्ञानविरागाणां सुखमुत्पद्यते कथम् । स्थापनं सर्ववर्णेषु प्रेमपूर्वं प्रयत्नतः ॥५२
कुमारा ऊचुः
मा चिन्तां कुरु देवर्षे हर्षं चित्ते समावह । उपायः सुखसाध्योऽत्र वर्तते पूर्व एव हि ॥५३ अहो नारद धन्योऽसि विरक्तानां शिरोमणिः । सदा श्रीकृष्णदासानामग्रणीर्योगभास्करः ॥५४ त्वयि चित्रं न मन्तव्यं भक्त्यर्थमनुवर्तिनि ।