श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंघटते कृष्णदासस्य भक्तेः संस्थापना सदा ॥५५ ऋषिभिर्बहवो लोके पन्थानः प्रकटीकृताः । श्रमसाध्याश्च ते सर्वे प्रायः स्वर्गफलप्रदाः ॥५६ वैकुण्ठसाधकः पन्थाः स तु गोप्यो हि वर्तते । तस्योपदेष्टा पुरुषः प्रायो भाग्येन लभ्यते ॥५७ सत्कर्म तव निर्दिष्टं व्योमवाचा तु यत्पुरा । तदुच्यते शृणुष्वाद्य स्थिरचित्तः प्रसन्नधीः ॥५८ द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे । स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च ते तु कर्मविसुचकाः ॥५९ सत्कर्मसूचको नूनं ज्ञानयज्ञः स्मृतो बुधैः । श्रीमद्भागवतालापः स तु गीतः शुकादिभिः ॥६० भक्तिज्ञानविरागाणां तद्घोषेण बलं महत् । व्रजिष्यति द्वयोः कष्टं सुखं भक्तेर्भविष्यति ॥६१ प्रलयं हि गमिष्यन्ति श्रीमद्भागवतध्वनेः । कलेर्दोषा इमे सर्वे सिंहशब्दाद् वृका इव ॥६२
बताइये—आकाशवाणीने जिसके विषयमें कहा है, वह कौन-सा साधन है, और मुझे किस प्रकार उसका अनुष्ठान करना चाहिये। आप इसका विस्तारसे वर्णन कीजिये ॥५१॥ भक्ति, ज्ञान और वैराग्यको किस प्रकार सुख मिल सकता है? और किस तरह इनकी प्रेमपूर्वक सब वर्णोंमें प्रतिष्ठा की जा सकती है?' ॥५२॥ सनकादिने कहा—देवर्षे! आप चिन्ता न करें, मनमें प्रसन्न हों; उनके उद्धारका एक सरल उपाय पहलेसे ही विद्यमान है ॥५३॥ नारदजी! आप धन्य हैं। आप विरक्तोंके शिरोमणि हैं। श्रीकृष्ण-दासोंके शाश्वत पथ-प्रदर्शक एवं भक्तियोगके भास्कर हैं ॥५४॥ आप भक्तिके लिये जो उद्योग कर रहे हैं, यह आपके लिये कोई आश्चर्यकी बात नहीं समझनी चाहिये। भगवान्के भक्तके लिये तो भक्तिकी सम्यक् स्थापना करना सदा उचित ही है ॥५५॥ ऋषियोंने संसारमें अनेकों मार्ग प्रकट किये हैं; किंतु वे सभी कष्टसाध्य हैं और परिणाममें प्रायः स्वर्गकी ही प्राप्ति करानेवाले हैं ॥५६॥ अभीतक भगवान्की प्राप्ति करानेवाला मार्ग तो गुप्त ही रहा है। उसका उपदेश करनेवाला पुरुष प्रायः भाग्यसे ही मिलता है ॥५७॥ आपको आकाशवाणीने जिस सत्कर्मका संकेत किया है, उसे हम बतलाते हैं; आप प्रसन्न और समाहितचित्त होकर सुनिये ॥५८॥ नारदजी! द्रव्ययज्ञ, तपोयज्ञ, योगयज्ञ और स्वाध्यायरूप ज्ञानयज्ञ—ये सब तो स्वर्गादिकी प्राप्ति करानेवाले कर्मकी ही ओर संकेत करते हैं ॥५९॥ पण्डितोंने ज्ञानयज्ञको ही सत्कर्म (मुक्तिदायक कर्म)-का सूचक माना है। वह श्रीमद्भागवतका पारायण है, जिसका
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