श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
गीताप्रेस, गोरखपुर
भगवान् नारायणके नाभि-कमलसे लोकपितामह ब्रह्माकी उत्पत्ति Brahmā emanates from the navel-lotus of Nārāyaṇa
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गीताप्रेस, गोरखपुर
B. K. Mitra
देवों तथा ऋषिगणोंको भगवान् वराहके दिव्य दर्शन
Vision of Lord Varāha to Gods and Ṛṣis
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गीताप्रेस, गोरखपुर
माता देवहूतिको भगवान् कपिलका तत्त्वोपदेश Kapila preaches knowledge to mother Devahūti
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गीताप्रेस, गोरखपुर
बालक ध्रुवपर भगवान्का अनुग्रह The grace of Lord descends on Dhruva
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नवधा भक्ति
- श्रवण
- कीर्तन
- स्मरण
- पादसेवन
- अर्चन
- वन्दन
- दास्य
- सख्य
- आत्मनिवेदन
भक्तिदेवी
गीताप्रेस, गोरखपुर
B. K. Mitra
भक्तिके नौ प्रकार Ninefold devotion
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गीताप्रेस, गोरखपुर
भगवान् विष्णु वामन-रूपमें Lord Viṣṇu as a Dwarf
श्रीमद्भागवत-माहात्म्य (पद्मपुराणोक्त)
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमाहात्म्यम्
कृष्णं नारायणं वन्दे कृष्णं वन्दे व्रजप्रियम् ।
कृष्णं द्वैपायनं वन्दे कृष्णं वन्दे पृथासुतम् ॥
अथ प्रथमोऽध्यायः
देवर्षि नारदकी भक्तिसे भेंट
सच्चिदानन्दरूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे ।
तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नुमः ॥१
यं प्रव्रजन्तमनुपेतमपेतकृत्यं
द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव ।
पुत्रेति तन्मयतया तरवोऽभिनेदु-
स्तं सर्वभूतहृदयं मुनिमानतोऽस्मि ॥२
नैमिषे सूतमासीनमभिवाद्य महामतिम् ।
कथामृतरसास्वादकुशलः शौनकोऽब्रवीत् ॥३
शौनक उवाच
अज्ञानध्वान्तविध्वंसकोटिसूर्यसमप्रभ ।
सूताख्याहि कथासारं मम कर्णरसायनम् ॥४
भक्तिज्ञानविरागाप्तो विवेको वर्धते महान् ।
मायामोहनिरासश्च वैष्णवैः क्रियते कथम् ॥५
इह घोरे कलौ प्रायो जीवश्चासुरतां गतः ।
क्लेशाक्रान्तस्य तस्यैव शोधने किं परायणम् ॥६
सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णको हम नमस्कार करते हैं, जो जगत्की उत्पत्ति,
स्थिति और विनाशके हेतु तथा आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक—तीनों प्रकारके तापोंका नाश करनेवाले हैं ॥१॥
जिस समय श्रीशुकदेवजीका यज्ञोपवीत-संस्कार भी नहीं हुआ था तथा लौकिक-वैदिक कर्मोंके अनुष्ठानका अवसर भी नहीं आया था, तभी उन्हें अकेले ही संन्यास लेनेके लिये घरसे जाते देखकर उनके पिता व्यासजी विरहसे कातर होकर पुकारने लगे—‘बेटा! बेटा! तुम कहाँ जा रहे हो?’ उस समय वृक्षोंने तन्मय होनेके कारण श्रीशुकदेवजीकी ओरसे उत्तर दिया था। ऐसे सर्वभूत-हृदयस्वरूप श्रीशुकदेवमुनिको मैं नमस्कार करता हूँ॥२॥
एक बार भगवत्कथामृतका रसास्वादन करनेमें कुशल मुनिवर शौनकजीने नैमिषारण्य क्षेत्रमें विराजमान महामति सूतजीको नमस्कार करके उनसे पूछा ॥३॥
शौनकजी बोले—सूतजी! आपका ज्ञान अज्ञानान्धकारको नष्ट करनेके लिये करोड़ों सूर्योंके समान है। आप हमारे कानोंके लिये रसायन—अमृत-स्वरूप सारगर्भित कथा कहिये ॥४॥ भक्ति, ज्ञान और वैराग्यसे प्राप्त होनेवाले महान् विवेककी वृद्धि किस प्रकार होती है तथा वैष्णवलोग किस तरह इस माया-मोहसे अपना पीछा छुड़ाते हैं? ॥५॥ इस घोर कलि-कालमें जीव प्रायः आसुरी स्वभावके हो गये हैं, विविध क्लेशोंसे आक्रान्त इन जीवोंको शुद्ध (दैवीशक्तिसम्पन्न) बनानेका सर्वश्रेष्ठ उपाय क्या है? ॥६॥
श्रेयसां यद्भवेच्छ्रेयः पावनानां च पावनम् ।
कृष्णप्राप्तिकरं शश्वत्साधनं तद्वदाधुना ॥७
चिन्तामणिर्लोकसुखं सुरद्रुः स्वर्गसम्पदम् ।
प्रयच्छति गुरुः प्रीतो वैकुण्ठं योगिदुर्लभम् ॥८
सूत उवाच
प्रीतिः शौनक चित्ते ते ह्यतो वच्मि विचार्य च ।
सर्वसिद्धान्तनिष्पन्नं संसारभयनाशनम् ॥९
भक्त्योघवर्धनं यच्च कृष्णसंतोषहेतुकम् ।
तदहं तेऽभिधास्यामि सावधानतया शृणु ॥१०
कालव्यालमुखग्रासत्रासनिर्णशहेतवे ।
श्रीमद्भागवतं शास्त्रं कलौ कीरेण भाषितम् ॥११
एतस्मादपरं किञ्चिन्मनः शुद्धै न विद्यते ।
जन्मान्तरे भवेत्पुण्यं तदा भागवतं लभेत् ॥१२
परीक्षिते कथां वक्तुं सभायां संस्थिते शुके । सुधाकुम्भं गृहीत्वैव देवास्तत्र समागमन् ।।१३
शुकं नत्वावदन् सर्वे स्वकार्यकुशलाः सुराः । कथासुधां प्रयच्छस्व गृहीत्वैव सुधामिमाम् ।।१४
एवं विनिमये जाते सुधा राज्ञा प्रपीयताम् । प्रपास्यामो वयं सर्वे श्रीमद्भागवतामृतम् ।।१५
क्व सुधा क्व कथा लोके क्व काचः क्व मणिर्महान् । ब्रह्मरातो विचार्यैवं तदा देवाञ्जहास ह ।।१६
अभक्तांस्तांश्च विज्ञाय न ददौ स कथामृतम् । श्रीमद्भागवती वार्ता सुराणामपि दुर्लभा ।।१७
सूतजी! आप हमें कोई ऐसा शाश्वत साधन बताइये जो सबसे अधिक कल्याणकारी तथा पवित्र करनेवालोंमें भी पवित्र हो; तथा जो भगवान् श्रीकृष्णकी प्राप्ति करा दे ।।७।। चिन्तामणि केवल लौकिक सुख दे सकती है और कल्पवृक्ष अधिक-से-अधिक स्वर्गीय सम्पत्ति दे सकता है; परन्तु गुरुदेव प्रसन्न होकर भगवान्का योगिदुर्लभ नित्य वैकुण्ठधाम दे देते हैं ।।८।।
सूतजीने कहा—शौनकजी! तुम्हारे हृदयमें भगवान्का प्रेम है; इसलिये मैं विचारकर तुम्हें सम्पूर्ण सिद्धान्तोंका निष्कर्ष सुनाता हूँ, जो जन्म-मृत्युके भयका नाश कर देता है ।।९।। जो भक्तिके प्रवाहको बढ़ाता है और भगवान् श्रीकृष्णकी प्रसन्नताका प्रधान कारण है, मैं तुम्हें वह साधन बतलाता हूँ; उसे सावधान होकर सुनो ।।१०।। श्रीशुकदेवजीने कलियुगमें जीवोंके कालरूपी सर्पके मुखका ग्रास होनेके त्रासका आत्यन्तिक नाश करनेके लिये श्रीमद्भागवतशास्त्रका प्रवचन किया है ।।११।। मनकी शुद्धिके लिये इससे बढ़कर कोई साधन नहीं है। जब मनुष्यके जन्म-जन्मान्तरका पुण्य उदय होता है, तभी उसे इस भागवतशास्त्रकी प्राप्ति होती है ।।१२।। जब शुकदेवजी राजा परीक्षित्को यह कथा सुनानेके लिये सभामें विराजमान हुए, तब देवतालोग उनके पास अमृतका कलश लेकर आये ।।१३।। देवता अपना काम बनानेमें बड़े कुशल होते हैं; अतः यहाँ भी सबने शुकदेवमुनिको नमस्कार करके कहा; 'आप यह अमृत लेकर बदलेमें हमें कथामृतका दान दीजिये ।।१४।। इस प्रकार परस्पर विनिमय (अदला-बदली) हो जानेपर राजा परीक्षित् अमृतका पान करें और हम सब श्रीमद्भागवतरूप अमृतका पान करेंगे' ।।१५।। इस संसारमें कहाँ काँच और कहाँ महामूल्य मणि तथा कहाँ सुधा और कहाँ कथा? श्रीशुकदेवजीने (यह सोचकर) उस समय देवताओंकी हँसी उड़ा दी ।।१६।। उन्हें भक्तिशून्य (कथाका अनधिकारी) जानकर कथामृतका दान नहीं