भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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ब्राह्मणो! उसकी उपार्जित की हुई तपस्या पवित्र, सत्य और सफल है; क्योंकि राम-रसमें प्रीति हुए बिना रामायणके अर्थ-श्रवणमें प्रेम नहीं होता है॥ ४८ १/२ ॥

जो द्विज इस भयंकर कलिकालमें रामायण तथा श्रीरामनामका सहारा लेते हैं, वे ही कृतकृत्य हैं॥ ४९ १/२ ॥

रामायणकी इस अमृतमयी कथाका नवाह श्रवण करना चाहिये। जो महात्मा ऐसा करते हैं, वे कृतज्ञ हैं। उन्हें प्रतिदिन मेरा बारम्बार नमस्कार है॥ ५० १/२ ॥

श्रीरामका नाम—केवल श्रीराम-नाम ही मेरा जीवन है। कलियुगमें और किसी उपायसे जीवोंकी सद्गति नहीं होती, नहीं होती, नहीं होती॥ ५१ १/२ ॥

सूतजी कहते हैं—महात्मा नारदजीके द्वारा इस प्रकार ज्ञानोपदेश पाकर सनत्कुमारजीको तत्काल ही परमानन्दकी प्राप्ति हो गयी॥ ५२ १/२ ॥

अतः विप्रवरो! तुम सब लोग रामायणकी अमृतमयी कथा सुनो। रामायणको नौ दिनोंमें ही सुनना चाहिये। ऐसा करनेवाला समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ५३ १/२ ॥

द्विजोत्तमो! इस महान् काव्यको सुनकर जो वाचककी पूजा करता है, उसपर लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं॥ ५४ १/२ ॥

विप्रेन्द्रगण! वाचकके प्रसन्न होनेपर ब्रह्मा, विष्णु और महादेवजी प्रसन्न हो जाते हैं। इस विषयमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये॥ ५५ १/२ ॥

रामायणके वाचकको अपने वैभवके अनुसार गौ, वस्त्र, सुवर्ण तथा रामायणकी पुस्तक आदि वस्तुएँ देनी चाहिये॥ ५६ १/२ ॥

उस दानका पुण्यफल बता रहा हूँ, आपलोग एकाग्रचित्त होकर सुनें। उस दाताको ग्रह तथा भूतवेताल आदि कभी बाधा नहीं पहुँचाते। श्रीरामचरित्रका श्रवण करनेपर श्रोताके सम्पूर्ण श्रेयकी वृद्धि होती है॥

उसे न तो अग्निकी बाधा प्राप्त होती है और न चोर आदिका भय ही। वह इस जन्ममें उपार्जित किये हुए समस्त पापोंसे तत्काल मुक्त हो जाता है। वह इस शरीरका अन्त होनेपर अपनी सात पीढ़ियोंके साथ मोक्षका भागी होता है॥ ५९ १/२ ॥